बी वारंट जारी होने के बावजूद आरोपी की रिहाई ; जेलर पर उठे सवाल, कोर्ट ने मांगा जवाब

बी वारंट जारी होने के बावजूद आरोपी की रिहाई, जेल प्रशासन की भूमिका पर उठते सवालों से जुड़ी सांकेतिक तस्वीर

समाचार सार
बी वारंट पर तलब आरोपी को अदालत में पेश किए जाने के बाद भी उसी दिन जेल से रिहा कर दिया गया। अदालत ने इसे गंभीर लापरवाही मानते हुए बांदा जेल अधीक्षक से जवाब तलब किया है और 6 फरवरी 2026 तक शपथपत्र के साथ स्पष्टीकरण मांगा है।

सर्वेश यादव की रिपोर्ट
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बी वारंट जारी होने के बावजूद आरोपी की रिहाई का मामला गौतमबुद्धनगर की न्यायिक व्यवस्था में उस समय चर्चा का केंद्र बन गया, जब एक गंभीर आपराधिक प्रकरण में नामजद आरोपी को अदालत के स्पष्ट आदेशों के विपरीत जेल से मुक्त कर दिया गया। यह मामला केवल एक व्यक्ति की रिहाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली, न्यायिक आदेशों के अनुपालन और कस्टडी प्रबंधन की गंभीर खामियां उजागर होती नजर आ रही हैं।

क्या है पूरा मामला

गौतमबुद्धनगर जिले की अदालत में सामने आए इस प्रकरण ने प्रशासनिक गलियारों से लेकर कानूनी हलकों तक हलचल पैदा कर दी है। नोएडा के सेक्टर-63 थाना क्षेत्र में दर्ज एक गंभीर आपराधिक मामले में नामजद स्क्रैप माफिया रवि काना उस समय न्यायिक रडार पर आया, जब उसे बांदा जिला कारागार से बी वारंट के तहत अदालत में पेश किया गया। अदालत के आदेश के अनुसार, 29 जनवरी 2026 को आरोपी को पेश किया गया था, लेकिन चौंकाने वाली बात यह रही कि उसी दिन शाम होते-होते उसे जिला कारागार बांदा से रिहा कर दिया गया।

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यह रिहाई ऐसे समय हुई, जब नोएडा से जुड़े मामले में न तो आरोपी की न्यायिक रिमांड पूरी हुई थी और न ही अदालत की ओर से किसी प्रकार का स्पष्ट रिहाई आदेश जारी किया गया था। यही बिंदु इस पूरे मामले को साधारण प्रशासनिक चूक से कहीं आगे ले जाता है।

बी वारंट के बावजूद कैसे हुई रिहाई

अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, जेल प्रशासन को यह स्पष्ट जानकारी थी कि आरोपी बी वारंट पर तलब है और उसे संबंधित अदालत की अनुमति के बिना किसी भी स्थिति में रिहा नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद जिस तरह से आरोपी को जेल से बाहर जाने दिया गया, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या यह महज लापरवाही थी या फिर नियमों की अनदेखी कर जानबूझकर की गई कार्रवाई—यह सवाल अब न्यायिक जांच के केंद्र में है।

मुख्य न्यायाधीश मजिस्ट्रेट (सीजीएम) गौतमबुद्धनगर ने इस पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से लेते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा है कि बी वारंट की स्थिति में आरोपी को तब तक जेल से रिहा नहीं किया जा सकता, जब तक संबंधित अदालत की लिखित अनुमति न हो। ऐसे में आरोपी की रिहाई न्यायिक आदेशों के सीधे उल्लंघन की श्रेणी में आती है।

कोर्ट ने बांदा जेल अधीक्षक से मांगा जवाब

अदालत ने अपने आदेश में जिला कारागार बांदा के जेल अधीक्षक से तीन अहम बिंदुओं पर स्पष्ट और संतोषजनक जवाब मांगा है। पहला, जब जेल प्रशासन को यह जानकारी थी कि आरोपी बी वारंट पर तलब है, तो उसे रिहा क्यों किया गया। दूसरा, बिना किसी न्यायिक आदेश के आरोपी को किस नियम या प्रक्रिया के तहत छोड़ा गया। तीसरा, क्या इस कृत्य को आरोपी को कस्टडी से बाहर जाने देने जैसी गंभीर चूक माना जाना चाहिए और क्यों न इस मामले में जेल प्रशासन के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

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अदालत ने जेल अधीक्षक को निर्देश दिए हैं कि वह पूरे मामले में शपथपत्र के साथ विस्तृत जानकारी प्रस्तुत करें, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि यह चूक किन परिस्थितियों में हुई और इसके लिए जिम्मेदार कौन है।

6 फरवरी 2026 तक का अल्टीमेटम

न्यायालय ने इस मामले को हल्के में न लेते हुए जेल प्रशासन को 6 फरवरी 2026 तक का समय दिया है। इस अवधि के भीतर जेल अधीक्षक को शपथपत्र के माध्यम से यह बताना होगा कि आरोपी की रिहाई किन आधारों पर की गई और क्या इसमें किसी स्तर पर नियमों की अनदेखी हुई।

यदि जवाब असंतोषजनक पाया जाता है, तो अदालत जेल प्रशासन के खिलाफ सख्त कार्रवाई का रास्ता भी अपना सकती है। कानून के जानकारों का मानना है कि इस तरह के मामलों में प्रशासनिक जिम्मेदारी तय करना बेहद जरूरी है, ताकि भविष्य में न्यायिक आदेशों की अवहेलना न हो।

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कानूनी विशेषज्ञों की राय

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि बी वारंट जारी होने के बाद आरोपी की रिहाई कानून की मूल भावना के खिलाफ है। बी वारंट का उद्देश्य ही यह होता है कि आरोपी को किसी अन्य मामले में अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जाए और उसकी कस्टडी सुनिश्चित रहे। ऐसे में बिना अदालत की अनुमति के रिहाई न केवल न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करती है, बल्कि पुलिस और अभियोजन की पूरी कार्रवाई को कमजोर कर देती है।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि यदि इस तरह की चूक पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो यह भविष्य में गलत मिसाल कायम कर सकती है, जिससे आपराधिक न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है।

न्यायिक आदेशों के पालन पर बड़ा सवाल

इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या जेल प्रशासन और अन्य संबंधित विभाग न्यायिक आदेशों को उतनी गंभीरता से लेते हैं, जितनी अपेक्षा की जाती है। आरोपी की रिहाई ने न केवल एक मामले को जटिल बना दिया है, बल्कि इससे आम जनता के बीच भी यह संदेश गया है कि यदि आदेशों का पालन सख्ती से न हो, तो न्यायिक प्रक्रिया कमजोर पड़ सकती है।

अब सबकी निगाहें 6 फरवरी 2026 पर टिकी हैं, जब यह स्पष्ट होगा कि जेल प्रशासन इस गंभीर चूक पर क्या सफाई देता है और अदालत आगे क्या रुख अपनाती है।

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