टपकती छत, भीगती किताबें और सवालों से भरी आंखें—
पाठा के गांव में शिक्षा की सच्चाई

चित्रकूट के ग्रामीण क्षेत्र में जर्जर प्राथमिक विद्यालय, जहां छत से पानी टपक रहा है और बच्चे भीगी जमीन पर बैठकर पढ़ाई कर रहे हैं


संजय सिंह राणा की रिपोर्ट
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संपादकीय टिप्पणी

कायाकल्प की घोषणाओं के बीच भी कई स्कूल आज अपनी जर्जर छतों के नीचे ही टिके हैं। कागज़ों में सुधार दर्ज है, पर ज़मीन पर बच्चे अब भी असुरक्षित माहौल में पढ़ने को मजबूर हैं।
चित्रकूट के पाठा क्षेत्र का यह दृश्य केवल एक विद्यालय की समस्या नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का संकेत है जहां योजनाएं समय पर वास्तविक रूप नहीं ले पातीं। सवाल यह है कि शिक्षा का आधार कब तक ऐसी परिस्थितियों में खड़ा रहेगा। पढ़िए हमारे सहयोगी संजय सिंह राणा की रिपोर्ट का संपादित रूप।- संपादक

चित्रकूट के पाठा क्षेत्र की धरती वैसे तो अपनी सादगी, संघर्ष और मिट्टी की खुशबू के लिए जानी जाती है, लेकिन इसी मिट्टी के एक कोने में आज भी ऐसी कहानी लिखी जा रही है, जिसे पढ़कर विकास के दावे खुद से नज़रें चुराने लगते हैं।
यह कहानी है ग्राम पंचायत छेरिहा खुर्द के पूर्व माध्यमिक विद्यालय की—जहां दीवारें सिर्फ ईंट और गारे की नहीं, बल्कि उपेक्षा और इंतज़ार की भी बनी हैं।

बरसात की एक बूंद यहां सिर्फ आसमान से नहीं गिरती, बल्कि हर टपकती बूंद बच्चों के भविष्य पर भी सवाल बनकर गिरती है। छत से रिसता पानी, भीगती कॉपियां, सिमटते बच्चे और बीच में खड़ा एक शिक्षक—जो पढ़ाने से पहले यह तय करता है कि आज बच्चे बैठेंगे कहां।

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कायाकल्प की कागज़ी चमक, जमीनी अंधेरा

सरकार की “कायाकल्प योजना” का उद्देश्य स्कूलों को चमकाना था, उन्हें बेहतर बनाना था। कागज़ों पर यह योजना सफल भी दिखती है—कहीं रंग-रोगन, कहीं टाइल्स, कहीं नए शौचालय। लेकिन छेरिहा खुर्द का यह विद्यालय उस सूची में नहीं आता, जहां विकास की रोशनी पहुंची हो।
यहां की इमारत इतनी जर्जर है कि हर बारिश के साथ उसका अस्तित्व जैसे थोड़ा और टूट जाता है। छत ऐसी कि मानो बादलों से सीधी दोस्ती हो—बारिश शुरू होते ही बूंदें अंदर उतर आती हैं, बिना किसी रोक-टोक के।

जब कक्षा नहीं, संघर्ष पढ़ाया जाता है

यहां बच्चे सिर्फ किताबों से नहीं सीखते, बल्कि हालात से भी सीखते हैं। जब बारिश होती है, तो पढ़ाई रुकती नहीं—बस बदल जाती है। कोई कोने में सिमट जाता है, कोई खिड़की के पास खड़ा हो जाता है, तो कोई अपनी कॉपी को बचाने की जुगत में लगा रहता है।

प्रधानाध्यापक श्री देव कुमार यादव की आवाज़ में एक थकान है, जो सिर्फ शब्दों से नहीं, अनुभव से आती है। वे बताते हैं कि कई बार अधिकारियों को इस जर्जर भवन की शिकायत भेजी गई, लेकिन हर बार जवाब वही—”देखा जाएगा”, “प्रक्रिया में है”, “स्टीमेट बन रहा है”।

लेकिन इस “प्रक्रिया” के बीच हर दिन बच्चे उसी छत के नीचे बैठते हैं, जो कभी भी जवाब दे सकती है।

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पाठा की चुप्पी में छिपी चीख

“जीत आपकी चलो गांव की ओर” अभियान के संस्थापक अध्यक्ष संजय सिंह राणा जब 17 मार्च 2026 को इस विद्यालय पहुंचे, तो उन्हें सिर्फ एक स्कूल नहीं मिला—बल्कि एक सच्चाई मिली, जो अक्सर आंकड़ों में छुप जाती है।

उन्होंने बच्चों से बात की। एक मासूम छात्रा ने कहा— “जब पानी गिरता है, तो हम कहीं भी नहीं बैठ पाते… लेकिन पढ़ाई करनी होती है, तो ऐसे ही बैठ जाते हैं।”

यह वाक्य छोटा है, लेकिन इसके भीतर एक पूरी व्यवस्था की विफलता समाई हुई है।

अधिकारियों के वादे और जमीन की हकीकत

खंड शिक्षा अधिकारी मिथिलेश कुमार ने इस स्थिति को स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि स्टीमेट तैयार कराकर आगे भेजा जाएगा और जल्द ही कायाकल्प होगा।

लेकिन पाठा के गांवों में “जल्द” शब्द अक्सर बहुत लंबा हो जाता है—इतना लंबा कि बच्चे प्राथमिक से माध्यमिक तक पहुंच जाते हैं, लेकिन स्कूल की छत वैसी की वैसी रहती है।

दो कमरों के सहारे टिके सपने

विद्यालय में दो कक्षीय भवन है, जो अभी तक किसी तरह शिक्षण कार्य को संभाले हुए है। लेकिन बाकी हिस्सा पूरी तरह जर्जर है। अगर ये दो कमरे भी जवाब दे दें, तो यहां शिक्षा का चूल्हा पूरी तरह ठंडा पड़ जाएगा।

यह सोचकर ही सिहरन होती है कि जिस जगह बच्चों को सपने देखने चाहिए, वहां वे डर के साये में बैठकर पढ़ाई कर रहे हैं।

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चित्रकूट से उठते असहज सवाल

विकास के नक्शे में खोया एक गांव

छेरिहा खुर्द कोई अकेली कहानी नहीं है। यह पाठा के उन कई गांवों का चेहरा है, जो योजनाओं के नक्शे में तो शामिल हैं, लेकिन जमीन पर अब भी इंतज़ार में खड़े हैं।
यहां सड़कें आधी हैं, सुविधाएं अधूरी हैं, और शिक्षा—वह तो जैसे किसी भरोसे पर टिकी हुई है।

आखिर सवाल किससे है?

यह सवाल सिर्फ एक विद्यालय का नहीं है। यह सवाल उस व्यवस्था से है, जो बच्चों को “भविष्य” कहती है, लेकिन उनके वर्तमान को सुरक्षित नहीं कर पाती।
क्या कायाकल्प सिर्फ दीवारों का होना चाहिए, या उन बच्चों के विश्वास का भी, जो हर दिन उसी जर्जर छत के नीचे बैठकर उम्मीद करते हैं कि शायद आज कुछ बदल जाएगा?

अंत में…

छेरिहा खुर्द का यह विद्यालय सिर्फ एक खबर नहीं है—यह एक आईना है। एक ऐसा आईना, जिसमें सरकार, प्रशासन और समाज—तीनों को अपना चेहरा देखना चाहिए।
क्योंकि जब छत टपकती है, तो सिर्फ पानी नहीं गिरता… बल्कि धीरे-धीरे भरोसा भी रिसने लगता है।


FAQ

कायाकल्प योजना क्या है?

यह योजना सरकारी विद्यालयों के बुनियादी ढांचे को सुधारने और उन्हें स्वच्छ व आकर्षक बनाने के लिए चलाई जाती है।

विद्यालय की मुख्य समस्या क्या है?

विद्यालय की बिल्डिंग जर्जर है और बरसात में छत टपकती है, जिससे बच्चों को असुरक्षित माहौल में पढ़ना पड़ता है।

प्रशासन ने क्या कहा?

खंड शिक्षा अधिकारी ने बताया कि स्टीमेट बनाकर आगे भेजा जाएगा और जल्द ही मरम्मत कार्य कराया जाएगा।

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