उत्तर प्रदेश की राजनीति और अपराध की दुनिया में एक बड़ा नाम—मुख्तार अंसारी।
एक ऐसा नाम, जो वर्षों तक सुर्खियों में रहा। लेकिन उनकी मौत के बाद भी यह नाम शांत नहीं हुआ, बल्कि और गहरे सवालों में उलझ गया।
मौत के करीब दो साल बाद भी यह सवाल जस का तस खड़ा है— क्या यह एक सामान्य मौत थी या फिर एक सुनियोजित साजिश?
यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की मौत की नहीं है, बल्कि उस पूरे तंत्र की है, जहाँ सच और शक के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।
आखिरी अर्जी: डर, दर्द और एक आशंका
21 मार्च 2024। बाराबंकी सिविल कोर्ट में एक अर्जी दाखिल होती है।
इस अर्जी में लिखा था— “मुझे बांदा जेल में जान का खतरा है। नसों में दर्द है, हाथ-पैर ठंडे पड़ गए हैं। स्टाफ मुझे खाने में स्लो पॉइजन दे रहा है। लग रहा है कि किसी भी पल मौत आ जाएगी।”
यह कोई आम शिकायत नहीं थी। यह उस व्यक्ति की आवाज थी, जो खुद को मौत के करीब महसूस कर रहा था।
लेकिन महज 7 दिन बाद, 28 मार्च 2024 को, वही आशंका सच में बदल गई— मुख्तार अंसारी की मौत हो गई।
सरकारी जांच: हार्ट अटैक की कहानी
मौत के अगले दिन, 29 मार्च को, उत्तर प्रदेश सरकार ने मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए।
जांच टीम में बांदा की जिलाधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल और पुलिस अधीक्षक अंकुर अग्रवाल शामिल थे। करीब 172 दिन चली इस जांच में 100 से ज्यादा लोगों के बयान दर्ज किए गए।
16 सितंबर 2024 को आई रिपोर्ट ने निष्कर्ष दिया— मौत का कारण हार्ट अटैक (Myocardial Infarction) था। जांच रिपोर्ट में तीन प्रमुख बातें सामने आईं— पहली— जेल के खाने में जहर नहीं मिला।
बैरक नंबर 16 से लिए गए गुड़, चना और नमक के सैंपल में कोई जहरीला तत्व नहीं पाया गया।
दूसरी— जेल मैनुअल के अनुसार खाना पहले स्टाफ और रसोइए चखते हैं। ऐसे में जहर देने की संभावना कम मानी गई।
तीसरी— मौत से पहले जिन कैदियों ने वही खाना खाया, उनकी तबीयत खराब नहीं हुई।
सरकार और जांच एजेंसियों के लिए यह एक साफ निष्कर्ष था— यह मौत प्राकृतिक थी।
परिवार और वकील: साजिश का दावा
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। मुख्तार अंसारी के परिवार और उनके वकील इस निष्कर्ष को मानने के लिए तैयार नहीं हैं।
उनके वकील रणधीर सिंह सुमन कहते हैं—
“यह एक सोची-समझी साजिश थी। जेल स्टाफ ने मिलकर हत्या की।”
वे अपने दावों के समर्थन में दो मुख्य बातें रखते हैं—
पहली— मौत से करीब दो हफ्ते पहले से मुख्तार की तबीयत खराब थी। 19 मार्च की रात के खाने के बाद उन्होंने पहली बार जहर देने की बात कही थी।
दूसरी— 21 मार्च को कोर्ट में दी गई अर्जी में उन्होंने साफ लिखा था कि करीब 40 दिन पहले उन्हें स्लो पॉइजन दिया गया था।
वकील का तर्क है कि— अगर कोई कैदी खुद बार-बार जहर दिए जाने की शिकायत कर रहा है, तो उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सुरक्षा पर सवाल: क्या जेल सच में सुरक्षित थी?
जांच रिपोर्ट के अनुसार, जेल की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत थी।
CCTV फुटेज खंगाले गए, और रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि—
👉 मुख्तार को अस्पताल ले जाने में कोई देरी नहीं हुई
👉 गोल्डन आवर का सही इस्तेमाल किया गया
लेकिन मुख्तार पक्ष की कहानी अलग है।
उनका कहना है कि—
👉 जेल में हत्या की साजिश पहले से चल रही थी
👉 CCTV कैमरों का मुंह मोड़ दिया जाता था
👉 कुछ कैदियों को हत्या के बदले 5 करोड़ रुपए और मुकदमों से राहत देने का लालच दिया गया
यह आरोप गंभीर थे। लेकिन सवाल यह है—क्या इनके समर्थन में ठोस सबूत हैं?
मेडिकल रिपोर्ट बनाम परिजनों के आरोप
मजिस्ट्रियल जांच में मेडिकल रिपोर्ट को आधार बनाया गया। रिपोर्ट में कहा गया—
👉 हार्ट की मसल्स में येलो स्पॉट और ब्लॉकेज मिला
👉 यह पुरानी बीमारी के बढ़ने का संकेत है
यानि मौत अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे बढ़ती बीमारी का परिणाम थी।
लेकिन मुख्तार के बेटे उमर अंसारी ने कोर्ट में कहा—
👉 शरीर पर चोट के निशान थे
👉 नाक और कान से खून निकला था
👉 आंखें सूजी हुई थीं
इन दावों ने पूरे मामले को और उलझा दिया।
अफजाल अंसारी का बयान: “हम सच सामने लाएंगे”
मुख्तार के बड़े भाई और सांसद अफजाल अंसारी इस मौत को सामान्य नहीं मानते।
वे कहते हैं—
“मौत से पहले फोन पर बात हुई थी। वो बार-बार कह रहे थे कि उन्हें जहर दिया जा रहा है।”
उनका दावा है कि—
👉 यह सिर्फ एक मेडिकल केस नहीं है
👉 इसमें प्रशासन की भूमिका की जांच होनी चाहिए
जेल प्रशासन का पक्ष
बांदा जेल के तत्कालीन सुपरिटेंडेंट विरेश राज शर्मा ने मामले पर टिप्पणी करने से इनकार किया।
वहीं वर्तमान सुपरिटेंडेंट आलोक कुमार ने बताया—
👉 बैरक नंबर 16 अब भी सील है
👉 मुख्तार के कपड़े और सामान भी जांच के तहत रखे गए हैं
👉 परिवार को सामान लेने के लिए कहा गया, लेकिन कोई नहीं आया
इससे यह स्पष्ट होता है कि मामला अभी भी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है।
कानूनी विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
सुप्रीम कोर्ट के क्रिमिनल लॉयर शाश्वत आनंद इस मामले को अलग नजर से देखते हैं। उनके अनुसार—
👉 जहर देने का दावा कमजोर है, क्योंकि शिकायत और मौत के बीच 9 दिन का अंतर था
👉 अगर जहर दिया गया होता, तो “स्टमक पंपिंग” जैसी मेडिकल प्रक्रिया की मांग की जा सकती थी
सुपारी वाले आरोप पर वे कहते हैं—
👉 हाई सिक्योरिटी जेल में ऐसी साजिश को अंजाम देना आसान नहीं होता
और चोट के निशानों पर—
👉 अगर परिवार के पास सबूत थे, तो हाईकोर्ट में दूसरी पोस्टमॉर्टम की मांग करनी चाहिए थी
सच और शक के बीच फंसी कहानी
इस पूरे मामले में दो तस्वीरें सामने आती हैं—
एक—
सरकारी जांच, जो कहती है कि मौत प्राकृतिक थी
दूसरी—
परिवार और वकील, जो इसे साजिश मानते हैं।
इन दोनों के बीच सच कहीं छुपा हुआ है।
क्या यह सिर्फ एक मौत है?
यह मामला सिर्फ मुख्तार अंसारी की मौत का नहीं है।
यह उन सवालों का भी है—
👉 क्या जेल में बंद व्यक्ति पूरी तरह सुरक्षित है?
👉 क्या हर कस्टोडियल डेथ की जांच निष्पक्ष होती है?
👉 क्या व्यवस्था पर सवाल उठाना जरूरी नहीं है?
एक अधूरी फाइल, जो अभी बंद नहीं हुई
दो साल बीत चुके हैं। लेकिन यह मामला अभी भी खत्म नहीं हुआ। परिवार सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहा है। नई याचिकाएं दाखिल हो सकती हैं।
और शायद— यह मामला एक बार फिर खुल सकता है।
जवाब अभी बाकी है
मुख्तार अंसारी की मौत एक घटना नहीं, एक सवाल है। एक ऐसा सवाल—जिसका जवाब अभी अधूरा है।
क्या यह हार्ट अटैक था?या फिर एक साजिश?
शायद सच सामने आएगा… या शायद यह भी उन कहानियों में शामिल हो जाएगा, जहाँ सवाल हमेशा जिंदा रहते हैं— और जवाब… फाइलों में दबे रह जाते हैं।
कहानी अभी खत्म नहीं हुई… क्योंकि जब तक सवाल बाकी हैं, तब तक सच भी कहीं न कहीं सांस ले रहा है।
❓ FAQ
मुख्तार अंसारी की मौत का आधिकारिक कारण क्या बताया गया?
मजिस्ट्रियल जांच रिपोर्ट के अनुसार मौत का कारण हार्ट अटैक बताया गया है।
परिवार क्या आरोप लगा रहा है?
परिवार और वकील का आरोप है कि जेल में स्लो पॉइजन देकर हत्या की गई।
क्या मामला अभी बंद हो चुका है?
नहीं, परिवार सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में है और मामला दोबारा खुल सकता है।





