लड़कियों को सलवार, लड़कों को कुर्ता और स्मार्टफोन!तो भूल ही जाओ
खाप पंचायत के फैसलों पर मचा सियासी और सामाजिक हंगामा

बागपत जिले में खाप पंचायत की बैठक करते बुजुर्ग, स्मार्टफोन और पहनावे पर चर्चा

ठाकुर बख्श सिंह की रिपोर्ट
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उत्तर प्रदेश के बागपत जिले से उठा एक खापी फरमान इन दिनों पूरे प्रदेश में तीखी बहस का कारण बन गया है।
खाप पंचायत द्वारा जारी हालिया निर्देशों ने न सिर्फ ग्रामीण समाज को झकझोर दिया है, बल्कि शहरी वर्ग, शिक्षाविदों, राजनीतिक दलों और सोशल मीडिया तक में चर्चा को तेज कर दिया है।
यह मामला केवल पहनावे या मोबाइल फोन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज में परंपरा और आधुनिकता के टकराव का प्रतीक बनता जा रहा है।

खाप पंचायत ने 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के स्मार्टफोन इस्तेमाल पर आपत्ति जताते हुए इसे सामाजिक और नैतिक पतन का कारण बताया है।
इसके साथ ही सार्वजनिक स्थलों पर हाफ पैंट पहनने को अनुचित ठहराया गया और लड़कों के लिए कुर्ता-पायजामा तथा लड़कियों के लिए सलवार-कुर्ता पहनने की सलाह दी गई।
इतना ही नहीं, पंचायत ने यह भी कहा कि शादियां मैरिज हॉल में नहीं, बल्कि गांव और घरों में ही संपन्न होनी चाहिए।

संस्कृति बचाने की पहल या निजी स्वतंत्रता में दखल?

खाप पंचायत का दावा है कि वह किसी पर प्रतिबंध नहीं लगा रही, बल्कि समाज को उसकी जड़ों से जोड़ने की कोशिश कर रही है।
पंचायत का मानना है कि आधुनिकता के नाम पर युवाओं में अनुशासनहीनता बढ़ी है और पारंपरिक मूल्यों का क्षरण हुआ है।
खासतौर पर स्मार्टफोन को लेकर खाप नेताओं की चिंता यह है कि कम उम्र में मोबाइल का अत्यधिक उपयोग बच्चों को पढ़ाई, खेलकूद और पारिवारिक संवाद से दूर कर रहा है।

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दूसरी ओर, आलोचकों का कहना है कि इस तरह के फैसले व्यक्तिगत जीवन में सीधा हस्तक्षेप हैं।
उनका तर्क है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में पहनावा, तकनीक का उपयोग और विवाह स्थल का चयन व्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है।
यही कारण है कि खाप पंचायत के ये निर्देश अब केवल ग्रामीण चौपालों तक सीमित न रहकर राज्यव्यापी बहस का विषय बन चुके हैं।

बुद्धिजीवियों ने बताया तुगलकी फरमान

इतिहासकार अमित राय जैन ने खाप पंचायत के इन फैसलों को “तुगलकी फरमान” करार दिया है।
उनका कहना है कि आज के दौर में मोबाइल फोन केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार और सरकारी सेवाओं तक पहुंच का माध्यम बन चुका है।
ऑनलाइन कक्षाएं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, डिजिटल भुगतान और सरकारी योजनाओं की जानकारी—सब कुछ मोबाइल पर निर्भर है।

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कानून बनाने का अधिकार केवल सरकार और प्रशासन को है, न कि किसी सामाजिक पंचायत को।
उनके अनुसार, खाप पंचायतें अधिकतम सलाह दे सकती हैं, लेकिन किसी प्रकार का सामाजिक दबाव या प्रतिबंध असंवैधानिक है।

खाप के भीतर भी पूरी सहमति नहीं

इस पूरे विवाद में सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि खुद खाप पंचायत के भीतर भी इन फैसलों को लेकर एकराय नहीं है।
देशखाप मावी के ठम्बेदार चौधरी यशपाल सिंह ने कहा कि वह इन सुझावों का खुला विरोध नहीं करते, लेकिन किसी पर कुछ थोपना भी सही नहीं मानते।
उनका कहना है कि बच्चों को संस्कार आदेशों से नहीं, बल्कि समझाइश और संवाद से दिए जाने चाहिए।

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उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर माता-पिता और परिवार अपनी जिम्मेदारी निभाएं, तो बच्चों को गलत रास्ते पर जाने से रोका जा सकता है।
खाप पंचायत को भी पहले आत्मचिंतन करना चाहिए कि क्या वह स्वयं इन आदर्शों का पालन कर रही है।

राजनीतिक समर्थन और विरोध दोनों

खाप पंचायत के इन फैसलों को लेकर राजनीति भी दो हिस्सों में बंटी नजर आ रही है।
राष्ट्रीय लोकदल के बागपत सांसद राजकुमार सांगवान ने खाप के रुख का समर्थन करते हुए कहा कि समाज में संस्कार और परंपराओं को बचाना समय की जरूरत है।
उनके अनुसार, खाप पंचायत के विचार सामाजिक अनुशासन को मजबूत करने वाले हैं।

वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता चौधरी यशपाल सिंह ने भी संस्कृति संरक्षण की बात कही, लेकिन साथ ही यह भी जोड़ा कि किसी भी सामाजिक नियम को समय के अनुरूप लचीलापन दिखाना चाहिए।
राजनीतिक गलियारों में यह बहस अब ‘संस्कृति बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ के बड़े विमर्श में बदल चुकी है।

पूरे उत्तर प्रदेश में लागू करने की तैयारी?

थांबा पट्टी मेहर देशखाप के चौधरी बृजपाल सिंह और खाप नेता सुभाष चौधरी ने संकेत दिए हैं कि इन फैसलों को केवल बागपत तक सीमित नहीं रखा जाएगा।
उनके अनुसार, अन्य खापों से बातचीत कर पूरे उत्तर प्रदेश में इन्हें लागू करने पर विचार किया जा रहा है।

यही बयान इस पूरे विवाद को और गंभीर बना रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर खाप पंचायतें राज्यव्यापी सामाजिक नियम तय करने की कोशिश करती हैं, तो यह सीधे तौर पर संवैधानिक अधिकारों से टकराव होगा।

संतुलन की सलाह

पूर्व छपरौली विधायक सहेंद्र सिंह रमाला ने इस मुद्दे पर संतुलित दृष्टिकोण रखा है।
उनका कहना है कि संस्कारों की शुरुआत घर से होती है, न कि फरमानों से।
माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के मोबाइल उपयोग पर निगरानी रखें, उनके साथ समय बिताएं और सही-गलत का फर्क समझाएं।

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उन्होंने यह भी कहा कि पंचायतों को पहले खुद उदाहरण पेश करना चाहिए।
आज के समय में समाज को दिशा देने के लिए आदेश नहीं, बल्कि विश्वास और संवाद की जरूरत है।
फिलहाल, बागपत की खाप पंचायत के इन फैसलों ने पूरे प्रदेश में एक नई बहस को जन्म दे दिया है—जहां एक तरफ संस्कृति और परंपरा की बात हो रही है, वहीं दूसरी ओर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आधुनिक जरूरतों का सवाल खड़ा है।

सवाल-जवाब | क्लिक करें और उत्तर पढ़ें

खाप पंचायत ने बच्चों के स्मार्टफोन पर आपत्ति क्यों जताई?

पंचायत का मानना है कि कम उम्र में स्मार्टफोन का अधिक उपयोग बच्चों को पढ़ाई, सामाजिक मूल्यों और पारिवारिक संवाद से दूर कर रहा है।

क्या खाप पंचायत के फैसले कानूनी रूप से लागू हो सकते हैं?

नहीं, भारत में कानून बनाने और लागू करने का अधिकार केवल सरकार और प्रशासन के पास है, पंचायतें केवल सामाजिक सुझाव दे सकती हैं।

पहनावे को लेकर खाप पंचायत का क्या रुख है?

खाप पंचायत ने लड़कों के लिए कुर्ता-पायजामा और लड़कियों के लिए सलवार-कुर्ता पहनने की सलाह दी है।

क्या ये फैसले पूरे उत्तर प्रदेश में लागू हो सकते हैं?

खाप नेताओं ने ऐसा विचार रखा है, लेकिन संवैधानिक रूप से इसे पूरे प्रदेश में लागू करना संभव नहीं माना जाता।


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