ग्रामीण चुनाव बहिष्कार : खराब रास्तों और गड्ढों से टूटता भरोसा, वोट से पहले सड़क की मांग

नगला खोह गांव में कीचड़ और गड्ढों से भरे खराब रास्तों पर चलते ग्रामीण, बच्चों और महिलाओं को आवागमन में हो रही भारी परेशानी की तस्वीर

✍️हिमांशु मोदी की रिपोर्ट
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ग्रामीण चुनाव बहिष्कार की चेतावनी अब केवल नारा नहीं, बल्कि जमीनी हताशा की आवाज़ बनती जा रही है। भरतपुर-डीग क्षेत्र की खोह पंचायत के गांव नगला खोह में वर्षों से जर्जर रास्तों और गड्ढों ने ग्रामीण जीवन को ठप कर दिया है। हालात ऐसे हैं कि सामान्य आवागमन, बच्चों की पढ़ाई, धार्मिक गतिविधियां और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं तक प्रभावित हो रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि उनकी समस्या का समाधान नहीं हुआ तो वे आने वाले चुनाव में मतदान का बहिष्कार करेंगे।

सड़क नहीं तो वोट नहीं: गांव नगला खोह के लोग पूछ रहे हैं—जब बीमार को एंबुलेंस गांव में नहीं आ सकती, बच्चों को स्कूल जाना मुश्किल है और मंदिर तक पहुंच बाधित है, तो लोकतंत्र तक पहुंच कैसे संभव होगी?

बीस वर्षों से अधूरी सड़कें, पूरी तरह टूटा भरोसा

ग्रामीणों के अनुसार नगला खोह के अधिकांश संपर्क मार्ग पिछले लगभग बीस वर्षों से बदहाल स्थिति में हैं। कच्चे रास्तों पर बड़े-बड़े गड्ढे बरसात में तालाब का रूप ले लेते हैं, जबकि गर्मियों में धूल और उखड़ी सतह दुर्घटनाओं का कारण बनती है। बुजुर्गों का कहना है कि हर चुनाव से पहले आश्वासन मिलते हैं, सर्वे होते हैं, प्रस्ताव बनते हैं, लेकिन काम धरातल तक नहीं पहुंचता। यही वजह है कि अब धैर्य जवाब दे चुका है और ग्रामीण चुनाव बहिष्कार जैसे कठोर कदम की बात कर रहे हैं।

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बच्चों की पढ़ाई और महिलाओं की सुरक्षा पर सीधा असर

खराब रास्तों का सबसे बड़ा असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ रहा है। स्कूल जाने वाले बच्चे अक्सर कीचड़ और गड्ढों से होकर गुजरने को मजबूर हैं। बरसात के दिनों में कई बार अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने से रोक देते हैं। महिलाओं के लिए यह रास्ते और भी असुरक्षित हैं—शाम होते ही फिसलन और अंधेरे में दुर्घटना का डर बना रहता है। ग्रामीण महिलाएं कहती हैं कि जब बुनियादी सुविधाएं ही नहीं होंगी, तो विकास की बात महज भाषण बनकर रह जाएगी।

बीमारी में एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती

ग्रामीणों ने बताया कि किसी के बीमार पड़ने पर स्थिति और भयावह हो जाती है। एंबुलेंस गांव के भीतर तक नहीं आ पाती और मरीज को चारपाई या निजी साधन से बाहर तक लाना पड़ता है। कई बार कीमती समय इसी जद्दोजहद में निकल जाता है। स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच का यह संकट ग्रामीणों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। इसी पीड़ा ने ग्रामीण चुनाव बहिष्कार की चेतावनी को और मजबूत किया है।

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अवैध खनन के ट्रैक्टर, टूटी सड़कें और प्रशासनिक चुप्पी

ग्रामीणों का आरोप है कि अवैध खनन में लगे भारी ट्रैक्टर इन्हीं जर्जर रास्तों से गुजरते हैं, जिससे सड़कें और अधिक खराब हो जाती हैं। नियमों की अनदेखी कर भारी वाहनों की आवाजाही ने हालात बिगाड़ दिए हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर प्रशासनिक चुप्पी दिखाई देती है। ग्रामीण सवाल कर रहे हैं कि जब अवैध खनन के वाहनों के लिए रास्ता है, तो गांव के लोगों के लिए क्यों नहीं?

मंत्री की गाड़ी भी फंसी, फिर भी समाधान नहीं

ग्रामीणों के अनुसार क्षेत्र का दौरा करने आए मंत्री जवाहर सिंह बैडम की गाड़ी भी इन्हीं खराब रास्तों में फंस चुकी है। इसके बाद भी स्थायी समाधान नहीं हुआ। कई बार आश्वासन दिए गए, बैठकों में बातें हुईं और लगभग दस लाख रुपये की स्वीकृति की जानकारी भी सामने आई, लेकिन काम शुरू नहीं हो सका। यह स्थिति ग्रामीणों के गुस्से और अविश्वास को और गहरा करती है।

लोकतंत्र और बुनियादी सुविधाओं का सीधा रिश्ता

ग्रामीणों का कहना है कि मतदान उनका संवैधानिक अधिकार है, लेकिन बुनियादी सुविधाएं देना शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी है। जब सड़क जैसी मूलभूत सुविधा वर्षों से उपेक्षित है, तो वोट डालने की प्रेरणा कैसे बने? ग्रामीण चुनाव बहिष्कार की बात दरअसल इसी टूटे सामाजिक अनुबंध की अभिव्यक्ति है—जहां विकास के वादे पूरे नहीं हुए।

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ग्रामीणों की मांग: समयबद्ध, पारदर्शी और टिकाऊ समाधान

ग्रामीण केवल आश्वासन नहीं, बल्कि समयबद्ध कार्ययोजना चाहते हैं। उनकी मांग है कि सड़कों का स्थायी निर्माण हो, अवैध खनन पर सख्त कार्रवाई की जाए, भारी वाहनों की आवाजाही नियंत्रित की जाए और काम की निगरानी स्थानीय स्तर पर हो। पारदर्शिता और जवाबदेही के बिना भरोसा लौटना मुश्किल है।

चुनाव से पहले चेतावनी या बाद की हकीकत?

ग्रामीण चुनाव बहिष्कार की चेतावनी को प्रशासन और जनप्रतिनिधि कैसे लेते हैं, यह आने वाले दिनों में साफ होगा। यदि समय रहते काम शुरू होता है और वास्तविक प्रगति दिखती है, तो भरोसा बहाल हो सकता है। लेकिन यदि यह चेतावनी भी अनसुनी रह जाती है, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर इसका गहरा असर पड़ सकता है।

निष्कर्ष: सड़क बनेगी तो भरोसा बनेगा

नगला खोह के ग्रामीणों की मांग सीधी और स्पष्ट है—सड़क बनेगी तो भरोसा बनेगा। विकास के दावे तभी सार्थक हैं जब वे गांव की गलियों तक पहुंचें। ग्रामीण चुनाव बहिष्कार की चेतावनी एक आखिरी पुकार है, जिसे गंभीरता से लेना जरूरी है, ताकि लोकतंत्र और विकास दोनों की राह सुगम हो सके।

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