बिंध्य की गोद में अंधेरा ; योजनाओं की “रोशनी” और ज़मीनी हकीकत के बीच झूलता चित्रकूट

चित्रकूट के ग्रामीण क्षेत्र में बिजली गुल होने के बाद अंधेरे में बैठे लोग, टूटे बिजली पोल और ट्रांसफॉर्मर, बिंध्य पर्वतमाला की पृष्ठभूमि
संजय सिंह राणा की रिपोर्ट

बिंध्य की गोद में अंधेरा आज केवल एक रूपक नहीं, बल्कि चित्रकूट की ज़मीनी सच्चाई बन चुका है। भारतीय इतिहास और सांस्कृतिक स्मृति में चित्रकूट केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं रहा। यह वह भूमि है जहाँ वनवास की कथा, त्याग की परंपरा और साधना का बोध जुड़ा रहा है। लेकिन आज इसी भूमि पर खड़ा सबसे बड़ा सवाल किसी अध्यात्म या दर्शन का नहीं, बल्कि बिजली जैसी बुनियादी नागरिक सुविधा का है।

यह सवाल इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि चित्रकूट में बिजली की समस्या अब महज़ तकनीकी बाधा नहीं, बल्कि प्रशासनिक चुप्पी और जवाबदेही के अभाव का प्रतीक बन चुकी है।

आंकड़ा ही नहीं, तो जवाबदेही किसकी?

इस पूरे संकट की सबसे चिंताजनक परत यह है कि— जिले में विद्युत विहीन या व्यावहारिक रूप से अंधेरे में रहने वाले क्षेत्रों का कोई सार्वजनिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। यह दर्ज नहीं है कि किस इलाके में आपूर्ति बाधित होने के बाद कितने दिन, हफ्ते या महीने तक सुधार नहीं हुआ? शिकायतें दर्ज होती हैं, लेकिन उनका क्षेत्रवार, फीडरवार या गांव-वार विवरण सार्वजनिक नहीं किया जाता। सरकारी तर्क लगभग हर बार एक-सा है— “जिला पूरी तरह विद्युतीकृत है।” लेकिन यहाँ विद्युतीकरण (पोल-तार-ट्रांसफॉर्मर) और निरंतर आपूर्ति (बिजली मिलना) के फर्क को जानबूझकर मिटा दिया गया है। यही कारण है कि कई गांव और मोहल्ले महीनों तक अंधेरे में रहने के बावजूद सरकारी कागज़ों में “रोशन” माने जाते हैं।

शिकायत होती है, कार्रवाई नहीं

ग्रामीण और कस्बाई इलाकों की ज़मीनी तस्वीर लगभग एक-सी है— बिजली जाती है, घंटों नहीं आती, शिकायत दर्ज होती है, एक नंबर मिल जाता है, कुछ दिन बाद स्टेटस “Resolved” दिखा दिया जाता है। लेकिन न लाइन सुधरती है, न ट्रांसफॉर्मर बदला जाता है, न वोल्टेज की समस्या खत्म होती है। कितनी शिकायतें वास्तव में ठीक हुईं और कितनी सिर्फ फाइलों में निपटा दी गईं—इसका कोई स्वतंत्र या सार्वजनिक ऑडिट नहीं। सबसे खतरनाक बात यह है कि विभाग के पास “विद्युत विहीन क्षेत्र” जैसी कोई परिभाषा ही नहीं है। यानी यदि किसी गांव में 20–30 दिन से बिजली नहीं है, तब भी वह समस्या के रूप में दर्ज नहीं होती।

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पोल गड़े, तारें तनी—पर उजाला क्यों नहीं?

चित्रकूट के अधिकांश ग्रामीण इलाकों में आज बिजली के ढांचे मौजूद हैं— पोल दिखाई देते हैं, तारें बिछी हुई हैं, ट्रांसफॉर्मर लगे हैं, लेकिन यही ढांचा उम्मीद और हताशा के बीच का सबसे बड़ा मज़ाक बन गया है। लोग पूछते हैं— क्या केवल तारें तान देना ही विकास है? क्या रोशनी का सपना दिखाकर अंधेरे में छोड़ देना सुशासन कहलाता है? यह स्थिति खास तौर पर उन इलाकों में ज्यादा पीड़ादायक है जहाँ कभी शामें केरोसीन की ढिबरी से शुरू होती थीं और आज भी व्यवहार में वही हालात बने हुए हैं—बस फर्क इतना है कि अब ढिबरी की जगह झूठा भरोसा जलता है।

“बहुत काम है”—प्रशासनिक उदासीनता का स्थायी बहाना

बिजली विभाग से जब सवाल किया जाता है, तो जवाब अक्सर एक-सा होता है— “लोड ज्यादा है”, “तकनीकी समस्या है”, “स्टाफ कम है”, “बहुत काम है”, यह “बहुत काम” दरअसल सबसे सुविधाजनक ढाल बन चुका है—जिसके पीछे छिपकर जवाबदेही से बचा जाता है। लाइनमैन नहीं पहुंचता, अधिकारी फोन नहीं उठाते, और उपभोक्ता बार-बार शिकायत करके थक जाता है।

जनप्रतिनिधि: बयान से आगे क्यों नहीं?

सबसे असहज सवाल यहीं से उठता है— क्या किसी विधायक या सांसद ने बिजली संकट पर विस्तृत श्वेत पत्र जारी किया? क्या विधानसभा या संसद में क्षेत्रवार आपूर्ति बाधा को लेकर ठोस प्रश्न उठे? क्या सुधार की समय-सीमा सार्वजनिक की गई? जवाब लगभग हर बिंदु पर नकारात्मक है। कभी-कभार नाराज़गी भरे बयान या अधिकारियों को लिखा गया पत्र ज़रूर दिखता है, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में कोई ठोस, सार्वजनिक और बाध्यकारी कदम नज़र नहीं आता।

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स्मार्ट मीटर: सुधार या नई परेशानी?

चित्रकूट में लगाए गए स्मार्ट मीटरों को लेकर भी असंतोष गहराता गया है— अचानक बढ़े हुए बिल, रिचार्ज खत्म होते ही बिजली कटना, शिकायत पर स्पष्ट जवाब का अभाव, गरीब और अनियमित आय वाले उपभोक्ताओं के लिए यह व्यवस्था तकनीकी सुधार कम और मानसिक दबाव ज्यादा बनती जा रही है।

बिजली नहीं तो जीवन ठप

बिजली की अनियमितता का असर सिर्फ बल्ब और पंखे तक सीमित नहीं— किसान सिंचाई नहीं कर पाते, छोटे उद्योग ठप हो जाते हैं, छात्र पढ़ाई से कटते हैं, बुज़ुर्ग और बीमार गर्मी-सर्दी में तड़पते हैं, यह संकट जीवन की गुणवत्ता और विकास की परिभाषा—दोनों पर सीधा प्रहार है।

आंकड़ा न होना भी एक नीति है

चित्रकूट की बिजली समस्या इसलिए और भयावह है क्योंकि— समस्या है, पीड़ा है, शिकायतें हैं, लेकिन उसे दर्ज करने, मापने और सार्वजनिक करने की इच्छाशक्ति नहीं है। आंकड़ों का अभाव यहाँ मासूम नहीं— यह जवाबदेही से बचने का सबसे सुरक्षित तरीका बन चुका है। चित्रकूट को चकाचौंध नहीं, भरोसेमंद उजाला चाहिए। उसे घोषणाएं नहीं, निरंतर आपूर्ति चाहिए। जब तक अंधेरे को समस्या मानकर दर्ज नहीं किया जाएगा, तब तक यह अंधेरा सिर्फ घरों में नहीं— प्रशासनिक सोच में भी पसरा रहेगा।

इसी प्रशासनिक और राजनीतिक निष्क्रियता का सबसे ताज़ा और ठोस प्रमाण वह मामला है, जिसमें चित्रकूट में बिजली विभाग ने स्वयं यह माना कि आठ हजार से अधिक उपभोक्ता बिजली बिल माफी के लिए सक्षम पाए गए। लेकिन जब सवाल ज़मीनी लाभ का आया, तो माफी वास्तव में चार हजार के आसपास उपभोक्ताओं तक ही सीमित रह गई। यहाँ सवाल यह नहीं है कि योजना क्यों बनी—सवाल यह है कि आधे से अधिक पात्र उपभोक्ता किसकी लापरवाही से बाहर रह गए? क्या उनकी सूची गलत थी, क्या प्रक्रिया जानबूझकर अधूरी छोड़ी गई, या फिर यह भी उसी तरह का मामला है जहाँ राहत की घोषणा कर दी जाती है और क्रियान्वयन के बोझ से विभाग और जनप्रतिनिधि दोनों मुक्त हो जाते हैं?

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यही बिंदु इस पूरी दस्तावेजी रिपोर्ट का निष्कर्ष बनता है। चित्रकूट में बिजली संकट केवल आपूर्ति का नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव का संकट है। जब हजारों उपभोक्ताओं को पात्र घोषित करने के बाद भी लाभ नहीं मिलता, जब महीनों तक बिजली गुल रहने पर भी कोई जवाबदेही तय नहीं होती, और जब जनप्रतिनिधि इन असफलताओं पर चुप रहते हैं—तो यह चुप्पी प्रशासनिक भूल नहीं, बल्कि राजनीतिक सहमति बन जाती है। ऐसे में अंधेरा केवल तारों में नहीं दौड़ता, वह व्यवस्था में उतर आता है। और जब तक इस अंधेरे से सवाल पूछने की हिम्मत नहीं की जाएगी, तब तक चित्रकूट को रोशनी नहीं, सिर्फ़ उजाले के वादे ही मिलते रहेंगे।

जनप्रतिनिधियों से सीधे सवाल

आठ हजार पात्र उपभोक्ताओं में से चार हजार को ही बिल माफी क्यों?
क्या वंचित उपभोक्ताओं की पुनः सत्यापन सूची बनी?
लंबे समय से अंधेरे में डूबे इलाकों को विद्युत विहीन क्यों नहीं माना गया?
कितनी शिकायतें सिर्फ काग़ज़ों में निपटाई गईं?
यदि योजनाएँ सफल हैं, तो यह अंधेरा क्यों?

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