संपादक की ठिठोली में पाठा की तकलीफ:
फोन पर छिड़ी बातचीत में खुली पाठा की मार्मिक सच्चाई

बुंदेलखंड के पाठा क्षेत्र पर चर्चा करते हुए समाचार दर्पण के संपादक और पत्रकार संजय सिंह राणा का फोन संवाद, पृष्ठभूमि में बुंदेलखंड का नक्शा

संक्षिप्त विवरण: बुंदेलखंड के चित्रकूट जनपद का पाठा क्षेत्र लंबे समय से विकास की मुख्यधारा से दूर रहा है। पानी की किल्लत, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियाँ आज भी यहाँ के आदिवासी समाज के जीवन को कठिन बनाती हैं। इसी जमीनी हकीकत को समझने के लिए समाचार दर्पण के संपादक और चित्रकूट के सक्रिय पत्रकार संजय सिंह राणा के बीच हुआ यह दूरभाष संवाद पाठा की अनसुनी कहानी को सामने लाता है। हल्की ठिठोली और आत्मीय बातचीत के बीच यह संवाद न केवल क्षेत्र की समस्याओं को उजागर करता है, बल्कि उन उम्मीदों और संभावनाओं पर भी रोशनी डालता है, जो आज भी इस पथरीली धरती के लोगों के जीवन को बदलने की प्रतीक्षा कर रही हैं।

सुबह के अख़बारों की महक अभी कमरे में तैर ही रही थी। मेज पर बुंदेलखंड का नक्शा पसरा था और उस नक्शे में एक कोना बार-बार मेरी नज़र पकड़ रहा था… पाठा क्षेत्र। मैंने चाय का कप उठाया, एक घूंट लिया और मन ही मन सोचा,
“देश में स्मार्ट सिटी बन रही हैं, लेकिन पाठा में अभी भी स्मार्ट कुआँ तक नसीब नहीं।”

बस फिर क्या था। पत्रकारिता की खुजली उठी और हमने फोन उठा लिया। नंबर डायल हुआ और उधर से आवाज आई।

संपादक:
साठा का पाठा “राणा”
कैसे हैं? और सबसे पहले यह बताइए कि आज पाठा में सूरज निकला है या फिर विकास की कोई योजना रास्ता पूछते हुए भटक रही है?”

संजय सिंह राणा:
(हंसते हुए)
“नमस्कार संपादक जी।
सूरज तो रोज निकलता है, लेकिन योजनाओं की किस्मत सूरज से थोड़ी कमजोर है। वे अक्सर फाइलों की धूप में ही तपती रह जाती हैं।”

संपादक:
“वाह! मतलब पाठा में योजनाएँ भी शायद आदिवासियों की तरह धैर्यवान हो गई हैं।
चलिये, आज ज़रा पाठकों को बताइए कि यह पाठा क्षेत्र आखिर है क्या? कई लोग बुंदेलखंड जानते हैं, लेकिन पाठा का नाम सुनते ही गूगल भी थोड़ा सोचने लगता है।”

संजय सिंह राणा:
“बिल्कुल सही कहा सर आपने।
पाठा क्षेत्र बुंदेलखंड का वह हिस्सा है जो मुख्य रूप से चित्रकूट जिले के मानिकपुर और आसपास के इलाकों में फैला हुआ पठारी और वन क्षेत्र है। यहाँ बड़ी संख्या में कोल और अन्य आदिवासी समुदाय रहते हैं। सदियों से इनका जीवन जंगल, पहाड़ और मेहनत के साथ जुड़ा रहा है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आजादी के इतने दशकों बाद भी यह इलाका विकास की दौड़ में काफी पीछे रह गया है।”

संपादक:
“राणा जी, एक बात बताइए… क्या यह सच है कि पाठा में विकास योजनाएँ हेलीकॉप्टर से ही दिखाई देती हैं? जमीन पर उतरते ही शायद उनका मन बदल जाता होगा!”🤓

संजय सिंह राणा:
“आपका व्यंग्य बहुत सटीक है। कई बार योजनाएँ बनती हैं, बजट भी आता है, लेकिन ज़मीन तक पहुँचते-पहुँचते उनकी रफ्तार कम हो जाती है। भौगोलिक कठिनाइयाँ भी बड़ी वजह हैं, क्योंकि यह इलाका पहाड़ी और वन क्षेत्र है।”

संपादक:
“अब आते हैं सबसे बड़ी समस्या पर। पाठा का नाम लेते ही सबसे पहले पानी की समस्या का जिक्र होता है। क्या सच में हालात इतने खराब हैं?”

संजय सिंह राणा:
“जी हाँ, पानी यहाँ सबसे गंभीर समस्या है। पाठा की जमीन पत्थरीली है और भूजल बहुत गहराई में मिलता है। गर्मी के मौसम में कई कुएँ और तालाब सूख जाते हैं। कई गाँवों में महिलाएँ दो से तीन किलोमीटर दूर से पानी लाती हैं। यह रोज़मर्रा का संघर्ष है।”

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संपादक:
“मतलब पाठा की महिलाओं का फिटनेस लेवल शहर के जिम जाने वालों से बेहतर होगा!”😅

संजय सिंह राणा:
(हल्की मुस्कान के साथ)
“यह बात आपने मजाक में कही है संपादक जी, लेकिन इसके पीछे एक बहुत कठोर और दर्दनाक वास्तविकता छिपी है। पाठा क्षेत्र में पानी की तलाश केवल रोजमर्रा का काम नहीं, बल्कि कई परिवारों के लिए जीवन का संघर्ष बन चुकी है।
खासकर महिलाओं की स्थिति यहाँ सबसे अधिक कठिन है। सुबह की पहली रोशनी के साथ ही कई घरों की महिलाएँ और किशोरियाँ घड़े, बाल्टी या पीतल के लोटे लेकर दो से तीन किलोमीटर दूर तक पानी की तलाश में निकल पड़ती हैं। कई बार रास्ता पथरीला होता है, गर्मियों में धरती तप रही होती है, और सिर पर पानी का भार लिए उन्हें कई चक्कर लगाने पड़ते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में उनका काफी समय और शारीरिक श्रम लग जाता है। कई किशोरियाँ स्कूल जाने की बजाय घर के पानी की जिम्मेदारी निभाने में लग जाती हैं। बुजुर्ग महिलाएँ भी इस बोझ से मुक्त नहीं हैं।
इसलिए जब हम पाठा की जल समस्या की बात करते हैं तो यह सिर्फ प्यास की कहानी नहीं होती, बल्कि उन महिलाओं की पीड़ा की कहानी भी होती है जिनके दिन का बड़ा हिस्सा पानी की तलाश में बीत जाता है।
और सच कहूँ तो, संपादक जी, जब कोई शहर में बैठकर यह सुनता है तो उसे यह एक आँकड़ा लगता है, लेकिन पाठा की पगडंडियों पर चलने वाली उन महिलाओं के लिए यह रोज का कठिन सच है।”

संपादक:
“तो क्या सरकार के हैंडपंप और पाइपलाइन योजनाएँ इस समस्या को हल नहीं कर पा रही हैं?”

संजय सिंह राणा:
“कुछ जगहों पर जरूर राहत मिली है, लेकिन कई स्थानों पर हैंडपंप खराब पड़े हैं या पानी बहुत कम निकलता है। सबसे बड़ी जरूरत है जल संरक्षण की योजनाओं की। यदि तालाबों का पुनर्जीवन, चेकडैम और वर्षा जल संचयन पर गंभीरता से काम किया जाए तो स्थिति बेहतर हो सकती है।”

संपादक:
“राणा जी, अब थोड़ा स्वास्थ्य की तरफ चलते हैं। क्योंकि हमने सुना है कि पाठा में बीमारी से ज्यादा मरीज को अस्पताल तक पहुँचाना बड़ा इलाज होता है!”

संजय सिंह राणा:
“यह बिल्कुल सही बात है। कई गाँवों से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 15–20 किलोमीटर दूर हैं। सड़कें भी कई जगह खराब हैं। कई बार मरीजों को चारपाई पर लादकर या मोटरसाइकिल से अस्पताल ले जाना पड़ता है।”

संपादक:
“मतलब एम्बुलेंस अगर समय पर पहुँच जाए तो उसे पाठा में ‘अतिथि देवो भव’ जैसा सम्मान मिलना चाहिए!”

संजय सिंह राणा:
“कह सकते हैं सर।
एम्बुलेंस सेवाएँ मौजूद हैं, लेकिन दूरदराज के गाँवों तक समय पर पहुँचना हमेशा संभव नहीं होता। इसके अलावा कई स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की कमी भी है।”

संपादक:
“अब एक थोड़ा शरारती सवाल…अगर पाठा की समस्याएँ इतनी पुरानी हैं, तो क्या सरकारी फाइलों में भी इनकी उम्र पेंशन लेने लायक हो चुकी होगी?”🤓

संजय सिंह राणा:
(हंसते हुए)
“आपका सवाल व्यंग्यपूर्ण है, लेकिन सच यही है कि योजनाएँ लंबे समय से बनती रही हैं। समस्या यह है कि उनका सही क्रियान्वयन और निगरानी अक्सर कमजोर रहती है।”

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संपादक:
“तो क्या यह कहा जा सकता है कि पाठा की समस्या सिर्फ पानी और अस्पताल की नहीं, बल्कि पूरे विकास मॉडल की है?”

संजय सिंह राणा:
“बिल्कुल। यही बात है।
पाठा की समस्या को समझने के लिए सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों को भी समझना होगा। यहाँ रहने वाले आदिवासी समुदाय की अपनी जीवन शैली और जरूरतें हैं। विकास की योजनाएँ तभी सफल होंगी जब वे इन वास्तविकताओं के अनुसार बनाई जाएँगी।”

संपादक :
आज 12 साल से आप समाचार दर्पण के लिए सतत काम कर रहे हैं, बल्कि सच्चाई है कि आज आप समाचार दर्पण के पर्याय बन गए हैं बुंदेलखंड में। आपको हमारी डेढ़ दशक के साथी पाठकों की कैसी प्रतिक्रिया मिलती है समाचार के बारे में, स़पादन और प्रस्तुति के मुताल्लिक ❓

संजय सिंह राणा:
(हल्की हँसी के साथ)
“देखिए संपादक जी, आपने सवाल भी ऐसा पूछा है कि अगर ज़्यादा सच बोल दूँ तो लोग कहेंगे राणा अपनी तारीफ़ खुद कर रहा है, और अगर कम बोलूँ तो पाठक नाराज़ हो जाएंगे कि हमारे मन की बात क्यों नहीं कही।
पिछले बारह वर्षों में समाचार दर्पण ने बुंदेलखंड में सिर्फ एक अख़बार या पोर्टल के रूप में जगह नहीं बनाई, बल्कि धीरे-धीरे यह एक विश्वसनीय न्यूज़ प्लेटफॉर्म के रूप में पहचाना जाने लगा है। आज स्थिति यह है कि चित्रकूट, बांदा, महोबा और आसपास के इलाकों में जब कोई बड़ी स्थानीय खबर होती है तो लोग अक्सर कहते हैं —
‘देखो, समाचार दर्पण पर क्या आया है।’
यानी लोग इसे केवल खबर का स्रोत नहीं, बल्कि तथ्यों की पुष्टि करने वाली भरोसेमंद वेबसाइट के रूप में देखने लगे हैं।
जहाँ तक पाठकों की प्रतिक्रिया की बात है, तो सबसे दिलचस्प बात यह है कि अब प्रतिक्रिया सिर्फ चाय की दुकानों या चौपालों तक सीमित नहीं रही। आज लोग सोशल मीडिया, व्हाट्सएप और वेबसाइट के कमेंट्स के माध्यम से भी अपनी राय देते हैं। कई बार पाठक सीधे फोन करके भी कहते हैं कि ‘आज की खबर में आपने जो सवाल उठाया है, वह बिल्कुल हमारे गाँव की समस्या है।’
और सच कहूँ तो संपादन और प्रस्तुति को लेकर भी पाठकों की खास प्रतिक्रिया मिलती है। लोग कहते हैं कि समाचार दर्पण की खबरों में सिर्फ सूचना नहीं होती, बल्कि संदर्भ और विश्लेषण भी होता है। यही चीज़ इसे सामान्य न्यूज़ अपडेट से अलग बनाती है।
कई युवा पाठक तो यह भी कहते हैं कि उन्हें समाचार दर्पण इसलिए पसंद है क्योंकि यहाँ खबरें सरल लेकिन प्रभावी भाषा में मिलती हैं, जिसमें स्थानीय संवेदनाएँ भी दिखती हैं और व्यापक दृष्टि भी।
इसलिए अगर एक वाक्य में कहूँ तो आज बुंदेलखंड में समाचार दर्पण सिर्फ एक समाचार माध्यम नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद डिजिटल न्यूज़ पहचान बन चुका है।
और संपादक जी, इसका सबसे बड़ा श्रेय उन पाठकों को जाता है जो वर्षों से इसे पढ़ते भी हैं, परखते भी हैं और ज़रूरत पड़ने पर टोकते भी हैं।” 😄📰

संपादक:
राणा
एक गंभीर शरारती सवाल🤓
आप संस्थान के पहले व्यक्ति हैं जिसके लिए हमने खास स्तंभ, चलो गाँव की ओर, गुस्ताख दिल, चौपाल, चित्रकूट के घाट पर जैसे स्तंभों की शुरुआत की जो आगे बढ़ कर देश में स्थापित हो गया । टीम से भी आपको स्नेह मिलता रहा है । मेरा तो नाहक गुस्सा भी आपको दुखी करता नहीं लेकिन अब तक आपको “दिल💜❤ किससे लगी” और “लत किसकी लगी”❓ 🤓

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संजय सिंह राणा:
(फोन के उस पार हल्की हँसी सुनाई देती है)
“संपादक जी, यह तो आपने बड़ा शरारती सवाल पूछ लिया। अभी तक तो हम पानी, स्वास्थ्य और योजनाओं की बात कर रहे थे, और अचानक आपने दिल की फाइल खोल दी। लेकिन सच कहूँ तो समाचार दर्पण के साथ बीते इन वर्षों में जो रिश्ता बना है, वही मेरे लिए सबसे बड़ी लगन भी है और सबसे बड़ी लत भी।
आपने जिन स्तंभों का जिक्र किया — ‘चलो गाँव की ओर’, ‘गुस्ताख दिल’, ‘चौपाल’ और ‘चित्रकूट के घाट पर’ — ये सिर्फ कॉलम नहीं रहे, बल्कि मेरे लिए उन रास्तों की तरह बन गए जिनके सहारे मैं गाँव-गाँव की कहानी लोगों तक पहुँचा पाया।
कई बार तो ऐसा हुआ कि किसी दूर के गाँव में जब मैं रिपोर्टिंग के लिए पहुँचा, तो वहाँ के बुजुर्ग या नौजवान मुस्कुराकर कहते थे,
‘अरे, आप वही राणा जी हैं ना जो चौपाल में लिखते हैं?’
उस समय लगता था कि पत्रकारिता सिर्फ खबर लिखना नहीं है, बल्कि लोगों के जीवन से जुड़ने का माध्यम है।
जहाँ तक आपकी बात है संपादक जी, आपका गुस्सा भी हमने हमेशा उसी तरह लिया जैसे गुरु की डांट। क्योंकि उसके पीछे हमेशा एक ही बात रही — खबर बेहतर होनी चाहिए और पत्रकारिता की साख बनी रहनी चाहिए।
अब आपने “दिल” और “लत” की बात पूछी है तो खुलकर कह देता हूँ —😅
दिल तो हमेशा इस मिट्टी से लगा रहा, इन गाँवों से, इन लोगों से और उनकी कहानियों से।
और लत अगर किसी चीज़ की लगी है तो वह है सच्ची पत्रकारिता की।
क्योंकि जब एक बार किसी पत्रकार को गाँव की पगडंडी, चौपाल की बातचीत और लोगों की उम्मीदों की आवाज़ सुनने की आदत लग जाती है, तो फिर वह लत छूटती नहीं… बल्कि हर दिन और गहरी होती जाती है।
और शायद यही वजह है कि इतने वर्षों बाद भी जब फोन बजता है और उधर से आपकी आवाज़ आती है — ‘राणा जी, कोई नई खबर है?’
तो दिल कहता है,
चलो… फिर से गाँव की ओर।” 😄📰

संपादक:
“ठीक है राणा जी, अब आखिरी सवाल।
क्या पाठा की कहानी हमेशा संघर्ष की ही रहेगी, या भविष्य में कोई उम्मीद भी दिखती है?”

संजय सिंह राणा:
“उम्मीद हमेशा रहती है। कुछ स्वयंसेवी संस्थाएँ जल संरक्षण और स्वास्थ्य जागरूकता पर काम कर रही हैं। यदि सरकार, प्रशासन और समाज मिलकर गंभीर प्रयास करें तो पाठा के हालात जरूर बदल सकते हैं।”

फोन रख दिया गया, लेकिन बातचीत की गूंज देर तक कमरे में तैरती रही।
पाठा की कहानी सिर्फ बुंदेलखंड के एक इलाके की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जो अब भी पानी की हर बूंद और इलाज की हर संभावना के लिए संघर्ष कर रहा है।
और शायद पत्रकारिता का काम भी यही है कि इन आवाजों को लगातार सामने लाया जाए, ताकि विकास की रोशनी उन पहाड़ियों तक भी पहुँचे जहाँ आज भी उम्मीद प्यास के साथ चलती है।

नोट- यह प्रस्तुति विचार मूलक है और किसी को भी इशारा करते हुए नहीं लिखा गया है।
प्रस्तुति- चुन्नीलाल प्रधान

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