
इंट्रो
कभी-कभी एक साधारण यात्रा भी ऐसी कहानी बन जाती है, जिसमें मिट्टी की खुशबू, लोगों की सादगी और जीवन की असली धड़कन एक साथ सुनाई देने लगती है। कुछ ऐसा ही अनुभव तब हुआ जब संपादक अपने पुराने सहयोगी चुन्नीलाल प्रधान से मिलने उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के करनैलगंज पहुँचे। मन में एक हल्की-सी उत्सुकता भी थी—क्या सचमुच “समाचार दर्पण” के नाम से चुन्नीलाल इलाके में किसी बड़ी शख्सियत की तरह पहचाने जाते होंगे? लेकिन गाँव की पगडंडी पर उतरते ही समझ आ गया कि यहाँ पहचान अखबार की सुर्खियों से नहीं, बल्कि खेतों की मिट्टी, लोगों के भरोसे और सहज जीवन से बनती है। यहीं से शुरू हुई एक दिलचस्प मुलाकात—सरसों के खेत से लेकर रात की गहराती बातचीत तक, जिसमें खेती, परिवार, गाँव की परंपराएँ और आने वाले पंचायत चुनाव तक की बातें धीरे-धीरे खुलती चली गईं।
गाँव की पगडंडी और प्रधान की तलाश
गाड़ी सड़क के किनारे खड़ी थी। हल्की धूल उड़ती हुई जैसे रास्तों की पुरानी कहानियाँ सुना रही थी। संपादक ने काँच नीचे किया और एक अधेड़ आदमी से पूछा, “भइया, यहाँ चुन्नीलाल प्रधान का घर किधर पड़ेगा?”
वह आदमी पहले तो थोड़ा ठिठका, फिर बोला, “कौन प्रधान? चुन्नीलाल? अरे ऊ तो खेत पर मिलिहैं इस बखत। सरसों कटत है उधर, टावर के पास।”
संपादक ने मन ही मन सोचा, चलो, खोजी पत्रकारिता का पहला सुराग मिल गया। पर जो अंदाज़ था, उसमें थोड़ी निराशा भी थी। उसे लगता था कि “समाचार दर्पण” के नाम से शायद लोग तुरंत चौकन्ने हो जाएंगे, जैसे कोई बड़ी खबर की तोप आ गई हो। लेकिन यहाँ तो लोग अपनी लय में थे। दो-तीन लोग तो बिना सुने ही आगे निकल गए। गाँव की चाल शहर की तरह उत्सुक नहीं होती, वह अपनी गति से ही चलती है।
सरसों के खेत में मिली सादगी
खैर, कार धीरे-धीरे कच्चे रास्ते की ओर मुड़ी। आगे सरसों के पीले खेत दूर तक ऐसे फैले थे जैसे धरती ने खुद कोई उजली चादर ओढ़ ली हो। वहीं एक तरफ ट्रैक्टर खड़ा था और दो-तीन आदमी बोरे लाद रहे थे।
संपादक ने कार से उतरकर आवाज दी, “भइया, चुन्नीलाल प्रधान कौन हैं?” ट्रैक्टर के पास खड़े दुबले-पतले आदमी ने हाथ से इशारा किया और मुस्कुराकर बोला, “हम ही हईं… बताईं, कइसे आना भा?”
संपादक एक पल के लिए चुप रह गया। सामने जो आदमी था, उसमें प्रधान जैसी कोई ठसक नहीं थी। धोती पर हल्की मिट्टी, कंधे पर गमछा, और चेहरे पर वही सादा मुस्कान। लगा जैसे यह आदमी तो गाँव की मिट्टी से ही उग आया हो।
खेत से शुरू हुई बातचीत
संपादक ने हाथ मिलाते हुए कहा, “अरे प्रधान जी! हम तो समझ रहे थे बड़ा आदमी मिलेंगे, यहाँ तो आप खुद खेत में मजदूरी कर रहे हैं!”
चुन्नीलाल हँस पड़े। “का करब बाबू, हम भी किसान हईं। खेत छोड़ के कुर्सी पर बैठ जाएँ तो गाँव वाले पहिले ही उतार फेंकिहैं।”
ट्रैक्टर में सरसों की बोरियाँ लादते-लादते दोनों की बातचीत शुरू हो गई। संपादक सवाल पूछता जाता, प्रधान जवाब देते जाते।
“खेती कैसी चल रही है आजकल?”
चुन्नीलाल ने गमछे से पसीना पोंछते हुए कहा, “खेती अब खेती कहाँ रह गई है बाबूजी, जुआ बन गई है। कभी मौसम मार देता है, कभी दाम गिर जाता है। किसान की हालत वही है—जितना बोओ उतना चिंता उगती है।”
संपादक ने नोटबुक निकाली तो प्रधान हँसकर बोले, “अरे नोट मत बनाइए, पहले घर चलिए। खेत में बात अधूरी रह जाती है।”
गाँव की चौपाल और परंपराओं की चर्चा
थोड़ी देर बाद दोनों प्रधान के घर की ओर बढ़ चले। रास्ते में छोटे-छोटे घर, खपरैल की छतें, और दरवाज़ों पर बैठे बुजुर्ग। हर कोई प्रधान को देखकर नमस्ते करता। यह देखकर संपादक को समझ में आने लगा कि यहाँ “मशहूरी” अखबार की सुर्खियों से नहीं, बल्कि लोगों के दिल से मिलती है।
घर पहुँचते ही आँगन में चारपाई बिछ गई। चूल्हे से धुआँ उठ रहा था। प्रधान की पत्नी ने पानी रखा और मुस्कुराकर बोलीं, “शहर से मेहमान आए हैं, कुछ खास बनाना पड़ेगा।”
अब बात खेती से निकलकर गाँव की परंपराओं पर आ गई। प्रधान बताने लगे कि यहाँ अभी भी कई पुराने रीति-रिवाज जिंदा हैं—फसल कटने पर सामूहिक भोज, बरसात में कजरी के गीत, और शादी-ब्याह में पूरा गाँव एक परिवार की तरह जुट जाता है। धीरे-धीरे बातचीत परिवार तक पहुँच गई।
परिवार और पंचायत की बातें
संपादक ने पूछा, “आपके बच्चे क्या करते हैं?”
प्रधान बोले, “एक शहर में पढ़ रहा है, दूसरा यहीं खेती संभालता है। हम चाहते हैं पढ़े-लिखे भी रहें और जमीन से भी जुड़े रहें।”
इतने में मेज पर दो गिलास रखे गए। प्रधान ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “थोड़ा मीडियम पैग हो जाए? गाँव की चर्चा बिना इसके अधूरी रहती है।”
अब माहौल थोड़ा हल्का हो गया। बातचीत का विषय अचानक पंचायत चुनाव की ओर मुड़ गया।
संपादक ने गंभीर लहजे में पूछा, “इस बार चुनाव में क्या माहौल है?”
चुन्नीलाल ने गिलास रखते हुए कहा, “माहौल तो वही है बाबू… लोग अब वादे कम सुनते हैं, काम ज्यादा देखते हैं। गाँव में राजनीति भी खेती जैसी है—अगर जमीन भरोसे की न हो तो फसल नहीं उगती।”
गाँव की रात और बदलती तारीख
संपादक के सवाल और प्रधान के जवाब ऐसे चल रहे थे जैसे कोई लाइव इंटरव्यू हो। बीच-बीच में हँसी भी फूट पड़ती, और कभी-कभी बात गंभीर मोड़ भी ले लेती।
खाना आ गया—गरम रोटी, सरसों का साग, और देसी घी की खुशबू। बातचीत का सिलसिला चलता रहा।
जब आख़िरी कौर खत्म हुआ तो संपादक ने घड़ी देखी। वह अचानक चौंक गया।
“अरे! तारीख बदल गई!”
प्रधान ने हँसते हुए कहा, “गाँव में घड़ी नहीं चलती बाबूजी, यहाँ तो बातों का समय चलता है।”
सरसों के खेतों से लौटता संपादक
अब चर्चा गोंडा स्टेशन की होने लगी। संपादक को अगली यात्रा के लिए ट्रेन पकड़नी थी। गाड़ी स्टार्ट हुई। जाते-जाते संपादक ने खिड़की से बाहर देखा—सरसों के खेत फिर से पीले समंदर की तरह चमक रहे थे।
उसने मन ही मन सोचा—आज पता चला कि असली खबरें अखबार के दफ्तर में नहीं, इन खेतों और आँगनों में सांस लेती हैं… और चुन्नीलाल प्रधान कोई तोप नहीं, बल्कि इस मिट्टी की सादगी का जिंदा उदाहरण है। 🌾
FAQ
चुन्नीलाल प्रधान कहाँ के निवासी हैं?
चुन्नीलाल प्रधान उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के करनैलगंज क्षेत्र के निवासी हैं और खेती के साथ ग्रामीण समाज में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
संपादक उनसे मिलने क्यों पहुँचे थे?
संपादक अपने पुराने सहयोगी चुन्नीलाल प्रधान से मिलने और ग्रामीण जीवन की सादगी व अनुभवों को समझने के लिए करनैलगंज पहुँचे थे।
इस मुलाकात से क्या संदेश मिलता है?
यह मुलाकात बताती है कि असली पहचान पद या प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि लोगों के भरोसे, सादगी और जमीन से जुड़े जीवन से बनती है।










