जहाँ स्त्री की चीख़ आँकड़ों में बदल दी जाती है

यौन अपराध, प्रशासनिक उदासीनता और सामाजिक चुप्पी 

अंधेरी सुनसान सड़क पर खड़ी स्त्री की परछाईं, जो सन्नाटे में दबती चीखों और सामाजिक उदासीनता का प्रतीक है

संजय सिंह राणा  की रिपोर्ट

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✍️ : वर्ष 2025 में चित्रकूट जनपद में महिलाओं और किशोरियों के साथ घटित यौन अपराधों की श्रृंखला किसी एक घटना, एक थाना या एक आरोपी तक सीमित नहीं रही। यह रिपोर्ट उन घटनाओं को जोड़कर देखने का प्रयास है, जिनमें स्थान अलग–अलग हैं, लेकिन परिस्थितियाँ लगभग समान। खेत, घर, सड़क, कस्बा और कार्यस्थल—ये सभी स्थान महिलाओं के लिए असुरक्षित साबित हुए। यह दस्तावेजी क्राइम स्टोरी केवल यह नहीं बताती कि “क्या हुआ”, बल्कि यह उजागर करती है कि कहाँ हुआ, क्यों हुआ और बार–बार कैसे दोहराया गया।

राजापुर थाना क्षेत्र : खेत, शौच और राज्य की अनुपस्थिति

राजापुर थाना क्षेत्र के ग्रामीण इलाके में खेतों के बीच हुई नाबालिग किशोरी के साथ दुष्कर्म की घटना चित्रकूट की सबसे भयावह सच्चाइयों में से एक है। यह क्षेत्र आज भी खुले में शौच की मजबूरी से जूझ रहा है। सुबह या अंधेरा होते ही महिलाओं और लड़कियों का खेतों की ओर जाना यहाँ एक सामान्य दृश्य है। घटना के दिन किशोरी जब शौच के लिए खेत की ओर गई, तो पहले से घात लगाए युवक ने उसे अकेला पाकर दुष्कर्म किया। यह कोई अचानक उपजा अपराध नहीं था। यह उस स्थान की पहचान का परिणाम था—जहाँ अपराधी जानता है कि न कोई गवाह होगा, न तुरंत मदद पहुँचेगी। पुलिस कार्रवाई और न्यायालय की सख़्त सज़ा ने आरोपी को दंडित किया, लेकिन यह घटना आज भी प्रशासन से सवाल करती है कि यदि वर्षों से यही खेत असुरक्षित हैं, तो इन्हें संवेदनशील क्षेत्र घोषित क्यों नहीं किया गया? क्या राज्य की जिम्मेदारी केवल अपराध के बाद सक्रिय होना है?

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मानिकपुर तहसील : घर के भीतर हुआ अपराध, बाहर छाया सन्नाटा

मानिकपुर तहसील के एक गांव में बहू के साथ ससुर द्वारा बलात्कार की घटना ने घरेलू सुरक्षा की अवधारणा को झकझोर दिया। यह अपराध घर के भीतर हुआ—वहाँ, जहाँ महिला को सबसे अधिक सुरक्षित होना चाहिए था। पीड़िता लंबे समय तक चुप रही। कारण था—आर्थिक निर्भरता, सामाजिक दबाव और विवाह टूटने का डर। जब मामला सामने आया, तब तक मानसिक क्षति गहरी हो चुकी थी। पुलिस ने विवेचना की, अदालत ने सज़ा दी, लेकिन इस प्रक्रिया में पीड़िता को जिस सामाजिक तिरस्कार से गुजरना पड़ा, वह न्यायिक आदेशों में दर्ज नहीं होता। यह मामला बताता है कि चित्रकूट में घर कई बार महिला के लिए शरण नहीं, कैद बन जाता है।

कर्वी नगर क्षेत्र : भरोसे का बलात्कार

कर्वी नगर क्षेत्र से सामने आया विवाह के झूठे वादे पर आधारित बलात्कार का मामला इस बात का प्रमाण है कि यौन अपराध केवल ग्रामीण या अशिक्षित परिवेश की समस्या नहीं हैं। कस्बाई माहौल में भी महिला का भरोसा सबसे आसान शिकार बनता है। महिला लंबे समय तक इसलिए चुप रही क्योंकि समाज में आज भी सवाल उसी से पूछा जाता है—“तुमने भरोसा क्यों किया?” आरोपी को सज़ा मिली, लेकिन सामाजिक सोच जस की तस रही।

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खण्डेहा चौकी क्षेत्र : जब कानून देर से पहुँचता है

खण्डेहा पुलिस चौकी क्षेत्र में किशोरी के साथ दुष्कर्म के बाद आरोपी का महीनों फरार रहना पुलिसिंग की जमीनी हकीकत को उजागर करता है। परिवार थाने के चक्कर काटता रहा, लेकिन शुरुआती सक्रियता नहीं दिखी। गिरफ्तारी हुई, पर देर से। यह मामला दिखाता है कि ग्रामीण चौकियों में कानून की गति आरोपी की सामाजिक हैसियत से तय होती है।

पहाड़ी–मानिकपुर मार्ग : रास्ता जो डर बन गया

पहाड़ी और मानिकपुर को जोड़ने वाला मार्ग दिन में सामान्य लगता है, लेकिन शाम होते ही यह महिलाओं के लिए जोखिम का रास्ता बन जाता है। रोशनी की कमी, गश्त का अभाव और सुनसान वातावरण अपराधियों के लिए अवसर बनते हैं।

मऊ थाना क्षेत्र : जाति, डर और यौन हिंसा

मऊ थाना क्षेत्र में दलित युवती के साथ यौन हिंसा के प्रयास ने सामाजिक संरचना का क्रूर चेहरा दिखाया। शिकायत के बाद पंचायत, दबाव और समझौते की कोशिशें शुरू हो गईं। पीड़िता का परिवार गांव छोड़ने को मजबूर हुआ।

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रैपुरा थाना क्षेत्र : नाबालिग और समझौते की संस्कृति

रैपुरा क्षेत्र में स्कूल से लौटती नाबालिग के साथ छेड़छाड़ की घटना के बाद समाज की पहली प्रतिक्रिया कानून नहीं, “समझौता” थी।

करवी कोतवाली : कार्यस्थल पर मौन

करवी कोतवाली क्षेत्र में कार्यस्थल पर यौन शोषण का मामला यह दिखाता है कि महिलाएँ नौकरी के बदले चुप्पी का सौदा करने को मजबूर होती हैं।

समेकित प्रशासनिक आलोचना

इन सभी घटनाओं को जोड़कर देखने पर स्पष्ट होता है कि राज्य की भूमिका प्रतिक्रियात्मक है, रोकथामात्मक नहीं। समाज पीड़िता से सवाल करता है, अपराधी से नहीं।

एक जिले की चेतावनी

यह रिपोर्ट केवल दस्तावेज नहीं, चेतावनी है—कि यदि अब भी व्यवस्था नहीं बदली, तो अपराध कहानी नहीं, स्थायी पहचान बन जाएगा।

सवाल–जवाब

क्या ये घटनाएँ अपवाद हैं?

नहीं, ये घटनाएँ एक पैटर्न की तरह बार–बार सामने आई हैं।

सबसे बड़ी प्रशासनिक चूक क्या रही?

रोकथाम की जगह केवल घटना के बाद सक्रिय होना।

समाज की भूमिका कहाँ सवालों के घेरे में है?

पीड़िता से सवाल पूछने और अपराधी पर चुप्पी साधने में।

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