गौरक्षा और गौसेवा क्यों?
आस्था से आगे, उत्तरदायित्व की खोज

गौरक्षा और गौसेवा: आस्था से आगे सामाजिक उत्तरदायित्व

✍️ मनदीप सिंह की खास प्रस्तुति
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यह सवाल केवल आस्था का नहीं, बल्कि कृषि, पर्यावरण और सामाजिक संतुलन से जुड़ा है—जहाँ “क्यों” समझे बिना “कैसे” संभव नहीं।

गौरक्षा और गौसेवा का प्रश्न भारत में जितना पुराना है, उतना ही जटिल भी। यह प्रश्न केवल धर्म या परंपरा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समय के साथ यह कृषि, पोषण, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संतुलन से भी जुड़ गया। फिर भी, आधुनिक विमर्श में यह प्रश्न अक्सर भावनाओं के शोर में दब जाता है—जहाँ “क्यों” पूछने की जगह “मान लो” कहा जाता है। यह लेख उसी “क्यों” को स्पष्ट करने का प्रयास है।

वैदिक दृष्टि: गाय एक संसाधन, केवल प्रतीक नहीं

वैदिक साहित्य में गाय को कभी केवल पूज्य मूर्ति के रूप में नहीं देखा गया। वह पालित है, पोष्य है और समाजोपयोगी है। ऋग्वैदिक समाज में गाय को “अघ्न्या” कहा गया—अर्थात जिसे मारा न जाए। यह निषेध केवल करुणा का नहीं, बल्कि विवेक का था। उस समय की अर्थव्यवस्था, कृषि और जीवन-चक्र गाय पर निर्भर थे। दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र—ये सभी जीवन के अनिवार्य तत्व थे।

वैदिक यज्ञों में घी का प्रयोग केवल धार्मिक कर्म नहीं था, बल्कि पोषण और स्वच्छता से भी जुड़ा था। अग्नि में घी का उपयोग वातावरण को शुद्ध करने, रोगाणुओं को नष्ट करने और सामूहिक स्वास्थ्य की रक्षा से जुड़ा था। इस दृष्टि से गाय पर्यावरणीय संतुलन की वाहक बनती है। अतः वैदिक परंपरा में गौसेवा का अर्थ है—जीवन-चक्र की रक्षा।

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सांस्कृतिक संदर्भ: गाँव, किसान और गाय का संबंध

भारतीय गाँव की कल्पना गाय के बिना अधूरी है। खेत, घर, आँगन और गोठ—इन सभी में गाय की उपस्थिति रही है। किसान के लिए गाय केवल दूध देने वाला पशु नहीं, बल्कि संकट के समय सहारा रही है। फसल खराब होने पर दूध ने घर चलाया और खाद की कमी में गोबर ने मिट्टी को पुनर्जीवित किया।

लोक-संस्कृति में गाय को “माता” कहा गया, किंतु यह संबोधन भावुकता से अधिक कृतज्ञता का प्रतीक था। माँ इसलिए, क्योंकि वह बिना माँगे देती रही। हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पंजाब जैसे कृषि-प्रधान क्षेत्रों में यह संबंध और भी गहरा रहा। वहाँ कहा जाता था—“गाय बची तो गाँव बचा।” यह केवल कहावत नहीं, जीवन का अनुभव था।

वैज्ञानिक दृष्टि: आधुनिक शोध क्या कहते हैं?

आधुनिक विज्ञान भी अब उन तथ्यों की पुष्टि कर रहा है, जिन्हें परंपरा अनुभव के आधार पर पहले ही जानती थी।

पोषण विज्ञान: देशी गाय का दूध A2 प्रोटीन से युक्त माना जाता है, जिसे पचाना अपेक्षाकृत सरल है। यह बच्चों, वृद्धों और रोगियों के लिए अधिक उपयोगी माना जाता है। घी और दही आंतरिक स्वास्थ्य, प्रतिरोधक क्षमता और मानसिक संतुलन में सहायक पाए गए हैं।

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कृषि विज्ञान: गोबर आधारित जैविक खाद मिट्टी की संरचना सुधारती है, जल-धारण क्षमता बढ़ाती है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाती है। इससे भूमि दीर्घकाल तक उपजाऊ बनी रहती है।

पर्यावरण विज्ञान: गोबर से बने उपले, बायोगैस और जैव-ईंधन ऊर्जा का स्वच्छ स्रोत हैं और कार्बन उत्सर्जन कम करते हैं। गाय आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था जलवायु संकट के समय एक वैकल्पिक विकास मॉडल प्रस्तुत करती है।

इस प्रकार गौरक्षा का अर्थ स्पष्ट होता है—गाय को बचाना, दरअसल सतत विकास को बचाना है।

तो फिर टकराव क्यों?

यदि गाय इतनी उपयोगी है, तो उसके नाम पर संघर्ष क्यों? यह प्रश्न असुविधाजनक है, लेकिन आवश्यक है। टकराव तब उत्पन्न होता है, जब गौसेवा को संरचना की जगह प्रतिक्रिया बना दिया जाता है—जब सेवा की जगह सजा प्रमुख हो जाती है, और नीति की जगह आक्रोश।

गौसेवा का अर्थ है—पालन, पोषण, संरक्षण और व्यवस्था। जबकि गौरक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा इन सभी के विरुद्ध जाती है। यह न गाय को सुरक्षित करती है, न समाज को।

धार्मिकता बनाम नैतिकता

धर्म का मूल उद्देश्य समाज को जोड़ना होता है, तोड़ना नहीं। यदि गाय की रक्षा के नाम पर भय फैलता है, अविश्वास बढ़ता है और कानून कमजोर पड़ता है, तो वह धर्म नहीं—विचलन है। गौसेवा का वास्तविक अर्थ है—कमज़ोर की रक्षा, बिना शक्तिप्रदर्शन के।

यह लेख विशेष रूप से इस बिंदु पर ठहरता है कि नैतिकता बिना करुणा के नहीं टिकती, और करुणा बिना विवेक के अंधी हो जाती है।

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आज के संदर्भ में “क्यों” का उत्तर

आज शहरीकरण, उपभोक्तावाद और त्वरित लाभ की संस्कृति में गाय बोझ समझी जाने लगी है। दूध कम होने पर उसे छोड़ दिया जाता है। यही परित्याग आगे चलकर तस्करी और अव्यवस्था को जन्म देता है। इसलिए आज गौसेवा का प्रश्न केवल धार्मिक नहीं, नीतिगत है।

क्या हम पशुपालक को सहयोग देंगे? क्या गौशालाओं को सक्षम बनाएँगे? क्या युवाओं को प्रशिक्षित करेंगे? यदि इन प्रश्नों का उत्तर “हाँ” है, तभी गौरक्षा सार्थक है।

निष्कर्ष नहीं, आधार

यह लेख किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता। इसका उद्देश्य आधार तैयार करना है—ताकि आगे यह समझा जा सके कि जब “क्यों” स्पष्ट हो जाता है, तभी “कैसे” संभव होता है।

गौरक्षा और गौसेवा कोई भावनात्मक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मनुष्य, पशु और प्रकृति के बीच एक दीर्घकालिक सामाजिक अनुबंध है। यदि हम इसे समझदारी से निभाएँ, तो न गाय असुरक्षित होगी, न समाज अशांत।

❓ क्या गौसेवा केवल धार्मिक विषय है?

नहीं, यह कृषि, पर्यावरण, पोषण और सामाजिक संतुलन से जुड़ा नीतिगत प्रश्न भी है।

❓ क्या गौरक्षा के नाम पर हिंसा उचित है?

नहीं, हिंसा न गाय की रक्षा करती है और न समाज की। वास्तविक गौसेवा संरचना और करुणा से जुड़ी है।

❓ आज गौसेवा की सबसे बड़ी आवश्यकता क्या है?

पशुपालकों का सहयोग, सक्षम गौशालाएँ और दीर्घकालिक नीति।

गायों के बीच हाथ जोड़कर खड़े गौसेवक जोगेंद्र सिंह, हरियाणा के सामाजिक कार्यकर्ता
गौमाता की सेवा को जीवन का उद्देश्य बना चुके जोगेंद्र सिंह — समर्पण और साहस की जीवंत तस्वीर

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