“जाति” है कि “जाती” नहीं

UGC नियम 2026 के संदर्भ में उच्च शिक्षा में मेरिट, जाति और प्रतिनिधित्व पर आधारित प्रतीकात्मक फीचर इमेज

✍️ अनिल अनूप। संपादकीय

शिक्षा में समानता का दावा मजबूत है, लेकिन क्या नई नीतियाँ सामाजिक सच्चाई से टकराने को तैयार हैं? UGC नियम 2026 इसी असहज सवाल के केंद्र में हैं।
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भारत के आधुनिक बौद्धिक विमर्श में यह लगभग एक स्थापित कथन बन चुका है कि जाति अब सामाजिक जीवन का केंद्रीय निर्धारक नहीं रही। बार-बार कहा जाता है कि लोकतंत्र ने बराबरी दी, संविधान ने अवसर खोले और शिक्षा ने सामाजिक सीढ़ियों को समतल कर दिया। लेकिन जब इस कथन को उच्च शिक्षा की वास्तविक संरचना, नीतिगत बदलावों और संस्थागत व्यवहार के संदर्भ में परखा जाता है, तो यह दावा बार-बार सवालों के घेरे में आ खड़ा होता है।

विशेषकर UGC के प्रस्तावित नियम 2026 इस बहस को एक नए मोड़ पर ले आते हैं। इन नियमों को उच्च शिक्षा में गुणवत्ता सुधार, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और अकादमिक उत्कृष्टता की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है। पहली नज़र में यह तर्क आकर्षक भी लगता है। आखिर कौन नहीं चाहेगा कि विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरे उतरें, शोध का स्तर ऊँचा हो और शिक्षण व्यवस्था अधिक पेशेवर बने?

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मेरिट की अवधारणा और उसका सामाजिक संदर्भ

UGC नियम 2026 में बार-बार “मेरिट” शब्द का प्रयोग होता है। नियुक्तियों, पदोन्नति और अकादमिक मूल्यांकन के लिए रिसर्च पब्लिकेशन, इम्पैक्ट फैक्टर, इंटरनेशनल जर्नल, प्रोजेक्ट ग्रांट और अकादमिक नेटवर्क जैसे मानकों को निर्णायक बनाया गया है। काग़ज़ पर ये सभी मानक निष्पक्ष प्रतीत होते हैं, लेकिन क्या मेरिट को उसके सामाजिक इतिहास से अलग करके देखा जा सकता है?

पहली पीढ़ी के विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए शोध केवल अकादमिक गतिविधि नहीं, बल्कि संसाधनों, मार्गदर्शन और समय के अभाव से जूझने की प्रक्रिया भी है। दूसरी ओर, जिन परिवारों में शिक्षा पीढ़ियों से चली आ रही है, उनके लिए वही शोध एक सहज निरंतरता बन जाता है। ऐसे में मेरिट का आकलन वस्तुतः सामाजिक विशेषाधिकार का प्रमाण बन जाता है।

जाति का बदला हुआ चेहरा

आज जाति किसी अपमानजनक शब्द में प्रकट नहीं होती। वह न तो प्रवेश द्वार पर रोकती है और न ही आवेदन पत्र में नाम पूछती है। लेकिन वह पूरी चयन प्रक्रिया को इस तरह आकार देती है कि परिणाम पहले से तय-से लगने लगते हैं। UGC नियम 2026 जाति का उल्लेख नहीं करते—और यही उनकी सबसे बड़ी विडंबना है।

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आधुनिक व्यवस्था में अदृश्य भेदभाव सबसे सुरक्षित भेदभाव होता है। जब कोई नीति यह मानकर बनाई जाती है कि समाज पहले से बराबर है, तो वह असमानताओं को और स्थायी बना देती है।

प्रतिनिधित्व का सिकुड़ता दायरा

उच्च शिक्षा में प्रतिनिधित्व केवल संख्या का प्रश्न नहीं, बल्कि बौद्धिक विविधता का सवाल है। जब अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमियों से आने वाले शिक्षक और शोधार्थी कम होते जाते हैं, तो ज्ञान की दिशा भी संकुचित होती जाती है।

नई व्यवस्था में आरक्षित वर्गों की भागीदारी “तकनीकी कारणों” से सीमित की जा रही है—कभी योग्य उम्मीदवार न मिलने का तर्क, कभी पद खाली छोड़ने की रणनीति। यह संयोग नहीं, बल्कि संरचनात्मक झुकाव का संकेत देता है।

उत्कृष्टता बनाम सामाजिक न्याय

जब भी सामाजिक न्याय की बात होती है, उसके सामने उत्कृष्टता को खड़ा कर दिया जाता है। जैसे समावेशन और गुणवत्ता एक-दूसरे के विरोधी हों। जबकि वैश्विक अनुभव बताता है कि विविधता किसी भी ज्ञान प्रणाली की शक्ति होती है, कमजोरी नहीं।

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स्वायत्तता और जवाबदेही

UGC नियम 2026 संस्थानों को अधिक स्वायत्त बनाते हैं, लेकिन जवाबदेही की स्पष्ट संरचना नहीं देते। यदि चयन समितियाँ शक्तिशाली हों और उनकी सामाजिक समीक्षा न हो, तो स्वायत्तता विशेषाधिकार में बदल जाती है—और इसका पहला नुकसान हमेशा हाशिये के वर्गों को होता है।

अंतिम प्रश्न

यह बहस केवल नियमों तक सीमित नहीं है। यह उस सोच पर सवाल है जो मान लेती है कि समाज पहले से बराबर हो चुका है और अब केवल तकनीकी सुधार की आवश्यकता है। अगर सिस्टम असहज सवालों से बचता रहा, तो जाति जाएगी नहीं—वह केवल और व्यवस्थित, और अदृश्य हो जाएगी।

FAQ

क्या UGC नियम 2026 में जाति का उल्लेख है?

नहीं, नियमों में जाति का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है, लेकिन यही अदृश्यता उनके प्रभाव को अधिक गहरा बनाती है।

क्या मेरिट आधारित व्यवस्था सामाजिक रूप से निष्पक्ष है?

जब सामाजिक पृष्ठभूमि असमान हो, तब मेरिट का मूल्यांकन निष्पक्ष नहीं रह जाता।

क्या UGC नियम 2026 उच्च शिक्षा में विविधता को प्रभावित कर सकते हैं?

आलोचकों के अनुसार, नई व्यवस्था में प्रतिनिधित्व का दायरा सिमटने का खतरा है।

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