श्रद्धा की धरती प्रयागराज से बिना संगम स्नान विदा होना केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि संत समाज और व्यवस्था के रिश्तों पर उठता गंभीर प्रश्न है।
प्रयागराज के माघ मेले से शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का प्रस्थान एक सामान्य धार्मिक घटना नहीं, बल्कि आस्था, आत्मसम्मान और पीड़ा से जुड़ा हुआ वह प्रसंग है जिसने संत समाज से लेकर आम श्रद्धालुओं तक को सोचने पर मजबूर कर दिया है। बुधवार सुबह प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनका मन इतना व्यथित है कि वे बिना स्नान किए ही माघ मेला छोड़ने को विवश हुए।
जब मन व्यथित हो, तो संगम भी शांति नहीं देता
शंकराचार्य ने अपने वक्तव्य में कहा कि प्रयागराज सदियों से आस्था और शांति की धरती रही है। वे श्रद्धा के साथ यहां आए थे, लेकिन एक ऐसी घटना घटित हुई जिसकी उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी। उन्होंने साफ कहा कि जब दिल में दुख और गुस्सा हो, तब पवित्र जल भी मन को शांति नहीं दे पाता। यह कथन केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक अर्थ रखता है।
माघ मेला प्रशासन का प्रस्ताव और अस्वीकार
शंकराचार्य के अनुसार, माघ मेला प्रशासन की ओर से उन्हें एक पत्र भेजा गया, जिसमें पूरे सम्मान के साथ पालकी द्वारा संगम ले जाकर स्नान कराने का प्रस्ताव था। प्रस्ताव में फूलों की वर्षा और विशेष सम्मान की बात भी कही गई थी, लेकिन शंकराचार्य ने इसे ठुकरा दिया। उनका कहना था कि सम्मान का प्रदर्शन उस पीड़ा की भरपाई नहीं कर सकता, जो उनके मन में उत्पन्न हुई है।
बिना स्नान विदाई: मौन लेकिन गहरा संदेश
तीर्थराज प्रयागराज से बिना संगम स्नान लौटना अपने आप में एक असाधारण निर्णय है। यह निर्णय किसी विरोध प्रदर्शन की तरह नहीं था, बल्कि एक मौन संदेश था—कि आस्था केवल आयोजन या प्रोटोकॉल से नहीं, बल्कि संवेदनशील व्यवहार से जीवित रहती है। शंकराचार्य का यह कदम आत्मिक असंतोष का प्रतीक बन गया।
राजनीति, धर्म और अनिश्चितता की टिप्पणी
शंकराचार्य ने यह भी कहा कि उन्हें नहीं पता कौन सा नेता आएगा और कौन सी पार्टी सत्ता में रहेगी। यह टिप्पणी किसी राजनीतिक दल विशेष पर नहीं, बल्कि उस अस्थिरता पर थी, जो धार्मिक आयोजनों में राजनीति की बढ़ती भूमिका से उत्पन्न होती है। यह कथन संत समाज की उस चिंता को दर्शाता है, जिसमें धर्म की गरिमा को लेकर असमंजस बढ़ता जा रहा है।
काशी की ओर प्रस्थान: आत्मचिंतन की राह
प्रयागराज छोड़कर काशी की ओर रवाना होना भी प्रतीकात्मक माना जा रहा है। काशी सनातन परंपरा में आत्मचिंतन, वैराग्य और मोक्ष की नगरी मानी जाती है। यह प्रस्थान इस बात का संकेत है कि शंकराचार्य विवादों से दूर रहकर आध्यात्मिक संतुलन की ओर लौटना चाहते हैं।
श्रद्धालुओं और संत समाज की प्रतिक्रिया
इस घटनाक्रम के बाद संत समाज और आम श्रद्धालुओं में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कई लोगों ने इसे धार्मिक आत्मसम्मान से जुड़ा मामला बताया, जबकि कुछ ने प्रशासन से अपेक्षा जताई कि भविष्य में संतों की भावनाओं के प्रति अधिक संवेदनशीलता दिखाई जाए।
बड़ा सवाल: क्या आस्था को केवल व्यवस्था माना जा रहा है?
यह पूरा घटनाक्रम एक बड़ा प्रश्न खड़ा करता है—क्या धार्मिक परंपराओं को केवल प्रशासनिक प्रबंधन और कार्यक्रमों तक सीमित कर दिया गया है? क्या संतों के आत्मिक भावों को समझने की कोशिश पर्याप्त है? शंकराचार्य का यह निर्णय इन सवालों के सीधे जवाब नहीं देता, लेकिन सोचने के लिए विवश जरूर करता है।
निष्कर्ष: एक विदाई, कई संकेत
माघ मेले से शंकराचार्य की विदाई केवल एक खबर नहीं, बल्कि धर्म, समाज और सत्ता के संबंधों पर पुनर्विचार का संकेत है। यह याद दिलाती है कि आस्था की धरती पर शांति केवल व्यवस्थाओं से नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और सम्मान से आती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
शंकराचार्य ने संगम स्नान क्यों नहीं किया?
उन्होंने कहा कि मन में व्यथा और आक्रोश होने पर पवित्र जल भी शांति नहीं दे पाता, इसलिए उन्होंने स्नान न करने का निर्णय लिया।
माघ मेला प्रशासन ने क्या प्रस्ताव दिया था?
प्रशासन ने पालकी से संगम ले जाकर पूरे सम्मान के साथ स्नान कराने और फूलों की वर्षा का प्रस्ताव भेजा था।
काशी रवाना होने का क्या अर्थ है?
काशी आत्मचिंतन और वैराग्य की नगरी मानी जाती है। यह प्रस्थान आध्यात्मिक संतुलन की ओर लौटने का संकेत माना जा रहा है।








