यूजीसी के नए नियम और उच्च शिक्षा का भविष्य

यूजीसी के नए समानता नियमों को दर्शाती सांकेतिक तस्वीर, जिसमें उच्च शिक्षा, न्याय व्यवस्था और सामाजिक विरोध के प्रतीक शामिल हैं

सर्वेश द्विवेदी | आलेख

यूजीसी के नए नियम
और उच्च शिक्षा का भविष्य

यूजीसी ने समानता के नाम पर उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए जो नए नियम लागू किए हैं, वे भेदभाव समाप्त करने का दावा करते हैं। लेकिन इन नियमों में झूठी शिकायतों पर कार्रवाई का अभाव, भेदभाव की विस्तृत परिभाषा और संस्थागत दंड के प्रावधान क्या वास्तव में समरसता लाएंगे, या शिक्षा परिसरों को नए जातीय तनाव की ओर ले जाएंगे—यही इस संपादकीय का केंद्रीय प्रश्न है।

भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से सामाजिक असमानता, अवसरों की विषमता और संस्थागत भेदभाव जैसे प्रश्नों से जूझती रही है। इन्हीं जटिल परिस्थितियों के बीच विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से नए नियम अधिसूचित किए गए। इन नियमों की मंशा यह बताई गई कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति, लिंग, क्षेत्र, धर्म, विकलांगता अथवा अन्य आधारों पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को समाप्त किया जाए। किंतु नियमों के अधिसूचित होते ही जिस प्रकार देशभर में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं, उससे यह स्पष्ट हो गया कि यह कानून अपने उद्देश्य से अधिक अपने परिणामों को लेकर चिंता का विषय बन गया है।

समता की मंशा और कानूनी विरोधाभास

किसी भी कानून की सफलता उसके उद्देश्यों से नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन और दुरुपयोग की संभावनाओं से तय होती है। यूजीसी के नए नियमों में प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान में समानता समिति के गठन को अनिवार्य किया गया है, जो भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की जांच करेगी। कागज़ पर यह व्यवस्था संवेदनशील और प्रगतिशील प्रतीत होती है, किंतु व्यावहारिक धरातल पर यह कई सवाल खड़े करती है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि किसी शिकायत की पुष्टि नहीं होती या वह झूठी पाई जाती है, तो शिकायतकर्ता के विरुद्ध कोई दंडात्मक प्रावधान क्यों नहीं रखा गया।

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2012 के नियमों से विचलन

2012 में समानता से जुड़े जो नियम बनाए गए थे, वे अपेक्षाकृत सीमित और स्पष्ट दायरे में थे। उस समय भेदभाव की परिभाषा भी संकुचित थी और झूठी शिकायतों को हतोत्साहित करने के लिए प्रारूप स्तर पर दंड का प्रावधान भी प्रस्तावित किया गया था। किंतु नए नियमों में पिछड़े वर्ग को भी जाति आधारित भेदभाव के दायरे में शामिल कर दिया गया और भेदभाव की परिभाषा को नस्ल, पंथ, क्षेत्र, लिंग और दिव्यांगता तक विस्तारित कर दिया गया। यह विस्तार अपने आप में समस्या नहीं है, समस्या यह है कि कानून में संतुलन का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है।

सुप्रीम कोर्ट की रोक और अधूरा समाधान

नए नियमों पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लगाई गई अस्थायी रोक यह संकेत देती है कि न्यायपालिका भी इनके संभावित दुष्परिणामों को लेकर गंभीर है। हालांकि यह रोक स्थायी समाधान नहीं है। यह केवल सरकार और यूजीसी को पुनर्विचार का अवसर प्रदान करती है। यदि इस पुनर्विचार में मूल संरचना पर विचार नहीं किया गया, तो भविष्य में यही नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में नए टकरावों को जन्म दे सकते हैं।

शिक्षा संस्थान और वर्ग संघर्ष की आशंका

शिक्षा संस्थान ज्ञान, संवाद और वैचारिक बहस के केंद्र होने चाहिए। किंतु यदि हर असहमति, हर टिप्पणी और हर अकादमिक बहस को भेदभाव की शिकायत के रूप में देखा जाने लगे, तो यह वातावरण भय और अविश्वास को जन्म देगा। केवल शिकायत के आधार पर दोष निर्धारण करना न केवल अन्यायपूर्ण होगा, बल्कि शिक्षा की आत्मा के भी विरुद्ध होगा।

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कानून, दुरुपयोग और सामाजिक यथार्थ

भारत में पहले से ही ऐसे कई कानून मौजूद हैं, जिनका उद्देश्य सामाजिक न्याय था, किंतु समय के साथ उनके दुरुपयोग के उदाहरण भी सामने आए हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि कानून गलत हैं, बल्कि यह कि बिना जवाबदेही के कोई भी कानून असंतुलन पैदा कर सकता है। यूजीसी के नए नियम भी इसी आशंका को जन्म देते हैं कि वे समता स्थापित करने के बजाय नई असमानताओं का आधार बन सकते हैं।

अंबेडकर का दृष्टिकोण और आज की विडंबना

डॉ. भीमराव अंबेडकर का स्पष्ट मत था कि सामाजिक न्याय जातिविहीन समाज में ही संभव है। उनका संघर्ष केवल कानूनी प्रावधानों तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक चेतना और सामूहिक जीवन शैली में परिवर्तन का आह्वान था। आज स्थिति यह है कि हम जाति को समाप्त करने के बजाय उसे और अधिक कानूनी पहचान देकर मजबूत कर रहे हैं।

संतुलन ही समाधान

यूजीसी के नए नियमों की मंशा पर संदेह नहीं किया जा सकता, किंतु जिस स्वरूप में वे लागू किए गए हैं, वह गंभीर प्रश्न खड़े करता है। भेदभाव एक वास्तविक समस्या है, लेकिन उसका समाधान असंतुलित कानूनों से नहीं हो सकता। शिक्षा नीति का लक्ष्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, न कि उसे नए सिरे से विभाजित करना।

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ये है नया नियम जिस पर रोक लगाई न्यायपालिका ने

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा अधिसूचित नए समानता नियमों के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र, दिव्यांगता और अन्य आधारों पर भेदभाव की शिकायत दर्ज कराने का दायरा व्यापक कर दिया गया है। इन नियमों के अनुसार प्रत्येक विश्वविद्यालय और कॉलेज में अनिवार्य रूप से समानता समिति गठित की जाएगी, जिसे छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों से प्राप्त भेदभाव संबंधी शिकायतों की जांच का अधिकार होगा। नियमों में पिछड़े वर्ग को भी जाति आधारित भेदभाव की श्रेणी में शामिल किया गया है, जबकि झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर कार्रवाई का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं रखा गया। इसी असंतुलन, संभावित दुरुपयोग और संस्थागत तनाव की आशंका को देखते हुए न्यायपालिका ने इन नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन पर फिलहाल रोक लगाई है।

  • प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान में अनिवार्य रूप से समानता समिति (Equity Committee) का गठन।
  • छात्र, शिक्षक और गैर-शिक्षण कर्मचारियों सभी को शिकायत दर्ज कराने का अधिकार।
  • भेदभाव की परिभाषा में जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र, दिव्यांगता और अन्य सामाजिक पहचान शामिल।
  • पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को भी जाति आधारित भेदभाव की श्रेणी में शामिल किया गया।
  • शिकायत के आधार पर संस्थान प्रमुख पर कार्रवाई और जवाबदेही तय करने का प्रावधान।
  • नियमों के उल्लंघन पर संस्थान को डिग्री या शैक्षणिक कार्यक्रम चलाने से वंचित किए जाने का अधिकार यूजीसी के पास।
  • झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के लिए कोई दंडात्मक प्रावधान नियमों में स्पष्ट रूप से नहीं।
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