कुबेर समझे गए ग्राम प्रधान : जिसके हस्ताक्षर से विकास चलता है, उसी की जेब क्यों काटी जाती है?

उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधान की समस्याएं दर्शाती फीचर इमेज, जिसमें प्रधान की पीठ पर लिखा ‘प्रधान’, ग्रामीण विकास कार्य, प्रशासनिक दबाव और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छवि दिखाई दे रही है

🖊️ संजय कुमार वर्मा की खास रिपोर्ट
IMG_COM_202603020511552780
previous arrow
next arrow

देश में पंचायती राज व्यवस्था की शुरुआत इस विश्वास के साथ की गई थी कि लोकतंत्र की जड़ें गाँव तक मजबूत होंगी। ग्राम प्रधान को केवल एक पदाधिकारी नहीं, बल्कि स्थानीय लोकतंत्र का धुरी स्तंभ माना गया। लेकिन समय के साथ–साथ, विशेषकर उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और जटिल सामाजिक–राजनीतिक राज्य में, ग्राम प्रधानों की भूमिका जितनी महत्वपूर्ण हुई, उनकी स्थिति उतनी ही विरोधाभासी और पीड़ादायक होती चली गई।

आज स्थिति यह है कि ग्राम प्रधान, जिन्हें विकास का संवाहक होना चाहिए था, वे स्वयं एक चलता–फिरता ‘कुबेर का खजाना’ मान लिए गए हैं—जिस पर हर कोई अपना हाथ साफ़ करना चाहता है। चाहे वह अधिकारी हो, नेता हो, स्वयंभू समाजसेवी हों, या फिर सोशल मीडिया और मीडिया के नाम पर सक्रिय लोग—हर स्तर पर प्रधानों से अपेक्षाएँ नहीं, बल्कि मांगें की जाती हैं।

उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों की संख्या और दायरा

उत्तर प्रदेश में वर्तमान में लगभग 58,000 से अधिक ग्राम पंचायतें हैं। इसका अर्थ है कि इतने ही ग्राम प्रधान प्रदेश के सबसे निचले, लेकिन सबसे ज़्यादा जिम्मेदारी वाले लोकतांत्रिक पद पर कार्यरत हैं।

इन प्रधानों के कंधों पर— सड़क, नाली, खड़ंजा, पेयजल, स्वच्छता, सामुदायिक भवन, मनरेगा, आवास, शौचालय, वृद्धावस्था, विधवा और दिव्यांग पेंशन, पंचायत सचिवालय का संचालन जैसे दर्जनों कार्य एक साथ लदे होते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या संसाधन और सम्मान भी उसी अनुपात में दिए गए हैं?

मानदेय: सम्मानजनक नाम, लेकिन अपमानजनक हकीकत

उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधान को मिलने वाला मासिक मानदेय औसतन ₹3,000 से ₹3,500 के बीच है। यह राशि— न तो किसी सरकारी कर्मचारी के वेतन के बराबर है न ही प्रधान के कार्यभार के अनुरूप।

सबसे गंभीर बात यह है कि यह मानदेय समय पर भी नहीं मिलता। कई जिलों में प्रधानों को 3–4 महीने, कभी–कभी 6 महीने तक मानदेय का इंतज़ार करना पड़ता है। यानी जो व्यक्ति करोड़ों रुपये के विकास कार्यों का हस्ताक्षरकर्ता है, उसकी निजी आय एक अदना दैनिक मजदूर से भी अनिश्चित है!!

‘खर्चा-पानी’ की अनकही व्यवस्था: अधिकारी और फाइल संस्कृति

विकास कार्य का कोई भी बिल— चाहे वह सड़क का हो, नाली का हो या सामुदायिक भवन का— बिना ‘खर्चा-पानी’ के आगे बढ़े, यह अब एक खुला रहस्य है। JE, ब्लॉक स्तर के कर्मचारी, लेखा अनुभाग, तकनीकी परीक्षण, हर स्तर पर प्रधान से यह अपेक्षा की जाती है कि वह चाय-पानी का प्रबंध स्वयं करे। यह पैसा सरकारी नहीं, प्रधान की निजी जेब या उधार से जाता है।

इसे भी पढें  SIR के बाद यूपी चुनावी गणित: क्या 2027 में कम मार्जिन वाली सीटों पर बदल जाएगा सत्ता का संतुलन?

अग्रिम भुगतान: कागज़ों में सुविधा, ज़मीन पर मज़ाक

नियमों के अनुसार, पंचायतों को विकास कार्य के लिए अग्रिम राशि (Advance) दिए जाने का प्रावधान है। लेकिन व्यवहार में— फाइल महीनों अटकी रहती है जिसके पीछे, कभी तकनीकी आपत्ति तो कभी पोर्टल की समस्या या फिर कभी बजट न होने का बहाना के नीचे दबा दिया जाता है।

परिणाम यह होता है कि प्रधान— पहले काम कराता है, पहले भुगतान करता है, और बाद में सरकारी पैसे के लिए दर-दर भटकता है।

भुगतान के बाद भी भुगतान नहीं: इंतज़ार की अंतहीन कहानी

कार्य पूरा हो जाने के बाद भी— माप पुस्तिका (MB), तकनीकी स्वीकृति और लेखा परीक्षण के नाम पर इन सबमें महीनों लग जाते हैं। कई मामलों में प्रधानों को 6 महीने से 1 साल तक भुगतान का इंतज़ार करना पड़ता है।

इस दौरान— ठेकेदार दबाव बनाता है, मजदूर पैसे मांगते हैं, ब्याज बढ़ता जाता है और प्रधान सामाजिक रूप से कर्जदार और मानसिक रूप से टूटता जाता है।

अधिकारी का दौरा: विकास निरीक्षण या सामाजिक रस्म?

अगर किसी उच्च अधिकारी का गाँव में दौरा तय हो जाए— वाहन, ईंधन, जलपान, भोजन, कभी-कभी ठहराव भी, इन सबका अनौपचारिक इंतज़ाम प्रधान से ही अपेक्षित होता है।
सरकारी दौरा निजी आयोजन में बदल जाता है—जिसका बोझ फिर उसी प्रधान पर पड़ता है, जिसका मानदेय अभी तक आया भी नहीं।

नेताओं और कार्यक्रमों की ‘स्वैच्छिक मजबूरी’

किसी दबंग नेता का— जन्मदिन हो या उनका स्वागत समारोह, धार्मिक या सामाजिक आयोजन होता है तो पंचायत के प्रधान से कहा जाता है— “आप सहयोग करिए, पंचायत का मामला है।” यह सहयोग स्वैच्छिक नहीं, बल्कि अघोषित अनिवार्यता बन चुका है।

मीडिया और सोशल मीडिया: निगरानी या वसूली?

कई बार— सड़क की एक उखड़ी ईंट, खड़ंजे का एक धंसा हिस्सा देखकर प्रधान को धमकी दी जाती है— “खबर चला देंगे…”और फिर खबर दबाने के बदले पैसे की मांग। यह स्थिति पत्रकारिता नहीं, बल्कि लोकतंत्र के भीतर भय की पत्रकारिता बन जाती है।

तर्क और तुलना: आखिर गलती किसकी?

अगर प्रधान— समय पर भुगतान न मिलने, दबावों के बीच समझौता करने, व्यवस्था से जूझने के बाद भी टिके हुए हैं, तो यह उनकी ईमानदारी नहीं, बल्कि मजबूरी है।

इसे भी पढें  2 रुपये के सिक्के के नाम पर सेल्समैन से लाखों की ठगी, जानिए कैसे फंसे जाल में

प्रधान न तो पूर्ण प्रशासक है, न ही स्वतंत्र निर्णयकर्ता— लेकिन जवाबदेही सबसे अधिक उसी की तय कर दी गई है।

अत: प्रधान सुधार नहीं, व्यवस्था सुधार की ज़रूरत आज सबसे ज्यादा है।

उत्तर प्रदेश का ग्राम प्रधान— लोकतंत्र का पहला हस्ताक्षरकर्ता और व्यवस्था का पहला बलि का बकरा दोनों है। अगर पंचायती राज को सचमुच मजबूत करना है, तो— मानदेय सम्मानजनक हो, भुगतान समयबद्ध हो, अग्रिम राशि सुगम हो, निरीक्षण पारदर्शी हो और प्रधान को कुबेर नहीं, सहयोगी समझा जाए तभी यह व्यवस्था बचेगी।

वरना यह दस्तावेज़ आने वाले वर्षों में केवल एक रिपोर्ट नहीं, बल्कि एक चेतावनी बन जाएगा। यह रिपोर्ट केवल वर्तमान की पड़ताल नहीं, भविष्य के लिए एक माइलस्टोन बनने की कोशिश है।

“कुबेर” समझे गए प्रधान : दो केस स्टडी और व्यवस्था की नंगी सच्चाई

उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों को “कुबेर” समझ लेने की मानसिकता कोई कल्पना नहीं, बल्कि ज़मीनी अनुभव से उपजी एक क्रूर सच्चाई है। यह धारणा केवल अफसरों तक सीमित नहीं, बल्कि राजनीतिक तंत्र, स्थानीय दबंगों और तथाकथित निगरानी तंत्र तक गहराई से फैल चुकी है।

केस स्टडी–1 : सड़क बनी, भुगतान रुका—प्रधान बना संदिग्ध

पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक जिले में ग्राम पंचायत द्वारा मनरेगा और राज्य निधि से बनी इंटरलॉकिंग सड़क पूरी तरह गुणवत्ता मानकों के अनुसार तैयार की गई। माप पुस्तिका (MB) भरी गई, तकनीकी सत्यापन भी हो गया, लेकिन भुगतान तीन महीनों तक रोक दिया गया।

कारण? ब्लॉक स्तर पर यह “संदेह” पैदा कर दिया गया कि— “इतना काम हुआ है, तो प्रधान ने ज़रूर कुछ खाया होगा।”

यहाँ प्रधान को दोषी ठहराने के लिए कोई प्रमाण नहीं, केवल यह मानसिकता काफ़ी थी कि प्रधान मतलब पैसा। अंततः भुगतान तभी हुआ, जब “फाइल को आगे बढ़ाने” के लिए प्रधान ने निजी स्तर पर खर्च उठाया।

तुलना स्पष्ट है— ठेकेदार को अग्रिम, विभागीय अफसर को वेतन और सुविधा, लेकिन प्रधान को पहले अपराधी मान लिया जाता है।

केस स्टडी–2 : मीडिया की धमकी और पंचायत का डर

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक कस्बाई ब्लॉक में पंचायत की पुरानी सड़क पर बारिश से एक हिस्सा धँस गया। मरम्मत प्रस्ताव प्रक्रिया में था, लेकिन इसी बीच एक स्थानीय डिजिटल पोर्टल संचालक ने वीडियो बना लिया।

साथ में संदेश आया— “खबर चला देंगे… ऊपर तक जाएगी।” खबर नहीं चली, क्योंकि बाद में “समझौता” हो गया।

इसे भी पढें 
हरदोई: वह धरती जहाँ भारतीय संस्कृति ने अपने प्राचीन स्वर रचे

यह कोई एक घटना नहीं, बल्कि लगातार दोहराया जाने वाला पैटर्न है—जहाँ प्रधान को बताया जाता है कि उसके पास पैसा है, और उसी पैसे पर सबका पहला हक़ है। यह पत्रकारिता नहीं, पंचायत पर वसूली का सामाजिक लाइसेंस है।

‘सबका विकास’ बनाम प्रधानों की उपेक्षा: योगी शासन पर कठोर सवाल

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार “सबका साथ, सबका विकास” और “सुशासन” के नारे को अपनी पहचान बताती है।

ग्रामीण विकास, सड़क, आवास, शौचालय और डिजिटल पंचायतों की बातें मंचों से गूंजती हैं। लेकिन एक मूल प्रश्न लगातार अनुत्तरित है— जो व्यक्ति इस पूरे विकास तंत्र का पहला हस्ताक्षरकर्ता है, वही सबसे असुरक्षित क्यों है?

मानदेय आज भी प्रतीकात्मक है, भुगतान आज भी अनिश्चित है, अग्रिम आज भी सपना है, सम्मान आज भी शर्तों के साथ है, अगर सरकार सचमुच ग्राम स्तर तक विकास की सोचती है, तो उस विकास के स्तंभ—ग्राम प्रधान—के लिए ठोस नीति क्यों नहीं?

क्या सरकार बिना कोलाहल के नहीं सुनती?

यह भी एक कटु सत्य है कि ग्राम प्रधान— न धरना देते हैं न राजधानी में आवाज़ बनते हैं, न उनके पास कोई संगठित दबाव समूह है, इसलिए शायद यह मान लिया गया है कि— “ये सहते रहेंगे।”

लेकिन सवाल यह है— क्या लोकतंत्र केवल वही सुनता है जो शोर मचाए? क्या बिना आंदोलन के पीड़ा का कोई मूल्य नहीं?

अगर सरकार को सचमुच सुशासन स्थापित करना है, तो उसे प्रधानों की चुप्पी को सहमति नहीं, विवशता समझना होगा।

चेतावनी या अवसर

ग्राम प्रधान को कुबेर समझने की प्रवृत्ति— भ्रष्टाचार नहीं घटाती बल्कि व्यवस्था को और अपारदर्शी बनाती है। आज ज़रूरत इस बात की है कि सरकार— प्रधान को संदेह की नज़र से नहीं बल्कि लोकतंत्र के साझेदार के रूप में देखे, वरना आने वाले समय में पंचायतें केवल नाम की रह जाएँगी, और यह रिपोर्ट एक चेतावनी दस्तावेज़ के रूप में पढ़ी जाएगी— कि कैसे विकास की बात करने वाली व्यवस्था ने अपने सबसे मज़बूत स्तंभ को सबसे कमज़ोर छोड़ दिया❓

❓ महत्वपूर्ण सवाल–जवाब

क्या ग्राम प्रधान को पर्याप्त मानदेय मिलता है?

नहीं, वर्तमान मानदेय कार्यभार और जिम्मेदारियों की तुलना में बेहद अपर्याप्त है।

क्या प्रधानों को समय पर भुगतान सुनिश्चित है?

नहीं, भुगतान अक्सर महीनों तक लंबित रहता है।

क्या सरकार को बिना आंदोलन के प्रधानों की पीड़ा दिखती है?

वर्तमान व्यवस्था में बिना दबाव या कोलाहल के समस्याएँ अनसुनी रह जाती हैं।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top