कामां डूब क्षेत्र जलभराव : डीजल अभाव में बंद पड़े पम्प सेट, किसानों का गुस्सा फूटा

"दोनों ओर अलग-अलग एंगल में दिखाया गया जल पम्प, जो नदी या तालाब से पानी निकालने के लिए इस्तेमाल हो रहा है। पृष्ठभूमि में खेत और पानी के क्षेत्र दिखाई दे रहे हैं।"

हिमांशु मोदी की रिपोर्ट

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कामां डूब क्षेत्र जलभराव बना किसानों की त्रासदी

कामां डूब क्षेत्र जलभराव पिछले कई दशकों से किसानों की मजबूरी और पीड़ा बनकर खड़ा है। इस क्षेत्र के नौनेरा, सहेडा और ऐंचवाड़ा गांवों सहित करीब एक दर्जन से अधिक गांवों की कृषि भूमि हर साल जलभराव की समस्या से प्रभावित रहती है। किसानों की मुख्य आजीविका खेती पर आधारित है, लेकिन पानी की निकासी न होने के कारण उनकी उपजाऊ जमीन बेकार हो जाती है।

हाल ही में जल संसाधन विभाग ने किसानों की मांग पर कामां डूब क्षेत्र जलभराव समस्या को कम करने के लिए 9 पम्प सेट लगाए थे। लेकिन डीजल उपलब्ध न होने से ये सभी पम्प सेट बंद हो गए और पानी निकासी का कार्य पूरी तरह रुक गया। इससे किसानों में भारी आक्रोश है।

डीजल के अभाव में ठप पड़ा काम

कामां डूब क्षेत्र जलभराव को खत्म करने के लिए लगाए गए पम्प सेट ऐंचवाड़ा, पथवारी, सहेडा और लोहागढ़ डूब क्षेत्र में संचालित किए जा रहे थे। इनमें ऐंचवाड़ा में 2, पथवारी में 4, सहेडा में 2 और लोहागढ़ में 1 पम्प सेट लगाकर पानी निकासी की व्यवस्था की गई थी।

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लेकिन रविवार को डीजल खत्म होने के बाद ये सभी मशीनें बंद हो गईं। ठेकेदार का कहना है कि विभाग की ओर से भुगतान न मिलने के कारण डीजल की व्यवस्था नहीं की जा पा रही है। जैसे ही भुगतान मिलेगा, डीजल खरीदकर पम्प सेटों को चालू कराया जाएगा।

कामां डूब क्षेत्र जलभराव पर किसानों का आरोप

कामां डूब क्षेत्र जलभराव के कारण प्रभावित किसानों का कहना है कि यह सिर्फ डीजल की कमी का मामला नहीं है, बल्कि प्रशासन और ठेकेदार की साठगांठ है। किसानों का आरोप है कि विभाग और ठेकेदार जानबूझकर लापरवाही कर रहे हैं।

महापंचायत में विधायक नौक्षम चौधरी ने आश्वासन दिया था कि पम्प सेट लगातार चलते रहेंगे और पानी निकासी समय पर होगी। लेकिन आज की हकीकत यह है कि खेतों में पानी जस का तस भरा हुआ है और किसान दिन-प्रतिदिन आर्थिक संकट की ओर धकेले जा रहे हैं।

कामां डूब क्षेत्र जलभराव : दशकों पुरानी समस्या

कामां डूब क्षेत्र जलभराव कोई नई समस्या नहीं है। यह दशकों से इस इलाके की सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। इस क्षेत्र का भूगोल ऐसा है कि बरसात के मौसम में बड़ी मात्रा में पानी इकट्ठा हो जाता है। प्रशासन, विधायक, सांसद और मंत्रीगण कई बार इस क्षेत्र का दौरा कर चुके हैं, लेकिन स्थायी समाधान आज तक नहीं निकाला गया।

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वर्षों से किसान उम्मीद लगाए बैठे हैं कि शायद कोई बड़ी योजना बनेगी और उनकी जमीनें बचेंगी। लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन और दौरे ही होते रहे हैं। यही कारण है कि कई किसान खेती छोड़कर अन्य जगहों पर पलायन कर चुके हैं।

किसानों की मजबूरी और पलायन

कामां डूब क्षेत्र जलभराव से प्रभावित भूमि में खेती करना अब लगभग नामुमकिन हो चुका है। खेतों में महीनों तक पानी भरा रहने से मिट्टी की उर्वरता भी घट रही है। जिन किसानों के पास वैकल्पिक रोजगार नहीं है, वे कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे हैं।

इसके अलावा, कई किसान मजबूरी में अपने घर-गांव छोड़कर पलायन कर रहे हैं। वे अन्य शहरों या राज्यों में मजदूरी करने को विवश हो चुके हैं। यह स्थिति क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर भी बुरा असर डाल रही है।

कामां डूब क्षेत्र जलभराव : प्रशासन की भूमिका संदिग्ध

कामां डूब क्षेत्र जलभराव समस्या के समाधान में प्रशासन की भूमिका बार-बार सवालों के घेरे में रही है। किसानों का कहना है कि अधिकारी और विभाग सिर्फ औपचारिकताएं पूरी कर रहे हैं। ठेकेदार और विभाग के बीच भुगतान को लेकर खींचतान का खामियाजा किसान भुगत रहे हैं।

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"दोनों ओर अलग-अलग एंगल में दिखाया गया जल पम्प, जो नदी या तालाब से पानी निकालने के लिए इस्तेमाल हो रहा है। पृष्ठभूमि में खेत और पानी के क्षेत्र दिखाई दे रहे हैं।"
कामां डूब क्षेत्र जलभराव बना किसानों की त्रासदी

यदि समय पर डीजल उपलब्ध कराया जाता तो पम्प सेट लगातार चलते रहते और पानी की निकासी हो जाती। लेकिन डीजल के अभाव ने किसानों की उम्मीदें फिर से तोड़ दी हैं।

समाधान की राह कब खुलेगी?

कामां डूब क्षेत्र जलभराव का समाधान सिर्फ अस्थायी पम्प सेटों से संभव नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि यहां स्थायी ड्रेनेज सिस्टम या नहरों का निर्माण जरूरी है। तभी इस समस्या का स्थायी हल निकल पाएगा।

हालांकि, सरकार और विभाग हर साल अस्थायी उपाय करते हैं। लेकिन किसानों की पीड़ा और नुकसान साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है।

कामां डूब क्षेत्र जलभराव केवल किसानों की नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र की समस्या है। डीजल अभाव में बंद पड़े पम्प सेटों ने एक बार फिर प्रशासन और ठेकेदार की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। दशकों से जारी इस समस्या का स्थायी समाधान कब निकलेगा, यह सवाल अब भी अनुत्तरित है।

जब तक ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक किसान हर बरसात के मौसम में इसी तरह अपनी खेती और भविष्य को जलभराव में डूबते देखते रहेंगे।

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