सम्मान की सूची में नाम , फाइलों में सवाल

भरतपुर के आरबीएम अस्पताल के पीएमओ डॉ. नगेन्द्र भदौरिया की फाइल फोटो

हिमांशु मोदी की रिपोर्ट
IMG_COM_202603081950166970
previous arrow
next arrow

हूक बिंदु: जिन पर लापरवाही और अनियमितता के आरोप, वही “उल्लेखनीय सेवा” के प्रतीक कैसे बने—यह सवाल अब सरकारी फाइलों से निकलकर सार्वजनिक बहस बन चुका है।

भरतपुर। राजस्थान की सियासी और प्रशासनिक व्यवस्था इन दिनों विरोधाभासों के ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां एक ओर अनुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही की बातें की जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर सरकारी निर्णय स्वयं सवालों के घेरे में आ खड़े हो रहे हैं। हालिया घटनाक्रम ने यह बहस और तेज कर दी है कि क्या सम्मान अब सेवा का प्रमाण रह गया है या केवल औपचारिक सूची का हिस्सा बनकर रह गया है।

राज्य में पहले से ही एक महिला विधायक से जुड़ा डीप फेक वीडियो प्रकरण राजनीतिक हलकों में गर्माया हुआ है। इसी पृष्ठभूमि में अब मेडिकल एजुकेशन डिपार्टमेंट का एक निर्णय चर्चा का केंद्र बन गया है, जहां 26 जनवरी को कुछ अस्पताल अधीक्षकों और प्रभारियों को “उल्लेखनीय सेवाओं” के लिए सम्मानित किया गया, लेकिन ठीक अगले दिन उन्हीं अधिकारियों को गंभीर लापरवाही के आरोप में कारण बताओ नोटिस थमा दिया गया।

इसे भी पढें  गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेढ़म ने गोवर्धन पर्व पर नगर में गौ-पूजा कर समाज के प्रति व्यक्त की कृतज्ञता

सम्मान और नोटिस के बीच 24 घंटे का फासला

यह मामला इसलिए भी असहज करने वाला है क्योंकि सम्मान देने और नोटिस जारी करने, दोनों ही निर्णय एक ही विभागीय तंत्र से निकले। मेडिकल एजुकेशन डिपार्टमेंट के कमिश्नर द्वारा जहां 26 जनवरी को प्रशस्ति पत्र वितरित किए गए, वहीं 27 जनवरी को उन्हीं सम्मानित डॉक्टरों को मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना के तहत मरीजों के इलाज से जुड़े क्लेम रिजेक्ट होने के मामले में जवाबदेह ठहराया गया।

विभागीय स्तर पर यह स्वीकार किया गया कि अस्पताल प्रशासन और संबंधित अधिकारियों की लापरवाही के कारण बीमा कंपनी ने कई क्लेम अस्वीकार कर दिए। इसका सीधा असर सरकारी राजस्व और अस्पतालों की वित्तीय स्थिति पर पड़ा, जिससे करोड़ों रुपये के नुकसान की बात सामने आई।

भरतपुर आरबीएम अस्पताल का नाम क्यों अहम

इस पूरे प्रकरण में सबसे रोचक और साथ ही चिंताजनक पहलू भरतपुर के आरबीएम अस्पताल से जुड़ा है। यहां के पीएमओ डॉ. नगेन्द्र भदौरिया उन चार डॉक्टरों में शामिल रहे, जिन्हें 26 जनवरी को सम्मानित किया गया। लेकिन इसी अस्पताल का नाम उन संस्थानों में भी दर्ज है, जहां आयुष्मान योजना से जुड़े क्लेम लापरवाही के कारण रिजेक्ट हुए।

इसे भी पढें  पहाड़ी में ईओ की दबंगई आमजन पर भारी : 80 लाख के सफाई ठेके के बावजूद गंदगी और कीचड़ का अंबार

इतना ही नहीं, विभागीय फाइलों में यह तथ्य भी दर्ज है कि डॉ. नगेन्द्र भदौरिया के खिलाफ वित्तीय अनियमितता से जुड़ा एक मामला पहले से लंबित है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि लंबित जांच और कथित अनियमितताओं के बावजूद उन्हें सम्मानित करने का आधार क्या रहा।

नीति बनाम व्यवहार का टकराव

सरकारी तंत्र में सम्मान का उद्देश्य आमतौर पर बेहतर कार्यसंस्कृति को प्रोत्साहित करना माना जाता है। लेकिन जब उसी तंत्र द्वारा अगले ही दिन कार्य में गंभीर लापरवाही की बात स्वीकार की जाए, तो यह नीति और व्यवहार के बीच गहरे अंतर को उजागर करता है।

आलोचकों का कहना है कि इस तरह के निर्णय न केवल विभागीय विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों के मनोबल पर भी नकारात्मक असर डालते हैं।

राजनीतिक और प्रशासनिक चुप्पी

मामला सामने आने के बावजूद अब तक न तो विभाग की ओर से सम्मान चयन प्रक्रिया को लेकर कोई स्पष्ट सफाई दी गई है और न ही यह बताया गया है कि लंबित मामलों वाले अधिकारियों के नाम सूची में कैसे शामिल हुए। राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे पर फिलहाल खामोशी देखी जा रही है।

इसे भी पढें  वृद्धावस्था पेंशन जाँच संकट : सुगना देवी को 4 माह की पेंशन नहीं मिली, प्रशासन और बैंक में उलझन

प्रशासनिक हलकों में हालांकि यह चर्चा जरूर है कि यह प्रकरण आने वाले समय में बड़े सवाल खड़े कर सकता है, खासकर तब जब सरकार पारदर्शिता और सुशासन को अपनी प्राथमिकता बताती रही है।

❓ क्या सम्मान वापस लिया जा सकता है?

यदि जांच में गंभीर अनियमितता या लापरवाही सिद्ध होती है, तो विभागीय नियमों के तहत सम्मान पर पुनर्विचार संभव है।

❓ आयुष्मान योजना के क्लेम क्यों रिजेक्ट हुए?

विभाग के अनुसार दस्तावेज़ी खामियों और प्रशासनिक लापरवाही के कारण बीमा कंपनी ने कई क्लेम अस्वीकार किए।

❓ क्या लंबित जांच के बावजूद सम्मान नियमसंगत है?

यही सवाल इस पूरे मामले का केंद्र है, जिस पर अब तक विभाग की स्पष्ट स्थिति सामने नहीं आई है।

नगला खोह गांव में कीचड़ और गड्ढों से भरे खराब रास्तों पर चलते ग्रामीण, बच्चों और महिलाओं को आवागमन में हो रही भारी परेशानी की तस्वीर
खोह पंचायत के नगला खोह गांव में वर्षों से जर्जर रास्तों ने ग्रामीण जीवन को मुश्किल बना दिया है, इसी नाराजगी के चलते ग्रामीण चुनाव बहिष्कार की चेतावनी दे रहे हैं।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top