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संपादकीय

बड़े बोल बाबा रामदेव के

अनिल अनूप

एलोपैथी ‘स्टुपिड’ और ‘दिवालिया’ साइंस है। डॉक्टर टर्र टर्र करते रहते हैं। उनका बाप भी स्वामी रामदेव को गिरफ्तार नहीं कर सकता। ये तीनों वाक्य किसी संभ्रांत व्यक्ति के बोले नहीं हो सकते। कमोबेश बाबा रामदेव जैसी शख्सियत से तो अपेक्षा नहीं की जा सकती। बाबा ने यह भी कहा है कि कोरोना टीका लगने के बावजूद 10,000 डॉक्टरों की मौत हो गई। यह कहकर बाबा ने टीकाकरण अभियान को ही बदनाम किया है और महामारी कानून का उल्लंघन भी किया है। कमोबेश यह देशहित का कथन नहीं है। बाबा यह कहने से भी नहीं चूके कि लाखों लोगों की मौत एलोपैथी दवाएं खाने से हुई है। एलोपैथी में गंभीर बीमारियों का स्थायी इलाज नहीं है, जबकि बाबा रामदेव ने ऐसी बीमारियों को ठीक करने का दावा किया है। बेशक उन्होंने हजारों, लाखों लोगों को आरोग्य दिया है। करीब 10 करोड़ लोगों को योग भी सिखाया है। यकीनन आयुर्वेद हमारी सनातन चिकित्सा पद्धति है, जो पुरखों के अनुभव से विरासत में हमें मिली है। बहरहाल बाबा रामदेव के तमाम दावे और प्रयोग अपनी जगह सही हो सकते हैं। बेशक वह योग के महत्त्वपूर्ण प्रवक्ता हैं, लेकिन कोरोना वायरस जैसी वैश्विक महामारी के मौजूदा दौर में आयुर्वेद और एलोपैथी के दरमियान अखाड़े सजाने की ज़रूरत क्या थी? एलोपैथी को गालियां देने और सवालिया करार देने का फिलहाल औचित्य क्या है? बेशक आयुर्वेद हमारी विरासत है, लेकिन मेडिकल साइंस ने निरंतर शोधों और प्रयोगों के जरिए जीवन-रक्षक दवाएं और सर्जरी मानव-सभ्यता को दी हैं।

 इनसान को नया जीवन बख्शा है, लिहाजा डॉक्टर में हम ‘भगवान’ की छवि महसूस करते रहे हैं। कोरोना के 22 करोड़ से ज्यादा मरीजों को एलोपैथी इलाज ने स्वस्थ किया है। यह इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) का दावा है। यदि इनसान को दिल का दौरा पड़ा है या ब्रेन हैमरेज हुआ है अथवा गुर्दे, फेफड़े और लिवर में कोई नाजुक अंग खराब हो गया है या कैंसर तीसरे-चौथे चरण तक पहुंच गया है, तो ऐसी गंभीर बीमार अवस्थाओं में प्राणायाम और अनुलोम-विलोम इनसान की प्राण-रक्षा नहीं कर सकते। सिर्फ  एलोपैथी में ही संभावनाएं हैं और सर्जरी अपरिहार्य हो जाती है। एलोपैथी के जीवन-रक्षक इलाज का उदाहरण तो खुद बाबा और उनके सहयोगी बालकृष्ण ही हैं। जब उनकी तबीयत बिगड़ी थी, तो एम्स में उनका इलाज कराया गया था। तब आयुर्वेद की कोई दवा और योग कारगर नहीं हो सकते थे। बेशक हम आयुर्वेद, होम्योपैथ, यूनानी और एलोपैथ आदि सभी चिकित्सा पद्धतियों के समर्थक हैं। उनके अपने-अपने अनुभव और इलाज हैं, लेकिन कोरोना टीके के अनुसंधान और मानव-जीवन की रक्षा का श्रेय आधुनिक मेडिकल साइंस को ही जाता है। वैज्ञानिकों और चिकित्सकों ने निरंतर शोध और प्रयोगों के जरिए महामारी के विषाणु को निरस्त करने में सफलता हासिल की है। टीके के प्रभाव 70-90 फीसदी तक हैं। कुछ कंपनियों ने 100 फीसदी प्रभावों का दावा किया है, लेकिन कोरोना के दौर में इनसान के जिंदा रहने की एकमात्र संभावना टीके में ही निहित है। फिर किस आधार पर बाबा रामदेव ने एलोपैथी को ‘स्टुपिड’ और ‘दिवालिया’ साइंस करार दे दिया अथवा किसी अन्य के कथन की सार्वजनिक पुष्टि की है? बाबा ने एलोपैथी या आयुर्वेद में ही कितनी शिक्षा प्राप्त की है? गुरुकुल के आचार्य को ‘डॉक्टर’ नहीं माना जा सकता।

 बाबा का चिकित्सकीय पेशेवर अनुभव भी क्या है? योग, ध्यान आदि भी उनकी बपौती नहीं हैं। गुजरात के प्रख्यात योगाचार्य अध्यात्मानंद की मौत भी कोरोना से हुई है। मौत तो निश्चित है, लिहाजा डॉक्टर भी इस महामारी के शिकार हुए हैं, लेकिन अस्पतालों में डॉक्टर भी योगासनों की अनुशंसा करते रहे हैं। यह हमारा अपना अर्जित अनुभव है। यह अब छोटा विवाद नहीं रहा है। आईएमए ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर बाबा रामदेव के खिलाफ देशद्रोह का केस चलाने की मांग की है। आईएमए ने 1000 करोड़ रुपए मानहानि का नोटिस भी बाबा को भेजा है। देश के अलग-अलग हिस्सों में प्राथमिकी दर्ज कराने के मद्देनजर शिकायतें दी जा रही हैं। देश के स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन, उनके मंत्रालय और भारत सरकार के औषध महानियंत्रक की साख सवालिया हुई है। हासिल क्या हुआ? बाबा साबुन, शैम्पू, मसालों से लेकर आटा और असंख्य औषधियों तक उत्पादन करवा रहे हैं। उनके पतंजलि योगपीठ में डॉक्टर और वैज्ञानिक भी हैं। बाबा अपने व्यापार और योग पर ध्यान दें। एलोपैथी को कोसने से धंधा बढ़ेगा क्या?

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