अखिलेश यादव
का यूजीसी कानून पर संतुलित समर्थन सामने आया है। उन्होंने कहा कि कानून ऐसा हो जिसमें दोषियों को सज़ा मिले, लेकिन किसी भी निर्दोष के साथ अन्याय न हो—यही लोकतांत्रिक न्याय का मूल है।
यूजीसी बिल पर अखिलेश यादव का समर्थन संसद के बजट सत्र 2026 में उस समय चर्चा का केंद्र बन गया, जब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) से जुड़े नए कानून पर अपनी स्पष्ट और संतुलित राय रखी। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि कानून का उद्देश्य दंडात्मक कम और न्यायपूर्ण अधिक होना चाहिए—ताकि दोषी बच न पाएं, अन्याय न हो और निर्दोष किसी भी सूरत में न फंसें। उत्तर प्रदेश सहित देशभर में इस कानून को लेकर चल रहे विरोध-प्रदर्शनों के बीच अखिलेश का यह रुख राजनीतिक और शैक्षणिक—दोनों दृष्टियों से अहम माना जा रहा है।
यूजीसी कानून पर अखिलेश का संतुलन और शर्तों वाला समर्थन
अखिलेश यादव ने साफ किया कि शिक्षा से जुड़े किसी भी कानून का मूल उद्देश्य भय पैदा करना नहीं, बल्कि संस्थानों में पारदर्शिता, जवाबदेही और न्याय सुनिश्चित करना होना चाहिए। उनके मुताबिक, यदि कानून की भाषा या क्रियान्वयन में अस्पष्टता रहती है, तो उसका दुरुपयोग संभव है। इसलिए नियम ऐसे हों जिनमें दोष सिद्ध होने पर सख़्त कार्रवाई हो, लेकिन केवल आरोप के आधार पर किसी की अकादमिक या पेशेवर ज़िंदगी तबाह न हो।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि उच्च शिक्षा संस्थानों में पहले से ही कई नियामक व्यवस्थाएं मौजूद हैं। ऐसे में नया कानून तभी प्रभावी माना जाएगा, जब वह मौजूदा ढांचे को सुदृढ़ करे, न कि डर और अविश्वास का वातावरण बनाए। अखिलेश का कहना था कि लोकतंत्र में कानून जनता के हित में होते हैं—जनता के खिलाफ नहीं।
देशभर में विरोध, सरकार से स्पष्टता की मांग
यूजीसी के नए कानून को लेकर कई विश्वविद्यालयों, छात्र संगठनों और शिक्षाविदों ने आपत्तियां जताई हैं। विरोध का प्रमुख कारण नियमों की अस्पष्टता और संस्थागत समितियों को दिए गए व्यापक अधिकार बताए जा रहे हैं। अखिलेश यादव ने इन चिंताओं को जायज़ ठहराते हुए कहा कि सरकार को संवाद के रास्ते पर चलना चाहिए और सभी हितधारकों की बात सुननी चाहिए।
उनके अनुसार, शिक्षा का क्षेत्र केवल प्रशासनिक नियंत्रण का विषय नहीं है, बल्कि यह भविष्य की पीढ़ियों से जुड़ा सवाल है। यदि कानून से भय का माहौल बनेगा, तो शोध, नवाचार और स्वतंत्र विचार बाधित होंगे। इसलिए, नियमों में संतुलन और सुरक्षा-प्रावधान अनिवार्य हैं।
अजित पवार प्लेन क्रैश पर उठाए सवाल
यूजीसी बिल के अलावा अखिलेश यादव ने महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम
अजित पवार
की प्लेन क्रैश में हुई मौत पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि वीआईपी सुरक्षा से जुड़े मामलों में इस तरह की घटनाएं न केवल चिंताजनक हैं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी जांच की मांग करती हैं।
अखिलेश के मुताबिक, अतीत में भी कई प्रमुख हस्तियों की इसी तरह दुर्घटनाओं में जान गई है। इसलिए यह ज़रूरी है कि इस घटना की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच हो, ताकि सच्चाई सामने आए और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
किसान, मंडी और उत्पादन पर सरकार को घेरा
अखिलेश यादव ने कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुद्दा उठाते हुए कहा कि दूध, धान और अन्य कृषि उत्पादों के उत्पादन में गिरावट चिंता का विषय है। उन्होंने सवाल किया कि किसान मंडियां क्यों नहीं बन रहीं, जबकि मंडी व्यवस्था किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य दिलाने का सबसे प्रभावी माध्यम है।
उन्होंने कहा कि यदि सरकार वास्तव में किसानों की आय बढ़ाना चाहती है, तो उसे बुनियादी ढांचे—मंडी, भंडारण और परिवहन—पर गंभीरता से निवेश करना होगा। केवल घोषणाओं से किसान की स्थिति नहीं सुधरेगी।
काशी, मेट्रो और अहिल्याबाई होल्कर का संदर्भ
अखिलेश यादव ने प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र काशी में मेट्रो परियोजना और ऐतिहासिक विरासत से जुड़े मुद्दों पर भी सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि अहिल्याबाई होल्कर का योगदान सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उनका आरोप था कि काशी में
अहिल्याबाई होल्कर
से जुड़े घाट को बुलडोजर से तोड़ा गया, जो सांस्कृतिक असंवेदनशीलता को दर्शाता है। अखिलेश ने कहा कि जो लोग ऐसी ऐतिहासिक धरोहरों को नष्ट करते हैं, वे स्वयं को सनातनी कहने का नैतिक अधिकार खो देते हैं।
राजनीतिक संकेत और आगे की राह
यूजीसी बिल पर अखिलेश यादव का समर्थन बिना शर्त नहीं, बल्कि स्पष्ट शर्तों के साथ है। यह रुख संकेत देता है कि विपक्ष केवल विरोध की राजनीति नहीं, बल्कि रचनात्मक सुझावों के साथ सामने आना चाहता है। शिक्षा, सुरक्षा, किसान और संस्कृति—चारों मुद्दों को एक साथ उठाकर अखिलेश ने सरकार पर बहुआयामी दबाव बनाने की कोशिश की है।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन सुझावों को कितनी गंभीरता से लेती है। यदि संवाद और संशोधन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो यूजीसी कानून वास्तव में न्यायपूर्ण और प्रभावी बन सकता है।






