इलाज कराने गए थे… बच्ची की ज़िंदगी ही कट गई
गलत इलाज ने 5 साल की मासूम को हमेशा के लिए दिव्यांग बना दिया

गलत इलाज से दिव्यांग हुई 5 साल की मासूम बच्ची, अस्पताल में इलाज के बाद पैर गंवाने की सांकेतिक तस्वीर
✍️ संतोष कुमार सोनी की रिपोर्ट
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सार समाचार 👉 एक मामूली गिरावट, एक टाइट प्लास्टर और अस्पताल में बीतते दिन—किसी ने नहीं सोचा था कि इलाज के लिए ले जाई गई बच्ची जीवन भर का दर्द लेकर लौटेगी। सवाल अब सिर्फ एक नहीं, पूरे सिस्टम पर है।

गलत इलाज ने 5 साल की मासूम को हमेशा के लिए दिव्यांग बना दिया—यह कोई भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि उस हकीकत का बयान है जिसने एक परिवार की दुनिया उजाड़ दी। छत से गिरने के बाद इलाज की उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंची पांच वर्षीय बच्ची के साथ जो हुआ, उसने न केवल परिजनों को तोड़ दिया बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

छत से गिरने के बाद अस्पताल पहुंची थी मासूम

घटना 23 दिसंबर 2025 की है, जब पड़ई गांव निवासी अनिल कुमार की पांच वर्षीय पुत्री मानवी छत से गिर गई। गिरने से उसके पैर की हड्डी टूट गई थी। घबराए परिजन बिना देरी किए बच्ची को नजदीकी मेडिकल कॉलेज लेकर पहुंचे, जहां उन्हें उम्मीद थी कि समय पर सही इलाज से बच्ची जल्द ठीक हो जाएगी।

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इलाज के नाम पर चढ़ाया गया अत्यधिक टाइट प्लास्टर

परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में तैनात हड्डी रोग विशेषज्ञ ने बच्ची के टूटे पैर पर अत्यधिक कसकर प्लास्टर चढ़ा दिया। शुरुआत में बच्ची दर्द से तड़पती रही, लेकिन परिजनों को भरोसा दिलाया गया कि यह सामान्य प्रक्रिया है। धीरे-धीरे बच्ची के पैर में सूजन बढ़ने लगी और रंग बदलने लगा, जिससे साफ संकेत मिल रहे थे कि रक्त संचार प्रभावित हो रहा है।

रक्त संचार रुका, फिर शुरू हुई सड़न

टाइट प्लास्टर के कारण बच्ची के पैर में रक्त प्रवाह बाधित हो गया। समय रहते प्लास्टर ढीला करने या दोबारा जांच करने के बजाय बच्ची को कई दिनों तक भर्ती रखकर केवल दर्द निवारक दवाएं दी जाती रहीं। इसी दौरान पैर में गंभीर संक्रमण फैल गया और सड़न की स्थिति पैदा हो गई, जिसे मेडिकल भाषा में गैंग्रीन कहा जाता है।

हालत बिगड़ने पर डॉक्टरों ने खड़े किए हाथ

जब बच्ची की स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई और पैर से दुर्गंध आने लगी, तब 29 दिसंबर 2025 को उसे ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया। लेकिन वहां इलाज करने के बजाय डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए और बच्ची को तत्काल लखनऊ रेफर कर दिया। परिजनों के लिए यह पल बेहद भयावह था—जहां एक ओर बच्ची दर्द से कराह रही थी, वहीं दूसरी ओर उन्हें बड़े शहर की ओर दौड़ना पड़ा।

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लखनऊ पहुंचते ही सामने आई कड़वी सच्चाई

लखनऊ के एक बड़े सरकारी अस्पताल में जांच के बाद डॉक्टरों ने स्पष्ट कहा कि संक्रमण बहुत अधिक फैल चुका है और बच्ची की जान बचाने के लिए पैर काटना पड़ेगा। यह सुनते ही माता-पिता टूट गए। जिस बच्ची को कुछ दिन पहले खेलते-कूदते देखा था, वह अब जीवन भर के लिए दिव्यांग होने वाली थी।

निजी अस्पताल में भी नहीं बच सका पैर

आखिरी उम्मीद के तौर पर परिजन बच्ची को एक सुपर स्पेशलिटी निजी अस्पताल ले गए। वहां हड्डी जोड़ने का प्रयास किया गया, लेकिन पहले से फैले गंभीर संक्रमण ने हालात बेकाबू कर दिए। डॉक्टरों ने बताया कि यदि समय रहते सही इलाज होता, तो यह स्थिति टाली जा सकती थी। अंततः मजबूरी में बच्ची का पैर काटना पड़ा।

परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़

पैर कटने के बाद पांच साल की मानवी हमेशा के लिए दिव्यांग हो गई। पिता अनिल कुमार का कहना है कि उनकी बेटी अब सामान्य जीवन नहीं जी पाएगी। वह सवाल करते हैं कि अगर शुरुआती इलाज सही होता, तो क्या आज यह दिन देखना पड़ता? परिवार मानसिक, भावनात्मक और आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट चुका है।

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डीएम से की गई शिकायत, जांच के आदेश

पीड़ित पिता ने पूरे मामले की शिकायत जिलाधिकारी से की। मामले की गंभीरता को देखते हुए जिलाधिकारी ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी को जांच के निर्देश दिए हैं और निष्पक्ष कार्रवाई का भरोसा दिलाया है। परिजन चाहते हैं कि दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो, ताकि भविष्य में किसी और मासूम के साथ ऐसा न हो।

प्रशासन और मेडिकल कॉलेज का पक्ष

मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. एस.के. कौशल का कहना है कि अभी तक उन्हें कोई लिखित आदेश प्राप्त नहीं हुआ है, आदेश मिलते ही जांच कराई जाएगी। वहीं सीएमओ अनिल कुमार ने बताया कि जिलाधिकारी के निर्देश पर हड्डी रोग विशेषज्ञों की एक समिति गठित कर मामले की जांच कराई जाएगी और रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी।

स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठते गंभीर सवाल

यह मामला केवल एक बच्ची का नहीं, बल्कि सरकारी अस्पतालों में इलाज की गुणवत्ता और जवाबदेही का प्रतीक बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर सही निर्णय और सतर्क निगरानी से इस तरह की त्रासदी को रोका जा सकता है।

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