जब सच पर पहिए चढ़ा दिए गए : एक आवाज़ जिसका नाम है — संजय सिंह राणा

✍️ विशेष लेख — अनिल अनूप

Light Blue Modern Hospital Brochure_20250922_085217_0000
previous arrow
next arrow

 

एक दिन, एक वारदात, और एक अंधेरा…

14 अगस्त 2021 — स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या थी। देश में झंडे तैयार हो रहे थे, भाषणों की तैयारियां चल रही थीं, और हर तरफ देशभक्ति की गूंज थी।

पर उसी दिन उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले की सड़कों पर एक पत्रकार की आवाज़ को कुचल देने की कोशिश की गई — संजय सिंह राणा नाम का वह शख्स, जिसने अपने कलम से सत्ताओं और ठेकेदारों की नींव हिला दी थी।

रामनगर ब्लॉक के देऊंधा के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक जीप ने उन्हें रौंद दिया। वह कोई दुर्घटना नहीं थी — यह एक संदेश था कि अगर कोई “सच” बोलने की हिम्मत करेगा, तो उसका यही अंजाम होगा।
लेकिन सवाल यह है कि क्या सच को यूँ ही कुचल दिया जा सकता है?

एक पत्रकार नहीं, एक मिशन था “संजय सिंह राणा”

संजय सिंह राणा का नाम सुनकर लोग आज भी सिर्फ एक पत्रकार को नहीं, बल्कि एक मिशन को याद करते हैं।
वह उन दुर्लभ पत्रकारों में से थे जिन्होंने पत्रकारिता को रोज़गार नहीं, बल्कि संघर्ष का अस्त्र बनाया।

वे गाँव-गाँव घूमते, स्कूलों के टूटी दीवारों की तस्वीरें लेते, खस्ताहाल सड़कों पर खड़े होकर सवाल पूछते, और भ्रष्टाचार के किले में सेंध लगाते थे।

इसे भी पढें  13 वर्षीय एक यूट्यूबर निकला इतना बड़ा शातिर चोर…❓ लेकिन हाय रे नादानी… पकड़ा गया

उनके लेखों ने कई बार सत्ताधारी और ठेकेदार वर्ग के बीच बेचैनी फैलाई। उन्होंने सरकारी योजनाओं — मनरेगा, आवास योजना, शौचालय निर्माण, और छात्रवृत्ति जैसी परियोजनाओं की सच्चाई उजागर की। जिन दस्तावेजों पर “पूरा” लिखा था, उन गाँवों में काम अधूरा था।

राणा ने इन्हें उजागर किया, और यहीं से उनकी जंग शुरू हुई।

जब पत्रकारिता बन गई जंग का मैदान

राणा के लिए पत्रकारिता का मतलब “खबर छापना” नहीं था, बल्कि जवाब मांगना था। वे स्थानीय प्रशासन से सीधे सवाल करते, रिकॉर्ड माँगते, और लोगों को उनके अधिकार बताते।

यह सब उन ठेकेदारों और अवैध खनन माफियाओं को रास नहीं आया, जिनकी कमाई जनता की खून-पसीने की गाढ़ी कमाई पर टिकी थी।

खनन के नाम पर चित्रकूट की धरती को नंगा किया जा रहा था। जब राणा ने कैमरा लेकर उस खनन के वीडियो बनाए और रिपोर्ट प्रकाशित की — तो पहली धमकी आई:

“बहुत हो गया तुम्हारा समाज सेवा का नाटक, अब अपना रास्ता देखो।”

लेकिन उन्होंने रास्ता नहीं बदला, बल्कि अपनी कलम को और तेज़ कर दिया।

जब कलम की स्याही खून में बदल गई

14 अगस्त की सुबह राणा अपने काम पर निकले थे। वह एक ठेकेदार के खिलाफ दर्ज भ्रष्टाचार के केस के दस्तावेज़ लेकर लौट रहे थे। अचानक पीछे से एक जीप आई — तेज़ रफ्तार में। चंद सेकंड में पहिए उनके शरीर पर चढ़ गए।

इसे भी पढें  दो घंटे की शादी : महज दो घंटे के बाद ही टूटे रिश्ते की खूब हो रही चर्चा

लोग दौड़े, उन्हें अस्पताल ले जाया गया, पर शरीर बुरी तरह टूट चुका था। डॉक्टरों ने कहा —

“अब वह शायद ही कभी चल पाएंगे।”

एक आवाज़ को थाम देने की कोशिश की गई थी, लेकिन राणा की मुस्कान में अब भी रोशनी थी। उन्होंने कहा —

“अगर मैं बोलना छोड़ दूँ, तो फिर मेरे जैसे लोगों की कुर्बानी व्यर्थ हो जाएगी।”

आवाज़ जो अब दहाड़ने लगी है

चार साल बीत गए, लेकिन संजय सिंह राणा आज भी अपने बिस्तर से समाज के लिए काम कर रहे हैं। उनकी पत्रकारिता अब आंदोलन बन चुकी है। वे सोशल मीडिया के माध्यम से भ्रष्टाचार, शिक्षा और ग्रामीण विकास से जुड़ी रिपोर्टें प्रकाशित करते हैं।

लोग उन्हें “आवाज़-ए-चित्रकूट” कहने लगे हैं। सवाल उठता है — आखिर कब तक दबाई जाएंगी ऐसी आवाज़ें?

एक टूटे शरीर में अटूट आत्मा

संजय सिंह राणा अब व्हीलचेयर पर हैं। रातें दर्द में बीतती हैं, लेकिन सुबह उनके लिए अब भी उम्मीद लेकर आती है। वे कहते हैं —

“मैं ज़िंदा हूँ, क्योंकि मेरा मिशन अधूरा है।”

गाँवों के लोग आज भी उन्हें “राणा जी” कहकर बुलाते हैं, उनकी सलाह लेते हैं, और उनके कमरे को अब “छोटा न्यूज़रूम” कहते हैं — जहाँ सत्य दर्द की दीवारों से गुजरकर निकलता है।

राणा और उनकी विरासत

राणा का संघर्ष केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक है। वह सिखाता है कि एक इंसान की हिम्मत लाखों की प्रेरणा बन सकती है। आज जब पत्रकारिता चमक और पक्षपात से भर चुकी है, राणा जैसे पत्रकार सच्चाई के अंतिम प्रहरी हैं।

इसे भी पढें  ब्रज की दीपावली : प्रेम, भक्ति और उल्लास का दिव्य संगम

उनकी कहानी याद दिलाती है — “पत्रकारिता” मरी नहीं है, बस घायल है।

राणा की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है — आखिर कब तक पत्रकार सुरक्षा के बजाय धमकियों में जिएंगे? और कब तक सच पर पहिए चढ़ाए जाते रहेंगे?

संजय सिंह राणा आज भी अपने बिस्तर से यह संदेश दे रहे हैं —

“मेरे पैर टूटे हैं, मेरी आवाज़ नहीं।”

यह पत्रकारिता की सशक्त पुकार है — सच्चाई की लौ को कोई ताकत बुझा नहीं सकती।

💠 लेखक: ✍️ अनिल अनूप (प्रधान संपादक, समाचार दर्पण24.कॉम)

सवाल-जवाब


Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Language »
Scroll to Top