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विचार

प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा : मेरे प्रयोग एवं अनुभव

 अखिलेश चंद्र पाण्डेय

लेख का आरम्भ मैं डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम के एक वाक्य से करता हूं, “मैं अच्छा वैज्ञानिक इसलिए बन पाया क्योंकि मैंने गणित और विज्ञान की शिक्षा मातृभाषा में ली थी”। जब हम पहली बार शिशुपन में खुशी का इज़हार किया होगा तो अपनी मातृभाषा में ही किया होगा। बालक के उन गीले होठों से कुछ स्वर निकला होगा तो वह मातृभाषा में ही सना रहा होगा। बड़े होकर हम चाहे जितनी भाषाएँ सीख लें किन्तु जब कभी अपने मन के विचारों को प्रकट करने की बारी आती है तो भाव अपनी मातृभाषा में ही आते हैं।

प्राथमिक शिक्षा भी अपनी प्राथमिक भाषा में ही होनी चाहिए। यह बात अब दृढ़ता से स्थिर हो चुकी है और नई शिक्षा नीति में हमने इसी मातृभाषा के महत्त्व को स्वीकार भी किया है। एक अनुभव साझा करना प्रासंगिक है। मेरी प्रथम नियुक्ति लखीमपुर खीरी के एक प्राथमिक विद्यालय में हुई। पहले पहल बच्चे मेरी खड़ी बोली हिंदी में कही गयी बातें समझ न पाते। विशेषतः कक्षा एक के बच्चे। जबकि भाषा उनकी भी हिंदी ही थी किन्तु बोली में अंतर होने मात्र से असहज थे। मैं जब किसी बच्चे से कहता कि “इधर आओ”। तब भी वह मौन खड़ा रहता। मेरे सहयोगी शिक्षक ने जब मुझे प्रशिक्षित किया तब मैं उनसे कहने लगा कि इत्थिर आवौ। अब बच्चे सरलता से मेरे पास आने लगे। “का नाउ है तुम्हार” पूछने पर वे अपना नाम बता देते जबकि “क्या नाम है तुम्हारा” कहने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। यह होता है मातृभाषा से अपनापन, जुड़ाव और संवाद का अंतर।

प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा एक कल्पवृक्ष के समान है। यह हमारे मन के समस्त भावों का प्रकटीकरण आसानी से कर देती है। मातृभाषा में विषय वस्तु का सीखना सहज हो जाता है। संकट के समय भाव मातृभाषा में ही प्रकट होते हैं। एक बार मैं अपने स्कूल से बच्चों को पढ़ा कर पैदल ही अंग्रेजी कविता गुनगुनाते हुए दुधवा नेशनल पार्क के मध्य जंगलों से होता हुआ निवास स्थान की ओर लौट रहा था। अचानक जंगल से बंदरों के एक झुंड द्वारा मुझे खौं-खौं, खी-खी करते हुए घेर लेने पर उस समय मेरे मुँह से अंग्रेजी नहीं निकली कि ” मंकी गो अवे।” बस मातृभाषा में ही “अरे बाप रे, धत-धत, हट-हट, पुच्-पुच्च। काटा ना भाई बजरंगी तोहका प्रसाद चढ़ौबै। अरे जा भाई जा अब तोहरी ओरी न देखब।” यह मातृभाषा की संवेदना और शक्ति है। मन के भाव व्यक्त करने का यह एक सहज सा उदाहरण था। इसी प्रकार जब हम प्राथमिक शिक्षा की बात करते हैं तो यह पाते हैं कि प्राथमिक शिक्षा में बच्चों की अधिगम प्रक्रिया में मातृभाषा का महत्वपूर्ण योगदान है। जो विषय वस्तु हम मातृभाषा में सीख लेते हैं वही विषय वस्तु किसी अन्य भाषा में सीखने में हमें कई गुना ऊर्जा एवं समय-श्रम खर्च करना पड़ता है। मातृभाषा में सीखी गई विषय वस्तु मन में बसी एहसासों में बनी रहती है।

जब कोई बच्चा अपनी मातृभाषा में अपने माता-पिता से कुछ कहता है तो तंत्रिकाएँ झंकृत हो जाती हैं। मैंने देखा है कि मातृभाषा में लिखी हुई कविता प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में बच्चे जल्दी याद कर लेते हैं। विषय वस्तु को सरल बनाने में कविताओं द्वारा अथवा कहानियों द्वारा मातृभाषा में जो भाव संप्रेषण हो पाता है वह किसी अन्य भाषा में नहीं।

हमने बचपन में गिनती सीखने में, वन, टू थ्री नहीं सीखा था, वरन एक इकाई एक, दो इकाई दो, तीन इकाई तीन, चार दहाई दो इकाई बयालीस आदि कविता याद की थी। आगे चलकर वही कविता अंको के स्थानीय मान की समझ को स्पष्ट करती है। उल्लेखनीय है कि हमने गिनती नहीं सीखी थी वस्तुतः हमने एक कविता सीखी थी जो कि हमारी मातृभाषा में थी। वही मातृभाषा आज तक हमें अंको के स्थानीय मान का भी बोध कराती रहती है। हमें इकाई, दहाई के स्थानीय मान को अलग से नहीं सीखना पड़ा जैसा कि अंग्रेजी नंबरों के साथ व्यवहार में होता है ।

पिछले 50 वर्षों में विश्व से लगभग 220 से अधिक भाषाएँ लुप्त हो गयीं हैं। इसी महत्व को समझते हुए यूनेस्को ने 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस घोषित किया है। वर्ष 2019 को हम मातृभाषा वर्ष के रूप में मना चुके हैं। एक शोध के मुताबिक यह पाया गया है कि विश्व के सर्वाधिक 20 पिछड़े देशों में विदेशी भाषा का प्रभाव है। वास्तव में मातृभाषाएं इतनी लचीली होती हैं कि वह अन्य भाषाओं के शब्दों को भी अपने में समाहित करती रहती है।

लोग अन्य भाषाओं का प्रयोग भी अपनी मातृभाषा में करने लगते हैं जिसका एक अलग ही आनंद होता है। एक बार एक अभिभावक मेरे पास आए। साधारण किसान थे, हल लेकर के खेतों की ओर जाते हुए उन्हें मेरी मदद चाहिए थी। बोले -“मास्टर साहब हमारे फोन में ना जाने कौन सा फैशन हो गया है कि बटन छूता हूँ तो फोन सुई चाफ हो जाता है।” मुझे उनकी बात सुनकर हँसी आ गयी। उनके कहने का तात्पर्य यह था कि उनके फोन में कोई ऐसा फंक्शन ऑन हो गया है जिससे उनका फोन स्विच ऑफ हो जाया करता है।ऐसा होता है सीखने और सिखाने का वातावरण।

कम पढ़ा लिखा मजदूर भी किसी अन्य भाषा के शब्द को अपनी भाषा में बोलकर ही अनुभूति का संप्रेषण कर सकता है, इसलिए आवश्यक है कि मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा का होना जिससे बच्चे अपनी भावनाओं का संप्रेषण कर सकें। संसूचना स्थापित हो सके। भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा कही गई बात “निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल ” से मातृभाषा के महत्व को समझा जा सकता है।

साथियों हम दुनिया की चाहे जितनी भाषाएँ सीख लें लेकिन जो गौरव, स्वाभिमान, संतुष्टि और जो मजबूती हमें अपनी मातृभाषा में मिलती है, वह स्थायित्व अन्य कहीं नहीं मिलता। जो गौरव माँ की अंगुली पकड़ कर चलने में मिलता है वह किसी अन्य के साथ नहीं।

प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा के महत्व को देखते हुए भारत की नई शिक्षा नीति में यह सिद्धांत अंगीकृत किया गया है कि प्रत्येक बच्चे की प्राथमिक शिक्षा उसकी मातृभाषा में ही होनी चाहिए। हमें दुनिया की सारी भाषाएँ सीखनी चाहिए किंतु शिक्षा का माध्यम अपनी मातृभाषा में होना चाहिए। हम विश्व के चाहे जिस भाग में निवास कर रहे हो किंतु हमें अपनी आम बोलचाल की भाषा में ही बातें करनी चाहिए। प्राथमिक शिक्षा में तो मातृभाषा कामधेनु के समान है हम जो भी कल्पना करते हैं मातृभाषा उसका प्रकटीकरण आसानी से कर देती है।
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शिक्षक, प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) मोबा. 96510-61092

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