
हरीश चन्द्र गुप्ता की प्रस्तुति बहुत दिनों बाद संपादक का “गुस्ताख दिल” फिर से गांवों की ओर निकल पड़ा। इस बार दिशा बदली थी। रास्ता उत्तर प्रदेश के परिचित गांवों से निकलकर छत्तीसगढ़ राज्य के बिलासपुर परिक्षेत्र की ओर मुड़ गया था।
कभी-कभी पत्रकारिता केवल खबर लिखने का काम नहीं होती, बल्कि समाज की नब्ज़ को महसूस करने की प्रक्रिया भी होती है। बहुत दिनों बाद संपादक का “गुस्ताख दिल” फिर से मैदान में उतर आया। इस बार यात्रा का रुख उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल से निकलकर छत्तीसगढ़ के उस भूभाग की ओर मुड़ा, जहां गांव आज भी अपनी सादगी, संघर्ष और उम्मीदों के साथ जीवित हैं।
छत्तीसगढ़ राज्य के बिलासपुर परिक्षेत्र के गांवों की यह यात्रा किसी औपचारिक रिपोर्टिंग का हिस्सा नहीं थी। यह उस जिज्ञासा की उपज थी जो हर संवेदनशील पत्रकार के भीतर समय-समय पर सिर उठाती है—क्या सचमुच गांव बदल रहे हैं? क्या सरकारी योजनाओं की चमक गांवों की मिट्टी तक पहुंच रही है? और सबसे बड़ा सवाल, क्या गांवों के लोग अपनी समस्याएं खुलकर कह पा रहे हैं?
गांव की पगडंडी पर शुरू हुई बातचीत
बिलासपुर शहर की चहल-पहल से बाहर निकलते ही सड़क धीरे-धीरे संकरी होने लगी। शहर का शोर पीछे छूट गया और सामने फैल गईं खेतों की हरियाली, मिट्टी के घर, और उन घरों के सामने बैठे लोग—जिनके चेहरे पर जीवन के अनुभव साफ दिखाई देते हैं।
गांव की पहली चौपाल पर पहुंचते ही हरीश चन्द्र गुप्ता ने बातचीत की शुरुआत औपचारिक भाषा में नहीं, बल्कि उसी स्थानीय बोली में की जिसे वहां के लोग सहजता से समझते हैं। यह पत्रकारिता का वह तरीका है जो केवल सवाल पूछने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लोगों के भीतर छिपे विश्वास को जगाता है।
धीरे-धीरे गांव के लोग इकट्ठा होने लगे। कुछ बुजुर्ग, कुछ किसान, कुछ महिलाएं और कुछ युवा—सबके पास अपनी-अपनी कहानी थी।
पत्रकारिता के शोर-शराबे से दूर, यह यात्रा किसी सनसनीखेज खबर की तलाश में नहीं थी। यह यात्रा उस समाज को समझने की कोशिश थी जो शहरों की सुर्खियों से अक्सर दूर रह जाता है।
इस यात्रा में साथ थे सामाजिक कार्यकर्ता हरीश चन्द्र गुप्ता, जिनका अपना भी एक “गुस्ताख दिल” है—जो अक्सर गांवों में जाकर लोगों से उनकी भाषा में बात करना पसंद करता है।
सबसे पहले बातचीत खेतों से शुरू हुई। एक किसान ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “खेती अब पहले जैसी नहीं रही।”
उसकी बात में कोई शिकायत नहीं थी, लेकिन एक गहरी चिंता जरूर थी। उसने बताया कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि फसल का दाम अक्सर उम्मीद के मुताबिक नहीं मिलता।
एक बुजुर्ग किसान ने कहा, “पहले गांव की खेती गांव के लिए होती थी, अब बाजार के लिए हो गई है। लेकिन बाजार का रास्ता किसान के लिए हमेशा आसान नहीं होता।”
हरीश चन्द्र गुप्ता का मानना है कि अगर गांव की समस्या समझनी है, तो गांव की बोली में बात करनी होगी। वही बोली जिसमें गांव का आदमी खुलकर अपनी बात कहता है।
पहली चौपाल, पहला सवाल
बिलासपुर शहर से बाहर निकलते ही सड़क धीरे-धीरे खेतों और छोटे-छोटे गांवों के बीच से गुजरने लगी। कुछ ही देर में एक गांव की चौपाल पर पहुंच गए।
हरीश चन्द्र गुप्ता ने वहां बैठे बुजुर्गों से मुस्कुराते हुए पूछा—
“का हाल हव काका, गांव में सब बढ़िया चलत हव न?”
एक बुजुर्ग ने बीड़ी सुलगाते हुए जवाब दिया—
“का बताबो बाबू… जिनगी त चलत हव, फेर दिक्कत घलो कम नइये।”
बातचीत शुरू हुई तो धीरे-धीरे गांव के लोग भी इकट्ठा होने लगे।
खेती की चिंता
एक किसान ने खेत की ओर इशारा करते हुए कहा— “देखव बाबू, माटी त अभी घलो उपजाऊ हव, फेर खेती अब पहिली जइसन नइ रहिस। खाद, बीज, दवाई सब महंगा होगे हव… अउ धान के दाम ओतका नइ मिलय।”
दूसरे किसान ने भी बात आगे बढ़ाई—
“हमन दिन भर खेत मं खटथन, फेर बजार मं धान बेचके जऊन पैसा मिलथे, ओसे घर चलाना मुस्किल हो जाथे।”
उनकी आवाज़ में शिकायत से ज्यादा थकान थी।
पानी की कहानी
गांव की महिलाओं से बातचीत शुरू हुई तो एक महिला ने हंसते हुए कहा— “तुमन शहर ले आय हव, तुमन ला का पता गांव मं पानी के झंझट।”
हरीश चन्द्र गुप्ता ने पूछा—
“का दिक्कत हव दीदी?”
महिला बोली— “गर्मी आथे त नल मं पानी कम आथे। कई बेर बिहान-बिहान उठके दूर ले पानी लाना पड़थे। सरकार नल त लगाय हव, फेर पानी हर बखत नइ मिलय।”
पास बैठी दूसरी महिला ने भी हामी भरी— “हमन कहत हवन कि पानी के इंतजाम ठीक हो जाही त आधा झंझट त एही मं खतम हो जाही।”
युवाओं की बेचैनी
गांव के कुछ युवा भी चौपाल में आ बैठे थे। हरीश चन्द्र गुप्ता ने उनसे पूछा—
“तुमन पढ़ाई करथव, आगे का सोचत हव?”
एक युवक बोला— “पढ़ाई त करथन, फेर नौकरी कहां हव? गांव मं काम कम हव। कई मन त बिलासपुर शहर जाथें, कुछ मन बाहर राज्य मं घलो चले जाथें।”
दूसरे युवक ने कहा— “गांव छोड़ना मन ला अच्छा नइ लगय, फेर पेट बर करना पड़थे।”
स्कूल की तस्वीर
गांव के स्कूल के पास पहुंचे तो बच्चे खेलते दिखे। एक शिक्षक से बात हुई। उन्होंने कहा—
“बच्चा मन तेज हव, बस मौका मिलना चाही। कई बच्चा गांव ले निकलके बड़े कॉलेज तक पहुंच सकथें, फेर पढ़ाई के साधन अभी घलो कम हव।”
पास खड़ा एक बच्चा मुस्कुराते हुए बोला—
“सर, हमन पढ़के बड़े अफसर बनबो।”
उसकी आंखों में चमक थी, जो गांव की उम्मीद जैसी लग रही थी।
स्वास्थ्य की समस्या
गांव के एक बुजुर्ग ने स्वास्थ्य सुविधा पर बात करते हुए कहा— “गांव मं दवाई मिल जाथे, फेर बड़े बीमारी हो जावय त बिलासपुर ले जाना पड़थे।”
एक महिला बोली— “डॉक्टर आथे, फेर हर बखत नइ मिलय। कई बेर इंतजार करना पड़थे।”
महिलाओं की बदलती भूमिका
गांव की कुछ महिलाएं स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हुई थीं। उन्होंने बताया— “हमन मिलके बचत करथन, छोटे-छोटे काम घलो शुरू करे हवन। कोनो मन बकरी पालथे, कोनो मन सिलाई करथे।”
एक महिला मुस्कुराते हुए बोली— “पहिले घर तक सीमित रहिथन, अब थोड़ा बाहर घलो काम करथन।”
गांव की असली ताकत
दिन भर गांव-गांव घूमते हुए एक बात साफ दिखाई दी—गांव की असली ताकत उसकी सामूहिकता है।
एक बुजुर्ग ने चौपाल पर बैठकर कहा— “गांव मं कोनो दिक्कत आ जावय त सब झन मिलके खड़े हो जाथन। एही गांव के असली ताकत हव।”
गुस्ताख दिल की अनुभूति
शाम ढलने लगी थी। खेतों से लोग लौट रहे थे और गांव की गलियों में धीरे-धीरे सन्नाटा उतर रहा था।
गुस्ताख दिल को लगा कि यह यात्रा केवल रिपोर्टिंग नहीं थी, बल्कि समाज को करीब से समझने का अवसर थी।
हरीश चन्द्र गुप्ता ने जाते-जाते कहा—
“गांव के बात कागज मं लिखना आसान हव, फेर गांव के दर्द समझना होवय त गांव मं बैठना पड़थे।”
बिलासपुर के गांवों में बिताया गया यह दिन कई सवाल छोड़ गया। क्या गांव की आवाज़ सचमुच सत्ता के गलियारों तक पहुंच रही है? क्या विकास की योजनाएं जमीन पर उतनी ही मजबूत हैं जितनी कागज पर दिखाई देती हैं?
इन सवालों के जवाब शायद एक दिन में नहीं मिलेंगे। लेकिन इतना जरूर है कि जब भी संपादक का “गुस्ताख दिल” गांवों की ओर निकलता है, वह केवल खबर लेकर नहीं लौटता—वह समाज की सच्चाई का आईना भी साथ लाता है।
और बिलासपुर के गांवों से लौटते समय यही महसूस हुआ कि भारत की असली कहानी अभी भी गांवों की मिट्टी में ही लिखी जा रही है।
FAQ
यह रिपोर्ट किस विषय पर आधारित है?
यह रिपोर्ट छत्तीसगढ़ के बिलासपुर क्षेत्र के गांवों की सामाजिक, आर्थिक और जीवन संबंधी वास्तविक स्थितियों को समझने के लिए की गई जमीनी यात्रा पर आधारित है।
गांवों में सबसे बड़ी समस्याएं क्या सामने आईं?
खेती की लागत, पानी की उपलब्धता, युवाओं के रोजगार और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसी समस्याएं प्रमुख रूप से सामने आईं।
इस यात्रा का उद्देश्य क्या था?
इस यात्रा का उद्देश्य गांवों की वास्तविक स्थिति को समझना और ग्रामीण समाज की आवाज़ को समाज और व्यवस्था तक पहुंचाना था।

