उत्तर प्रदेश के रायबरेली और अमेठी जनपद में इन दिनों एक ऐसी प्रेम कहानी की गूंज सुनाई दे रही है, जिसने समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया है। यह कहानी है रायबरेली निवासी अभिषेक सोनकर और अमेठी की रहने वाली रेशम बानो की, जिन्होंने धर्म की दीवारों को पीछे छोड़ते हुए मंदिर में सात फेरे लेकर एक-दूसरे को जीवनसाथी स्वीकार किया।
तीन साल पहले शुरू हुई थी दोस्ती की कहानी
जानकारी के अनुसार, अभिषेक सोनकर और रेशम बानो की पहली मुलाकात करीब तीन वर्ष पूर्व हुई थी। शुरुआत में यह पहचान सामान्य बातचीत तक सीमित रही, लेकिन समय के साथ दोनों के बीच दोस्ती गहराती चली गई। एक-दूसरे के विचार, संघर्ष और सपनों को समझते हुए यह दोस्ती कब प्रेम में बदल गई, इसका एहसास दोनों को भी धीरे-धीरे हुआ।
जब प्यार बना जीवन का सबसे बड़ा फैसला
समय बीतने के साथ उनका रिश्ता केवल भावनाओं तक सीमित नहीं रहा। दोनों ने भविष्य को लेकर गंभीरता से सोचना शुरू किया और यह तय किया कि वे जीवन भर एक-दूसरे का साथ निभाएंगे। हालांकि उन्हें यह भी पता था कि उनका रिश्ता सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से आसान नहीं होगा, फिर भी उन्होंने पीछे हटने के बजाय आपसी सहमति और विश्वास को प्राथमिकता दी।
मंदिर में सात फेरे और नई शुरुआत
बताया जा रहा है कि अभिषेक सोनकर ने रायबरेली के जेल रोड स्थित एक मंदिर में रेशम बानो को बुलाकर विवाह का प्रस्ताव रखा। दोनों ने बिना किसी दबाव के, पूरी रजामंदी से विवाह करने का निर्णय लिया। मंदिर परिसर में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार मंत्रोच्चार के बीच सात फेरे हुए और दोनों ने एक-दूसरे को जीवनसाथी स्वीकार कर लिया।
शादी के बाद क्या बोली रेशम बानो?
शादी के बाद रेशम बानो का बयान इस पूरी कहानी का सबसे अहम पहलू बन गया। रेशम ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उसने किसी दबाव या मजबूरी में नहीं, बल्कि पूरी स्वेच्छा से हिंदू धर्म स्वीकार किया है। उसका कहना है कि वह अभिषेक से प्रेम करती है और उसी के साथ अपना जीवन बिताना चाहती है, इसलिए यह फैसला उसने अपने विश्वास और भावनाओं के आधार पर लिया।
इलाके में क्यों बन गई यह शादी चर्चा का विषय?
जैसे ही इस विवाह की जानकारी सामने आई, रायबरेली से लेकर अमेठी तक चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। कुछ लोग इसे प्रेम की जीत और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रतीक मान रहे हैं, तो वहीं कुछ लोग इसे सामाजिक परंपराओं के विरुद्ध उठाया गया कदम बता रहे हैं। हालांकि, दोनों का कहना है कि उनका निर्णय पूरी तरह निजी है और इसमें किसी प्रकार का दबाव नहीं है।
बदलती सामाजिक सोच की झलक
यह प्रेम विवाह मौजूदा समय में बदलती सामाजिक सोच को भी दर्शाता है। जहां पहले अंतरधार्मिक विवाहों को समाज में सहजता से स्वीकार नहीं किया जाता था, वहीं आज युवा पीढ़ी अपने जीवन के फैसले स्वयं लेने की दिशा में आगे बढ़ रही है। यह कहानी उसी बदलाव की एक मिसाल बनकर सामने आई है।
कानून और सहमति का सवाल
कानूनी दृष्टि से देखें तो किसी भी वयस्क को अपनी पसंद से विवाह करने का अधिकार है। यदि विवाह आपसी सहमति से और कानून के दायरे में किया गया है, तो उसमें किसी प्रकार की बाधा नहीं होनी चाहिए। इस मामले में भी दोनों बालिग हैं और उन्होंने अपनी मर्जी से यह निर्णय लिया है।
प्रेम, विश्वास और भविष्य की राह
अभिषेक और रेशम की यह कहानी केवल एक विवाह की खबर नहीं है, बल्कि यह प्रेम, विश्वास और साहस का प्रतीक बन गई है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि समाज इस तरह के रिश्तों को किस दृष्टि से देखता है, लेकिन फिलहाल यह प्रेम विवाह इलाके में चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
पाठकों के सवाल – जवाब
क्या यह विवाह कानूनी रूप से मान्य है?
यदि दोनों पक्ष बालिग हैं और आपसी सहमति से विवाह हुआ है, तो कानूनन इसमें कोई बाधा नहीं मानी जाती।
क्या रेशम बानो ने दबाव में धर्म परिवर्तन किया?
रेशम बानो के अनुसार, उसने किसी दबाव में नहीं बल्कि अपनी इच्छा और विश्वास के आधार पर यह निर्णय लिया है।
इस विवाह को लेकर समाज की प्रतिक्रिया कैसी है?
कुछ लोग इसे प्रेम और स्वतंत्रता की जीत मान रहे हैं, जबकि कुछ लोग इसे परंपराओं के खिलाफ कदम बता रहे हैं।
क्या ऐसे विवाह समाज में बदलाव का संकेत हैं?
हां, यह कहानी बदलती सामाजिक सोच और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की ओर बढ़ते कदम को दर्शाती है।










