चित्रकूट जनपद के मानिकपुर विकासखंड अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत किहुंनिया से एक ऐसा मामला सामने आया है, जो ग्रामीण विकास योजनाओं की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। आरोप है कि यहां अंत्येष्टि स्थल निर्माण कार्य और मनरेगा के तहत हो रहे अन्य विकास कार्यों में भारी अनियमितताएं बरती जा रही हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि ग्राम प्रधान, सचिव और सप्लायर की मिलीभगत से मानकों की अनदेखी करते हुए सरकारी धन के दुरुपयोग की कोशिश की जा रही है।
📌 निर्माण कार्य में गुणवत्ता पर उठे सवाल
ग्राम पंचायत किहुंनिया में चल रहे अंत्येष्टि स्थल निर्माण कार्य को लेकर ग्रामीणों में असंतोष साफ दिखाई देता है। आरोप है कि लाखों रुपये की लागत से बनने वाले इस स्थल में मानक के अनुरूप सामग्री का उपयोग नहीं किया जा रहा है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पहाड़ी मोरम और गिट्टी का इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि निर्माण कार्य के लिए निर्धारित गुणवत्ता सामग्री का उपयोग अपेक्षित होता है।
यही नहीं, निर्माण में प्रयुक्त ईंटों की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि थर्ड क्वालिटी की ईंटों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे निर्माण की मजबूती और दीर्घकालिक स्थायित्व पर प्रश्न खड़े हो रहे हैं।
⚙️ मनरेगा कार्यों में भी अनियमितताओं के आरोप
सिर्फ अंत्येष्टि स्थल ही नहीं, बल्कि मनरेगा योजना के तहत हो रहे इंटरलॉकिंग खड़ंजा निर्माण कार्यों में भी गड़बड़ियों के आरोप सामने आए हैं। ग्रामीणों के अनुसार, यहां भी स्थानीय गिट्टी और मोरम का उपयोग किया जा रहा है, जिससे निर्माण कार्य की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।
मनरेगा जैसी योजना का उद्देश्य ग्रामीणों को रोजगार देने के साथ-साथ टिकाऊ विकास कार्य कराना होता है, लेकिन यदि गुणवत्ता से समझौता किया जाए तो योजना का मूल उद्देश्य ही प्रभावित हो जाता है।
🤝 मिलीभगत के आरोप: जिम्मेदार कौन?
इस पूरे मामले में ग्राम प्रधान संगीता देवी, सचिव बीरेंद्र सिंह और तकनीकी सहायक सुशील कुमार यादव की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि इन सभी की मिलीभगत से सप्लायर को मनमानी करने की खुली छूट दी गई है, जिसके चलते निर्माण कार्य मानकों के विपरीत किया जा रहा है।
यदि ये आरोप सही हैं, तो यह न केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला है, बल्कि यह सरकारी धन के संभावित दुरुपयोग की ओर भी संकेत करता है।
💰 सरकारी धन और जवाबदेही का सवाल
सरकार द्वारा गांवों के विकास के लिए बड़ी धनराशि आवंटित की जाती है, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं बेहतर हो सकें। लेकिन जब इन योजनाओं में पारदर्शिता की कमी और गुणवत्ता में गिरावट देखने को मिलती है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह धन कहां और कैसे खर्च हो रहा है।
किहुंनिया ग्राम पंचायत का यह मामला इसी व्यापक समस्या की ओर इशारा करता है, जहां योजनाएं तो बनती हैं, लेकिन उनके क्रियान्वयन में गंभीर खामियां सामने आती हैं।
👁️ “चलो गांव की ओर” अभियान की पड़ताल
इस मामले को और गंभीर तब माना गया, जब “चलो गांव की ओर” जागरूकता अभियान के संस्थापक अध्यक्ष संजय सिंह राणा ने स्वयं 11 अप्रैल 2026 को ग्राम पंचायत किहुंनिया का दौरा किया। निरीक्षण के दौरान उन्होंने पाया कि अंत्येष्टि स्थल निर्माण कार्य में कई स्तरों पर अनियमितताएं मौजूद हैं।
स्थल पर मौजूद ग्राम प्रधान प्रतिनिधि के भाई रामकेश ने बताया कि निर्माण कार्य में उपयोग होने वाले पत्थर शंकरगढ़ से मंगाए जा रहे हैं, लेकिन गिट्टी और मोरम स्थानीय पहाड़ों से लाई जा रही है। यह बयान अपने आप में इस बात की पुष्टि करता है कि निर्माण सामग्री के चयन में मानकों का पूरी तरह पालन नहीं किया जा रहा है।
📣 जांच की मांग: क्या होगा अगला कदम?
इस पूरे मामले को लेकर अब शासन और प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग उठने लगी है। बताया गया है कि ग्राम पंचायत में मनरेगा, राज्य वित्त और अन्य ग्राम निधियों से कराए गए कार्यों की जांच के लिए संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखकर कार्रवाई की मांग की जाएगी।
यदि समय रहते इस मामले की जांच नहीं होती है, तो यह केवल एक ग्राम पंचायत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह एक बड़े सिस्टम की खामियों को उजागर कर सकता है।
⚖️ क्या बदलेगी व्यवस्था?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जिला प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेते हुए उचित कार्रवाई करेगा, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा?
यदि निष्पक्ष जांच होती है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है, तो यह न केवल इस गांव के लिए, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक सकारात्मक संदेश होगा। वहीं, यदि मामले को नजरअंदाज किया गया, तो यह व्यवस्था में लोगों के विश्वास को और कमजोर कर सकता है।
🧭 निष्कर्ष: विकास की सच्चाई क्या है?
किहुंनिया ग्राम पंचायत का यह मामला सिर्फ एक निर्माण कार्य की अनियमितता नहीं है, बल्कि यह उस सोच का आईना है, जहां विकास और भ्रष्टाचार के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है।
अब यह प्रशासन पर निर्भर करता है कि वह इस मामले को एक उदाहरण बनाता है या फिर इसे भी अनदेखा कर देता है। क्योंकि अंततः—विकास की असली पहचान कागजों में नहीं, बल्कि जमीन पर दिखती है।
❓ FAQ (सवाल-जवाब)
क्या मामला पूरी तरह प्रमाणित है?
यह रिपोर्ट स्थानीय लोगों के आरोपों और मौके के निरीक्षण पर आधारित है। अंतिम सत्य जांच के बाद ही सामने आएगा।
किस योजना के तहत कार्य हो रहे हैं?
मनरेगा, राज्य वित्त और अन्य ग्राम निधियों के माध्यम से निर्माण कार्य कराए जा रहे हैं।
क्या प्रशासन ने कोई कार्रवाई की है?
फिलहाल जांच की मांग की गई है, प्रशासनिक कार्रवाई की प्रतीक्षा है।








