पुस्तक समीक्षास्मृति

छोटी सी अभिलाषा के तानों बानो में बंधा एक महाकाव्यात्मक उपन्यास है “गोदान”

भारती खत्री

गोदान मुंशी प्रेमचंद जी का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण उपन्यास है| इसका प्रकाशन सन् 1936 में हिंदी ग्रंथ रत्नाकर कार्यालय मुंबई के द्वारा किया गया | गोदान निम्न वर्ग की एक छोटी सी अभिलाषा के तानों बानो में बंधा एक महाकाव्यात्मक उपन्यास है | इसे प्रेमचंद जी की सर्वश्रेष्ठ कृति कहना अतिशयोक्ति ना होगा | प्रेमचंद जी के शब्दों में -“जब किसान के बेटे को गोबर से बदबू आने लग जाए तो समझ लो कि देश में अकाल पड़ने वाला है |” अपने शब्दों की सटीक शैली में उन्होंने इस उपन्यास को एक नया ही रंग दिया है | बीसवीं सदी के आरंभिक काल की तत्कालिक परिस्थितियों का सजीव चित्रण करता है यह उपन्यास | इस उपन्यास में गांधीवाद सामंतवाद का मिलाजुला प्रभाव है परंतु इसका सृजन यथार्थवाद को दृष्टिगत रखकर किया गया है | ग्रामीण जीवन की सजीव झांकी और नगरीय सभ्यता की दिखावा संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है | कहानी का केंद्र बिंदु है होरी जो जो एक किसान है और इसकी नायिका है उसकी पत्नी धनिया | वह किसान जो सत्य असत्य,नीति अनीति,स्वाभिमान लोलुपता,सही गलत के चक्रव्यूह में घिरा है | उसके जीवन की बस एक ही अभिलाषा है उसके घर आंगन में उसकी अपनी गाय | अपनी पत्नी धनिया के साथ पाए कांग्रेस की तरह जीवन जी रहा है जहां प्यार,तकरार,मनुहार,उपेक्षा अपेक्षा, स्नेह,अपमान सभी के मिश्रित भाव दिखाई पड़ते हैं | उसके तीनों बच्चे गोबर सोना और रूपा अपने अपने किरदारों में प्रभावी जान पड़ते हैं | होरी है तो एक शोषित पर का किसान परंतु अपनी चाटुकारिता और जी हजूरी से महाजनों में उसकी पहचान है | इस क्षणिक पहचान से व अन्य किसानों से श्रेष्ठ है तभी उसे सब दुआ सलाम, राम राम करते हैं | अपनी छोटी सी श्रेष्ठता से वह गर्वित है | वह अपने मन को समझाने में कुशल है | भारतीय समाज का वह शोषित सा कृषक अपने ऊपर जुल्म करने वालों की जी हजूरी भी करता है और उनका महिमामंडन भी करता है | अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए वह हर सही गलत काम करता है | होली का बेटा गोबर विद्रोही प्रवृत्ति का है | वह एक नवयुवक है जिसकी अपनी इच्छाएं हैं जिनका वह दमन करना नहीं चाहता | वह भोला की विधवा पुत्री को अपने हृदय में बसाना चाहता है जो तत्कालीन घोर पाप का विषय था | होरी अपने संयुक्त परिवार के बिखराव से दुखी है | वह चाहकर भी अपने टूटे पारिवारिक बंधनों को फिर से जोड़ नहीं पाता | उसके जीवन की एकमात्र इच्छा गोदान इच्छा बनकर ही रह जाती है | तत्कालीन भारतीय संस्कृति और सभ्यता में एक कृषक जीवन की झांकी यदि देखनी है तो गोदाम से बेहतर कोई अन्य कृति नहीं है | महाजन द्वारा कृषकों का शोषण, स्वार्थ, लोलुपता,लगान वसूली, स्त्रियों पर कुदृष्टि ऐसे कारक ज्यों के त्यों गढ़ दिए गए हैं | जहां एक और ग्रामीण व्यवस्था के पहलू हैं वहीं दूसरी और नगरीय जीवन का चित्रण भी अत्यंत सटीक है | समाज का सबसे सुशिक्षित संभ्रांत वर्ग अंदर से कितना खोखला और बनावटी है यह प्रेमचंद जी ने बखूबी बताया है | शहरी समाज के वकील,डॉक्टर, इंजीनियर,दर्शन शास्त्री और सरकारी ओहदे पर विराजमान अफसर अपने झूठे आदर्शों और नकली प्रतिष्ठा पर एक दूसरे पर व्यंग्य कसते नजर आते हैं |

         महिलाओं के प्रति दोहरी मानसिकता की झलक इनमें साफ नजर आती है | यह सबवे संभ्रांत लोग कैसे शोषित वर्ग से अपना उल्लू साधते हैं यह पाठकों के मन को झकझोर जाता है | मानवीय मूल्यों और मनोभावों का सुंदर चित्रण इस उपन्यास में प्रतीत होता है| हर पात्र से जुड़ी बातों का असर सीधे दिल और दिमाग पर होता है | होरी के द्रवित होने पर पाठकों का मन भी वेदना और करुणा से भर जाता है | वहीं दूसरी ओर मिस मालती के दिल फेंक अंदाज़ और अभिमान की पराकाष्ठा पाठकों को सोचने पर विवश कर देती है | प्रेमचंद जी ने अपनी कहानी में शोषक भारतीय समाज के हर वर्ग के हद कर लो और करतूतों का भंडाफोड़ किया है | गोदान तत्कालीन समय में महाजनी व्यवस्था में होने वाले शोषण और उससे उत्पन्न संत्रास की एक कथा है | सभी बातों को कहने के लिए समुचित तर्क, मनोवैज्ञानिक शैली चुस्त भाषा और प्रभावशीलता उनके लेखन का विशेष कौशल है | गोदान में दो कथाओं का मिलन है – एक ग्राम कथा और दूसरी शहरी कथा | इन दोनों का संतुलित मिश्रण हमें इस उपन्यास में देखने को मिलता है| गोदान में भारतीय मिट्टी की सोंधी खुशबू है जो पाठकों के मन को छू जाती है|

    प्रेमचंद जी ने कहा है -” आलस्य वह रोग है जिसका रोगी कभी ठीक नहीं होता ” तथा ” सौभाग्य उसी को प्राप्त होता है जो अपने कर्तव्य पथ पर अडिग रहते हैं”| सच ही तो है | जीवन का सार भी इसी में है | मुंशी प्रेमचंद जी भारतीय साहित्य का वह सितारा है जिसकी चमक कभी कम नहीं होगी | भारतीय साहित्य में मुंशी प्रेमचंद जी का योगदान अतुलनीय है |

भारती खत्री, ( स. अ.), पूर्व माध्यमिक विद्यालय, फतेहपुर मकरंदपुर, ब्लॉक- सिकंदराबाद,  जनपद -बुलंदशहर

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"ज़िद है दुनिया जीतने की"
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