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विचार

देश के नीति निर्धारकों ने देश के बौद्धिक विकास को बिकलांग बना दिया

आत्माराम त्रिपाठी की खास रिपोर्ट

आज कोरोना रूपी संक्रामक महामारी ने जंहा देश ही नहीं पूरे विश्व को अपने चपेट में ले रखा है बिकास की गति रूक गई है सभी देश अपने तरीके से इस महामारी पे बिजय श्री पाने के हथकंडे अपना रहे हैं उसमें एक देश हमारा भी है ज़हां के चौकीदार ने मंदिर मस्जिद गुरुद्वारो में पहरा बैठा दिया ताले लगवा दिए मां सरास्वती के मंदिरों में ताला लगवा दिए ज़हां से संस्कार सभ्यता भविष्य का निर्माण होना है ताले लगवा दिए गए जो सीधे देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।पर देश के इन नीति निर्धारकों ने छुट दे दी है मधुशाला को क्योंकि यहां से देश के युवाओं को दिशा मिलेगी उनका भविष्य सुरक्षित होगा उनकी बौद्धिक क्षमता का विकास होगा तभी तो देश के खेवनहारों ने इसे चालू रखा है और विद्यालयों कालेजों को बंद कर दिया जिसमें पठन-पाठन के कार्य से विद्यार्थियों को वंचित कर दिया गया शिक्षकों को यतो घरों में बैठा दिया गया यह फिर उन्हें उस कार्य में लगाया गया जिसके वह हकदार नहीं हैं।यह कैसी नीति है क्या कोरोना जगहों की पहचान कर अपना आक्रमण करता है मुझे लगता है कि उसका आक्रमण इन नीति निर्धारकों की सोचों पर हो गया है जिस तरह कलियुग राजा परीक्षित के राजमुकुट में विराजमान हो गया था तब उसके क्या परिणाम निकले यह सब महाभारत में पढ़ चुके हैं आज उसी तरह यह कोरोना इन देश को चलाने वाले के मन मस्तिष्क में सवार हो गया है कलियुग की भांति तभी तो इन्हें लोगों के आस्था के केंद्रों पर ताला लगवा दिया और ज़हां से सिर्फ बर्बादी कलह बौद्धिक संपदा का हृास हो रहा है पर इसकी चिंता किसे है विद्यालय बंद कालेज बंद उसमें बैठकर पठन-पाठन का कार्य बंद परीक्षाएं स्थगित बिना पठन-पाठन के बिना परीक्षा के परीक्षण परिणाम घोषित होंगे परीक्षार्थियों को प्रमाण पत्र भी मिल जाएंगे पर क्या यह उचित हो रहा है क्या यह शिक्षा को अशिक्षा में परिवर्तित करने का कार्य नहीं है ? क्या यह शिक्षा के साथ क्रूर मजाक नहीं है तो और क्या है? गुरु शिष्य के मध्य की कड़ी जर्जर हो रही शिक्षण संस्थान बंद हो जाने से गुरु शिष्य के मध्य की दूरी बढ़ती जा रही है उतनी ही दूर उनके संस्कार बौद्धिक विकास की छमता की दूरी बढ़ती जा रही है। विद्यालय विद्यालय मात्र नहीं है वह देश के मंदिर है जहां देश के भविष्य का निर्माण होता है यही से शिक्षा प्राप्त कर छात्र वैज्ञानिक लेखक नेता अभिनेता डाक्टर इंजीनियर कलेक्टर एसपी दरोगा चौकीदार बनते हैं इन्हीं में कुछ माननीय बनते हैं जो आजकी दोगली राजनीति के शिकार हो उससे वंचित हो रहे हैं।

क्या विना शिक्षा ग्रहण किए य बिना परीक्षा दिए परिक्षा परिणाम प्राप्त छात्र उन प्राप्त परिणामों में संतुष्ट हो पायेगा?य वह परिणाम उचित है जो बिना परिश्रम के प्राप्त हो सो इसीलिए हम कहते हैं कि यह एक सुनियोजित तरीके की साज़िश है युवाओं को व उसके बौद्धिक विकास को अपंगता बिकलंगता की ओर ले जाने की। इसलिए तो देश के चौकीदार ने जिनके पूर्वजों ने रामराज्य की कल्पना की थी उसी के इन तथाकथित अनुयायियों ने मंदिर मस्जिद गुरुद्वारो में पहरा बैठा दिया और मधुशाला के दरवाजे खोल दिए ।धन्य है कोरोना तेरी महिमा अपरम्पार है तू महान है तेरी पहचान निराली है तभी तो तू संस्कृति संस्कार सभ्यता भविष्य पर हमला कर रहा है और शेष से डर रहा है इसीलिए चौकीदार ने मंदिर मस्जिद गुरुद्वारो विद्यालयों कालेजों को अपने सुरक्षा घेरे में ले लिया है और बाकी जगहों से बेफिक्र हो गया है कारण वह जनता है कि तेरी वहां कुछ चलने वाली नहीं है।

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