प्रयागराज माघ मेला 2026 शंकराचार्य विवाद अब औपचारिक रूप से न्यायिक दायरे में प्रवेश कर चुका है। मौनी अमावस्या के दिन घटी घटना को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को लेटर पिटीशन भेजी गई है, जिसमें पूरे प्रकरण की सीबीआई जांच कराने, प्रयागराज के कमिश्नर, जिलाधिकारी, पुलिस कमिश्नर और मेला अधिकारी को निलंबित करने के आदेश देने की मांग की गई है। यह लेटर पिटीशन अधिवक्ता गौरव द्विवेदी की ओर से दाखिल की गई है, जिसने माघ मेला प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मौनी अमावस्या और विवाद की पृष्ठभूमि
माघ मेला सनातन परंपरा में केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, तपस्या और सामाजिक समरसता का प्रतीक माना जाता है। विशेष रूप से मौनी अमावस्या का स्नान पर्व इसका सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है, जब साधु-संत, आचार्य, अखाड़े और लाखों श्रद्धालु संगम में आस्था की डुबकी लगाते हैं। प्रयागराज माघ मेला 2026 शंकराचार्य विवाद इसी पवित्र दिन उस समय शुरू हुआ, जब शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती अपने शिष्यों और ब्राह्मण बटुकों के साथ पालकी के माध्यम से संगम स्नान के लिए निकले।
याचिका के अनुसार, संगम नोज से पहले ही पुलिस और मेला प्रशासन ने उनके काफिले को रोक दिया। आरोप है कि प्रशासनिक अधिकारियों ने शंकराचार्य को जबरन पालकी से उतरने के लिए कहा और पैदल चलकर स्नान करने का निर्देश दिया। इसे याची ने न केवल धार्मिक मर्यादाओं का उल्लंघन बताया है, बल्कि संत परंपरा के अपमान के रूप में भी रेखांकित किया है।
नाबालिग ब्राह्मण बटुकों के साथ मारपीट का आरोप
लेटर पिटीशन का सबसे संवेदनशील और गंभीर पहलू 11 से 14 वर्ष के नाबालिग ब्राह्मण बटुकों के साथ कथित पुलिस बर्बरता से जुड़ा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि पुलिस ने इन नाबालिग बच्चों को हिरासत में लेकर न केवल मारा-पीटा, बल्कि उनकी शिखा पकड़कर घसीटा भी। याची का कहना है कि यह कृत्य जुवेनाइल जस्टिस एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन एक्ट के प्रावधानों का सीधा उल्लंघन है।
कानून के तहत नाबालिग बच्चों की गरिमा, सुरक्षा और सम्मान की विशेष गारंटी दी गई है। ऐसे में धार्मिक पहचान से जुड़े बच्चों के साथ इस प्रकार की कार्रवाई को याचिका में “बच्चों के साथ क्रूरता” और “सनातन धर्म का अपमान” बताया गया है। यही कारण है कि दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की भी स्पष्ट मांग की गई है।
प्रशासन पर अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने का आरोप
प्रयागराज माघ मेला 2026 शंकराचार्य विवाद में एक अहम बिंदु शंकराचार्य पद को लेकर प्रशासन द्वारा उठाए गए सवाल भी हैं। याचिका में कहा गया है कि प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में लंबित एक मामले का हवाला देते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य पद पर विराजमान होने पर प्रश्नचिह्न लगाया।
याची का तर्क है कि शंकराचार्य की नियुक्ति एक विशुद्ध धार्मिक प्रक्रिया है, जो अखाड़ों और काशी विद्वत परिषद जैसी परंपरागत संस्थाओं के माध्यम से संपन्न होती है। प्रशासन को न तो इस प्रक्रिया पर सवाल उठाने का अधिकार है और न ही इसे कानून-व्यवस्था के बहाने बाधित करने की छूट।
धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का सवाल
याचिका में पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई को संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 25 के उल्लंघन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। कानून के समक्ष समानता, शांतिपूर्ण सभा करने, स्वतंत्र रूप से विचरण करने और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों के हनन का आरोप लगाया गया है।
याची का कहना है कि यदि संतों और आचार्यों के साथ सार्वजनिक रूप से इस प्रकार का व्यवहार किया जाएगा, तो यह केवल एक व्यक्ति या संप्रदाय का नहीं, बल्कि पूरे धार्मिक समाज का अपमान माना जाएगा। इसलिए अदालत से धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए ठोस और दिशानिर्देशात्मक आदेश देने की मांग की गई है।
घटना के बाद का घटनाक्रम
18 जनवरी की घटना के बाद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने संगम स्नान करने से इनकार कर दिया। आरोप है कि पुलिस ने उनकी पालकी, जिसमें छोटे पहिए लगे थे, उसे धकेलते हुए संगम क्षेत्र से बाहर कर दिया। कुछ घंटे बाद उन्हें सेक्टर नंबर-4 स्थित शिविर के बाहर छोड़ा गया।
इसके बाद शंकराचार्य लगभग दस दिनों तक अपने शिविर के बाहर ही बैठे रहे। पूजा-पाठ, नित्य क्रिया और विश्राम के लिए बाहर खड़ी वैनिटी वैन का उपयोग किया गया। 28 जनवरी को प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद वे उसी वैनिटी वैन से काशी, वाराणसी के लिए रवाना हो गए।
हाईकोर्ट से क्या अपेक्षा
अब प्रयागराज माघ मेला 2026 शंकराचार्य विवाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के संज्ञान पर निर्भर है। यदि अदालत लेटर पिटीशन को स्वीकार कर जांच के आदेश देती है, तो यह मामला केवल प्रशासनिक जवाबदेही तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि धार्मिक आयोजनों के संचालन, पुलिस की भूमिका और बच्चों के अधिकारों से जुड़े बड़े प्रश्नों को भी नई दिशा दे सकता है।
यह विवाद प्रशासन और संत समाज के संबंधों, धार्मिक आयोजनों में राज्य की सीमाओं और संवैधानिक मूल्यों के संतुलन को लेकर एक अहम नजीर बन सकता है। आने वाले दिनों में अदालत का रुख यह तय करेगा कि माघ मेला जैसे आयोजनों में आस्था और व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे साधा जाएगा।







