कथा से मंच तक : परंपरा की यात्रा
भारत में कथा-वाचन कोई नई परंपरा नहीं है। रामकथा और कृष्णकथा ने सदियों तक समाज को नैतिक दिशा दी, लोकभाषा में धर्म को समझाया और आम जन के जीवन में आस्था का संबल बनाया। कथा का उद्देश्य कभी प्रदर्शन नहीं था, बल्कि संवाद था—मनुष्य और मूल्य के बीच संवाद। कथा साधन थी, गंतव्य नहीं।
जब कथावाचक गुरु, महापंडित और अंतर्यामी बन जाए
समय के साथ कथा-वाचन की प्रकृति बदली है। आज कथावाचक केवल व्याख्याकार नहीं रह गए—वे गुरु, महापंडित और सर्वज्ञ की तरह पूजे जाने लगे हैं। इस मान्यता के साथ श्रद्धा ने धीरे-धीरे विवेक का स्थान लेना शुरू किया।
अंधभक्ति के इस वातावरण में प्रश्न पूछना अपराध जैसा मान लिया गया, और यहीं से संतुलन बिगड़ने लगा।
श्रद्धा का मूल्य : दक्षिणा, संपत्ति और संतान तक
आज कथा के मंच पर केवल भाव नहीं बहते। लाखों की फीस के रूप में दक्षिणा, दान में जेवर-ज़ेवरात, संपत्ति और यहाँ तक कि बेटा-बेटी तक को “समर्पित” करने के उदाहरण सामने आते हैं।
श्रद्धालु इसे भक्ति मानते हैं, लेकिन प्रश्न यह है— क्या भक्ति का अर्थ विवेक का त्याग है?
सनातन गुरु परंपरा बनाम धार्मिक बाज़ार
सनातन धर्म में गुरु का स्थान हमेशा ऊँचा रहा है, लेकिन उस परंपरा में एक स्पष्ट रेखा भी थी— ज्ञान का आदान-प्रदान त्याग से जुड़ा था, व्यवसाय से नहीं।
जब कथा की फीस तय होने लगे, जब आशीर्वाद मूल्य पर मिलने लगे, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह परंपरा का विस्तार है या उसकी विकृति।
अंतिम प्रश्न : धर्म निर्भरता सिखाता है या आत्मबोध?
यह लेख किसी कथावाचक पर आरोप नहीं लगाता। यह केवल इतना पूछता है— क्या धर्म का उद्देश्य मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाना था या किसी मंच पर निर्भर करना?
क्या श्रद्धा का अर्थ समर्पण है या समझ?
इस प्रश्न का उत्तर शायद एक लेख नहीं देगा।
लेकिन यदि पाठक यहाँ रुककर सोचे— तो यही इस लेख की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न: क्या कथावाचक परंपरा सनातन धर्म का अभिन्न हिस्सा है?
उत्तर: कथावाचक परंपरा सनातन धर्म में ज्ञान और मूल्यों के प्रसार का माध्यम रही है, लेकिन इसका उद्देश्य श्रद्धा के साथ विवेक और आत्मबोध को जाग्रत करना था, न कि अंधसमर्पण या व्यावसायिक निर्भरता पैदा करना।
प्रश्न: क्या कथा-वाचन का व्यावसायिक स्वरूप धार्मिक विकृति माना जा सकता है?
उत्तर: जब कथा-वाचन संवाद से हटकर प्रदर्शन और मूल्य-निर्धारण में बदलने लगे, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यह परंपरा का स्वाभाविक विकास है या धार्मिक विकृति। इसका उत्तर समाज और पाठक के विवेक पर निर्भर करता है।
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