कानपुर में मां की ममता : बंदर के बच्चे की मौत के बाद पांच दिन तक खंभे पर बैठी रही मां, फायर बिग्रेड ने बचाई जान

कानपुर में माँ की ममता का दृश्य, बंदर के बच्चे की मौत के बाद उसकी मां पांच दिन तक बिजली के खंभे पर बैठी रही

ठाकुर बख्श सिंह की रिपोर्ट
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समाचार सार: कानपुर में मां की ममता का ऐसा दृश्य सामने आया जिसने इंसानियत को भी झकझोर दिया। बंदर के बच्चे की मौत के बाद उसकी मां ने अन्न-जल त्याग दिया और पांच दिनों तक बिजली के खंभे पर गुमसुम बैठी रही। आखिरकार फायर बिग्रेड की टीम ने कड़ी मशक्कत कर उसे सुरक्षित नीचे उतारा।

कानपुर में मां की ममता की यह कहानी सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि संवेदना, करुणा और मातृत्व के उस शाश्वत सत्य की झलक है, जो प्रजातियों की सीमाओं से परे है। उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के बिठूर थाना क्षेत्र अंतर्गत मंधना बाजार में घटित इस हृदयविदारक प्रसंग ने राह चलते लोगों को ठिठकने पर मजबूर कर दिया। एक मादा बंदर अपने मृत बच्चे के वियोग में पांच दिन तक भूखी-प्यासी बिजली के खंभे पर बैठी रही—न ठंड की परवाह, न बारिश का डर, न ही जीवन की चिंता।

घटना की पृष्ठभूमि: जब मासूम की सांसें थम गईं

यह घटना करीब पांच दिन पहले की है। मंधना क्षेत्र के बाजार में कुछ आवारा कुत्तों ने एक बंदर के बच्चे पर हमला कर दिया। अचानक हुए इस हमले में नन्हा जीव खुद को बचा नहीं सका। मां ने पूरी कोशिश की, लेकिन परिस्थितियां उसके खिलाफ थीं। देखते ही देखते बच्चे की मौत हो गई। यह क्षण मादा बंदर के लिए असहनीय था—मानो उसकी पूरी दुनिया उजड़ गई हो।

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अन्न-जल त्याग: खंभे पर बैठी मां और थमा समय

बच्चे की मौत के बाद मादा बंदर बाजार में लगे एक ऊंचे बिजली के खंभे पर चढ़ गई। वहीं बैठकर वह घंटों, फिर दिनों तक नीचे झांकती रही—मानो अपने बच्चे को ढूंढ़ रही हो। स्थानीय लोगों ने उसे फल, पानी और अन्य खाद्य सामग्री देने की कोशिश की, लेकिन उसने कुछ भी ग्रहण नहीं किया। पांच दिनों तक उसने अन्न-जल का त्याग किए रखा। यह दृश्य जिसने भी देखा, उसकी आंखें नम हो गईं।

भीड़, बारिश और ठंड—मां का अडिग संकल्प

इन पांच दिनों में मौसम बदला, कभी ठंड बढ़ी तो कभी बूंदाबांदी हुई, बाजार की चहल-पहल जारी रही, बंदरों का एक झुंड भी वहां आया—लेकिन मां अपने स्थान से नहीं हिली। वह गुमसुम बैठी रही, आंखें कभी नीचे सड़क पर, कभी आसमान की ओर। ऐसा प्रतीत होता था जैसे समय वहीं थम गया हो और मां की ममता उस खंभे पर स्थिर हो गई हो।

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स्थानीय लोगों की संवेदना: हर आंख हुई नम

मंधना बाजार के दुकानदारों और राहगीरों के लिए यह दृश्य रोजमर्रा का हिस्सा बन गया था। दुकानदार सुभाष बताते हैं कि बच्चे की मौत के बाद से ही मादा बंदर वहीं बैठी रही। न उसने ठंड की चिंता की, न बारिश की। लोग रोज उसे देखकर भावुक हो जाते थे। कई बार लगा कि वह नीचे उतर आएगी, लेकिन हर दिन उम्मीद टूट जाती थी।

पुलिस और फायर बिग्रेड की कार्रवाई

पांचवें दिन स्थानीय लोगों ने आखिरकार पुलिस को सूचना दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए तुरंत फायर बिग्रेड की टीम को बुलाया। ऊंचाई और मादा बंदर की मानसिक स्थिति को देखते हुए रेस्क्यू आसान नहीं था। टीम ने पूरी सावधानी के साथ उपकरणों की मदद ली और कड़ी मशक्कत के बाद मादा बंदर को सुरक्षित नीचे उतार लिया।

रेस्क्यू के बाद राहत की सांस

रेस्क्यू पूरा होते ही बाजार में मौजूद लोगों ने राहत की सांस ली। कई लोगों ने टीम का आभार जताया। मादा बंदर को प्राथमिक देखभाल के लिए साथ ले जाया गया, ताकि उसे पानी और भोजन मिल सके और वह इस सदमे से उबर सके। यह क्षण मानवीय करुणा और जिम्मेदारी का उदाहरण बन गया।

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मां की ममता: इंसानियत के लिए सबक

कानपुर में मां की ममता की यह कहानी बताती है कि मातृत्व केवल मानव तक सीमित नहीं है। यह एक सार्वभौमिक भाव है—जो हर जीव में समान रूप से धड़कता है। बच्चे के वियोग में मां का अन्न-जल त्याग देना और अपने दुख के साथ अडिग बने रहना, समाज के लिए गहरा संदेश छोड़ जाता है। यह घटना हमें संवेदनशीलता, सहअस्तित्व और करुणा का मूल्य समझाती है।

अंततः, फायर बिग्रेड की तत्परता और स्थानीय लोगों की जागरूकता ने एक जान बचा ली। यह प्रसंग याद दिलाता है कि जब समाज, प्रशासन और संवेदना एक साथ खड़े होते हैं, तो सबसे असहाय जीवन भी सुरक्षित हो सकता है। कानपुर की यह घटना लंबे समय तक लोगों के दिलों में दर्ज रहेगी—मां की ममता के अमिट उदाहरण के रूप में।

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