ठाकुर बख्श सिंह की रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश के बदायूं ज़िले में दिसंबर के अंतिम सप्ताह में सामने आया यह मामला किसी आपदा या महामारी की तरह नहीं था, लेकिन इसका असर उतना ही गहरा रहा। एक पारंपरिक तेरहवीं भोज से जुड़ी आशंका ने पूरे गांव को अस्पतालों की कतारों में ला खड़ा किया। डर था एक ऐसी बीमारी का, जिसका नाम सुनते ही इंसान सिहर उठता है—रेबीज़।
तेरहवीं का भोज और अनदेखा जोखिम
उझानी कोतवाली क्षेत्र के पिपरौल गांव में 23 दिसंबर 2025 को एक ग्रामीण परिवार में तेरहवीं का आयोजन किया गया। यह आयोजन सामाजिक परंपरा का हिस्सा था, जिसमें गांव के साथ-साथ आसपास के इलाकों से भी लोग पहुंचे। भोजन में दाल, सब्ज़ी, पूड़ी के साथ रायता परोसा गया। उस समय किसी को अंदाज़ा नहीं था कि यही रायता आने वाले दिनों में भय का कारण बन जाएगा।
भैंस की मौत और फैली आशंका
भोज के कुछ दिन बाद यह जानकारी सामने आई कि जिस भैंस के दूध से रायता तैयार किया गया था, उसकी तबीयत पहले से ठीक नहीं थी। ग्रामीणों के अनुसार, उस भैंस को एक आवारा कुत्ते ने काटा था और 26 दिसंबर 2025 को उसकी मौत हो गई। यही सूचना पूरे गांव में भय का कारण बन गई।
ग्रामीणों का कहना है कि भैंस को अलग तो रखा गया था, लेकिन उसके दूध को अन्य भैंसों के दूध के साथ मिला दिया गया। जब यह बात उजागर हुई, तब तक सैकड़ों लोग रायता खा चुके थे।
अस्पतालों में बढ़ी भीड़
27 दिसंबर से उझानी के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में लोगों की भीड़ उमड़ने लगी। पुरुषों के साथ बड़ी संख्या में महिलाएं भी वैक्सीन लगवाने पहुंचीं। सभी के मन में एक ही सवाल था—कहीं देर न हो जाए।
डॉक्टरों की राय और एहतियात
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, रेबीज़ एक घातक बीमारी है, जिसमें लक्षण दिखने के बाद इलाज की संभावना लगभग नहीं के बराबर रह जाती है। ऐसे में किसी भी तरह की शंका होने पर एंटी-रेबीज़ वैक्सीन लगवाना सबसे सुरक्षित उपाय है।
सीएमओ का बयान और आंकड़े
बदायूं के मुख्य चिकित्सा अधिकारी के अनुसार, 28 दिसंबर तक 166 लोगों को एंटी-रेबीज़ का टीका लगाया जा चुका था। विभाग का अनुमान है कि यह संख्या 250 के आसपास पहुंच सकती है। अधिकारियों का कहना है कि एहतियात के तौर पर टीका लगवाने में कोई नुकसान नहीं है।
गोरखपुर से भी सामने आई समान तस्वीर
ऐसी ही एक घटना गोरखपुर ज़िले से भी सामने आई, जहां रेबीज़ से संक्रमित गाय के कच्चे दूध के सेवन के बाद लगभग 200 लोगों को एंटी-रेबीज़ का टीका लगवाना पड़ा। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह समस्या किसी एक जिले तक सीमित नहीं है।
निष्कर्ष: डर नहीं, जागरूकता ज़रूरी
बदायूं और गोरखपुर की घटनाएं यह दिखाती हैं कि ग्रामीण इलाकों में पशुओं के स्वास्थ्य, दूध के उपयोग और सार्वजनिक जागरूकता पर विशेष ध्यान देना कितना आवश्यक है। रेबीज़ का इलाज नहीं है, लेकिन समय पर टीकाकरण और सतर्कता से इसे रोका जा सकता है। यह मामला डर से ज़्यादा समझदारी और सावधानी का संदेश देता है।
