
माघ मेला विवाद ने प्रयागराज से लेकर वाराणसी और लखनऊ तक प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज कर दी है। मौनी अमावस्या के दिन शुरू हुआ यह टकराव अब ऐसे मोड़ पर पहुंच चुका है, जहां सरकार और प्रशासन खुलकर डैमेज कंट्रोल में जुटे दिखाई दे रहे हैं। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को दोबारा माघ मेले में बुलाने, सार्वजनिक माफी और पारंपरिक सम्मानजनक प्रोटोकॉल बहाल करने जैसे कदमों पर गंभीर मंथन चल रहा है। माघी पूर्णिमा (1 फरवरी 2026) को लेकर संत समाज और श्रद्धालुओं की निगाहें अब शासन के अगले कदम पर टिकी हैं।
मौनी अमावस्या से शुरू हुआ टकराव
माघ मेला विवाद की जड़ें 18 जनवरी की उस सुबह से जुड़ी हैं, जब मौनी अमावस्या के पावन अवसर पर शंकराचार्य का पालकी सहित संगम की ओर प्रस्थान हुआ। संगम मार्ग पर बैरिकेडिंग को लेकर पुलिस और शिष्यों के बीच कहासुनी ने देखते ही देखते गंभीर रूप ले लिया। प्रशासन का पक्ष था कि नियमों का उल्लंघन हुआ, जबकि शंकराचार्य और उनके अनुयायियों ने पुलिस पर दुर्व्यवहार और परंपराओं के अपमान का आरोप लगाया। यह टकराव केवल क्षणिक नहीं रहा—इसी दिन से शंकराचार्य धरने पर बैठ गए और विवाद सार्वजनिक हो गया।
नोटिस और पद पर सवाल: विवाद की आग में घी
स्थिति तब और बिगड़ गई जब प्रशासन की ओर से जारी नोटिस में शंकराचार्य के पद को लेकर सवाल उठाए गए। संत समाज ने इसे न केवल अपमानजनक, बल्कि परंपराओं पर सीधा प्रहार बताया। माघ मेला विवाद यहीं से एक धार्मिक-सांस्कृतिक विमर्श में बदल गया। साधु-संतों के बीच यह संदेश गया कि प्रशासन ने संकट प्रबंधन के बजाय टकराव को और तीखा कर दिया है।
बिना संगम स्नान मेला छोड़ना: ऐतिहासिक क्षण
28 जनवरी को शंकराचार्य बिना संगम स्नान किए ही माघ मेला छोड़कर वाराणसी लौट गए। इसे संत परंपरा में एक असाधारण घटना माना जा रहा है। परंपरागत रूप से शंकराचार्यों की उपस्थिति और संगम स्नान माघ मेले की गरिमा का प्रतीक मानी जाती रही है। ऐसे में माघ मेला विवाद ने मेले की आत्मा और प्रशासनिक संवेदनशीलता—दोनों पर सवाल खड़े कर दिए।
शासन बैकफुट पर, वार्ता तेज
विवाद के बढ़ते असर को देखते हुए शासन हरकत में आया। सूत्रों के अनुसार, लखनऊ से दो वरिष्ठ अधिकारी वाराणसी पहुंचे और शंकराचार्य से सीधे संवाद शुरू किया। बातचीत को अंतिम दौर में बताया जा रहा है। संकेत साफ हैं—सरकार इस मामले को अब टालना नहीं चाहती। माघ मेला विवाद को शांत करने के लिए सम्मानजनक समाधान की तलाश तेज हो चुकी है।
शंकराचार्य की दो शर्तें
सूत्र बताते हैं कि शंकराचार्य ने दो स्पष्ट शर्तें रखी हैं। पहली, पूरे घटनाक्रम के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की सार्वजनिक माफी। दूसरी, भविष्य में चारों शंकराचार्यों के लिए माघ मेले के दौरान पारंपरिक और सम्मानजनक प्रोटोकॉल का अक्षरशः पालन—जिसमें पालकी के साथ संगम तक पहुंचने की व्यवस्था शामिल हो। माघ मेला विवाद में यह मांगें केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संस्थागत सम्मान से जुड़ी मानी जा रही हैं।
मीडिया प्रभारी के संकेत और संभावनाएं
शंकराचार्य के मीडिया प्रभारी योगीराज सरकार के बयान ने उम्मीदों को और बल दिया है। उनके मुताबिक, प्रशासनिक अधिकारी स्वयं वाराणसी आकर शंकराचार्य को ससम्मान प्रयागराज ले जाने की तैयारी में हैं और माघी पूर्णिमा के दिन संगम स्नान कराया जा सकता है। यदि ऐसा होता है, तो माघ मेला विवाद का पटाक्षेप सम्मानजनक तरीके से संभव होगा।
धार्मिक परंपरा बनाम प्रशासनिक व्यवस्था
यह विवाद प्रशासन और संत समाज के रिश्तों की नाजुकता को उजागर करता है। माघ मेला केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सामाजिक समन्वय का मंच है। माघ मेला विवाद ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या आधुनिक प्रशासनिक नियम धार्मिक परंपराओं के साथ पर्याप्त संवाद और सम्मान के साथ लागू हो रहे हैं।
संत समाज और श्रद्धालुओं की निगाहें
संत समाज की प्रतिक्रिया इस पूरे घटनाक्रम में निर्णायक मानी जा रही है। कई अखाड़ों और साधु-संतों ने संकेत दिए हैं कि सम्मानजनक समाधान ही स्वीकार्य होगा। श्रद्धालु भी चाहते हैं कि माघ मेला विवाद का अंत टकराव नहीं, संवाद से हो—ताकि मेले की पवित्रता और गरिमा अक्षुण्ण रहे।
आगे क्या?
आने वाले घंटे और दिन तय करेंगे कि यह विवाद किस दिशा में जाता है। यदि प्रशासन सार्वजनिक माफी और प्रोटोकॉल बहाली के कदम उठाता है, तो माघी पूर्णिमा पर संगम स्नान एक सकारात्मक संदेश दे सकता है। अन्यथा, माघ मेला विवाद लंबे समय तक प्रशासनिक संवेदनशीलता और धार्मिक सम्मान की बहस को हवा देता रहेगा।






