जहाँ इलाज मिलना था , वहाँ ताले लटक रहे हैं: ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की कड़वी सच्चाई

बंद पड़ा ग्रामीण स्वास्थ्य उपकेंद्र, ताले लगे दरवाज़े और उपेक्षित चिकित्सा उपकरण, ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति दर्शाते हुए


यह रिपोर्ट एक बंद स्वास्थ्य उपकेंद्र से शुरू होती है, लेकिन सवाल पूरे जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ता है—क्या प्राथमिक इलाज अब भी गांव तक पहुंच पा रहा है?

सुनील शुक्ला की रिपोर्ट
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ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर एक बार फिर सामने है और यह तस्वीर केवल किसी एक गांव तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के विकासखंड रामपुर मथुरा क्षेत्र अंतर्गत ग्राम पंचायत शुक्लानपुरवा में लाखों रुपये की लागत से बना सार्वजनिक स्वास्थ्य उपकेंद्र बीते लगभग पांच महीनों से बंद पड़ा है। न भवन की मरम्मत हुई, न डॉक्टर या स्वास्थ्यकर्मी की तैनाती सुनिश्चित की गई। परिणामस्वरूप, यह उपकेंद्र ग्रामीणों के लिए सुविधा नहीं, बल्कि प्रशासनिक उपेक्षा का प्रतीक बन चुका है।

यह स्थिति केवल एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था के भीतर पनप रहे उस जिला-स्तरीय संकट की ओर इशारा करती है, जहां योजनाएं मौजूद हैं, भवन खड़े हैं, लेकिन व्यवस्था सांसें गिन रही है।

भवन बना, उम्मीद जगी, फिर सब ठहर गया

शुक्लानपुरवा में इस सार्वजनिक स्वास्थ्य उपकेंद्र का निर्माण इस सोच के साथ किया गया था कि गांव और आसपास के क्षेत्र के लोगों को प्राथमिक उपचार, टीकाकरण, गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच और बच्चों की स्वास्थ्य सेवाएं गांव में ही मिल सकें। शुरुआती समय में ग्रामीणों ने यहां इलाज भी कराया, लेकिन धीरे-धीरे यह केंद्र उपेक्षा का शिकार होता चला गया।

आज हालत यह है कि भवन तो खड़ा है, लेकिन उसके भीतर कोई गतिविधि नहीं। ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की यह विडंबना साफ दिखती है—जहां संसाधन तो हैं, पर संचालन और निगरानी का अभाव है।

ग्राम प्रधान की शिकायतें, प्रशासन की चुप्पी

ग्राम प्रधान ने बताया कि उपकेंद्र की बदहाल स्थिति को लेकर उन्होंने कई बार संबंधित स्वास्थ्य विभाग को लिखित और मौखिक रूप से अवगत कराया। मरम्मत, स्टाफ तैनाती और नियमित संचालन को लेकर बार-बार आग्रह किया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

उनका कहना है कि ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था का सबसे कमजोर पक्ष यही है कि जमीनी शिकायतें फाइलों में दबकर रह जाती हैं। न निरीक्षण होता है, न जवाबदेही तय होती है।

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मामूली बीमारी, भारी मजबूरी

स्थानीय निवासी रामस्वरूप बताते हैं कि पहले मामूली बुखार, चोट या सामान्य दवा के लिए इसी उपकेंद्र का सहारा लिया जाता था। अब स्थिति यह है कि 15 से 20 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। यह दूरी केवल रास्ते की नहीं, बल्कि खर्च, समय और जोखिम की दूरी है।

गरीब और मजदूर वर्ग के लिए यह सफर हर बार संभव नहीं होता। नतीजा यह कि बीमारी को नजरअंदाज किया जाता है, जो आगे चलकर गंभीर रूप ले लेती है। यह ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे खतरनाक चूक मानी जा सकती है।

महिलाएं और बच्चे: सबसे कमजोर कड़ी

गांव की महिला सरोज देवी बताती हैं कि यह उपकेंद्र गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों के लिए बेहद अहम था। नियमित जांच, टीकाकरण और पोषण संबंधी सेवाएं यहीं मिल जाती थीं। उपकेंद्र बंद होने के बाद उन्हें निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है, जहां इलाज महंगा है।

कई परिवार आर्थिक रूप से इतने सक्षम नहीं कि बार-बार निजी अस्पताल जा सकें। ऐसे में इलाज टालना एक मजबूरी बन जाती है। यह स्थिति ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था को सीधे तौर पर मातृ और शिशु स्वास्थ्य के संकट से जोड़ती है।

जर्जर भवन और प्रशासनिक लापरवाही

युवक मोहन का कहना है कि उपकेंद्र की हालत दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है। दीवारों में दरारें पड़ चुकी हैं, छत से प्लास्टर झड़ रहा है, कई कमरों में सीलन है और परिसर में मलबा फैला पड़ा है। बरसात के मौसम में भवन के गिरने का डर बना रहता है।

इसके बावजूद अब तक किसी अधिकारी ने निरीक्षण करना जरूरी नहीं समझा। यह दृश्य ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी अनदेखी को उजागर करता है।

सीतापुर जिला: कागजों में मजबूत, ज़मीन पर कमजोर

सीतापुर जिले में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और उपकेंद्रों का एक विस्तृत नेटवर्क कागजों में मौजूद है। योजनाओं के तहत मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, टीकाकरण और प्राथमिक उपचार को मजबूत करने के दावे किए जाते हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर तस्वीर अलग दिखाई देती है।

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कई केंद्रों पर डॉक्टरों के पद खाली हैं, कहीं दवाओं की कमी है, तो कहीं भवन जर्जर हालत में हैं। ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की यह कमजोरी जिला अस्पतालों पर अतिरिक्त बोझ डालती है, जहां पहले से ही मरीजों की भारी भीड़ रहती है।

सरकारी योजनाएं और अमल की खाई

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन सहित कई योजनाओं का उद्देश्य यही है कि ग्रामीण क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावी ढंग से पहुंचें। बजट भी जारी होता है, दिशानिर्देश भी बनते हैं। लेकिन जब स्थानीय स्तर पर निगरानी और जवाबदेही कमजोर हो, तो योजनाएं प्रभावहीन हो जाती हैं।

शुक्लानपुरवा का उपकेंद्र इस बात का उदाहरण है कि केवल भवन निर्माण से ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत नहीं होती।

ग्रामीणों की सामूहिक आवाज

ग्रामीणों ने एकजुट होकर मांग की है कि उपकेंद्र की तत्काल मरम्मत कराई जाए और डॉक्टर व कर्मचारियों की नियमित तैनाती सुनिश्चित की जाए। उनका कहना है कि लाखों रुपये की लागत से बना यह भवन यदि यूं ही बंद पड़ा रहा, तो यह सार्वजनिक धन की खुली बर्बादी होगी।

निष्कर्ष: सवाल व्यवस्था से, उम्मीद अभी बाकी

जहाँ इलाज मिलना था, वहाँ ताले लटकना केवल एक गांव की कहानी नहीं है। यह ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था के उस जिला-स्तरीय संकट को उजागर करता है, जिसमें योजनाएं और हकीकत आमने-सामने खड़ी हैं। सवाल यह है कि क्या प्रशासन समय रहते इस खाई को पाट पाएगा, या फिर ग्रामीणों की यह मजबूरी यूं ही व्यवस्था की फाइलों में दबती रहेगी।

जिला-स्तरीय स्वास्थ्य आंकड़े: संकट क्यों केवल एक गांव तक सीमित नहीं

यदि शुक्लानपुरवा के बंद स्वास्थ्य उपकेंद्र को केवल एक स्थानीय चूक मान लिया जाए, तो यह अधूरा विश्लेषण होगा। दरअसल, यह स्थिति ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था के उस जिला-स्तरीय दबाव को उजागर करती है, जिससे सीतापुर लंबे समय से जूझ रहा है। जिले में प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचे का बड़ा हिस्सा उपकेंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर आधारित है, जिनका सीधा संबंध ग्रामीण आबादी से है।

स्वास्थ्य विभाग की संरचना के अनुसार, एक उपकेंद्र पर हजारों की आबादी निर्भर होती है। जब ऐसे केंद्र बंद होते हैं या केवल नाम के लिए संचालित रहते हैं, तो उसका सीधा असर आसपास के कई गांवों पर पड़ता है। शुक्लानपुरवा का मामला इसी व्यापक दबाव का एक उदाहरण बनकर उभरता है।

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सीतापुर जिले में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और जिला अस्पताल पहले से ही मरीजों के अत्यधिक बोझ से जूझ रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती रही है, जिसका एक बड़ा कारण यह है कि प्राथमिक और उपकेंद्र स्तर पर इलाज समय पर उपलब्ध नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप, मामूली बीमारियां भी जिला अस्पताल तक पहुंच जाती हैं।

जिला स्तर पर यह भी एक स्थापित तथ्य है कि कई स्वास्थ्य इकाइयों में चिकित्सकों, एएनएम और पैरामेडिकल स्टाफ के पद लंबे समय से खाली चल रहे हैं। जहां स्टाफ तैनात भी है, वहां एक कर्मचारी पर कई गांवों की जिम्मेदारी होती है। ऐसे में नियमित सेवाएं बाधित होना लगभग तय हो जाता है।

मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से देखें तो उपकेंद्रों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच, टीकाकरण और पोषण संबंधी सेवाएं इन्हीं इकाइयों के माध्यम से प्रभावी ढंग से दी जानी होती हैं। जब उपकेंद्र बंद रहते हैं, तो यह जिम्मेदारी सीधे तौर पर निजी अस्पतालों या दूरस्थ सरकारी संस्थानों पर चली जाती है, जो हर परिवार के लिए सुलभ नहीं होती।

जिला-स्तर पर स्वास्थ्य योजनाओं के लिए बजट और दिशा-निर्देश उपलब्ध होने के बावजूद, जमीनी निगरानी की कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। कई बार भवन निर्माण और कागजी रिपोर्टिंग पूरी मानी जाती है, लेकिन संचालन, मरम्मत और मानव संसाधन की स्थिति पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता। यही कारण है कि ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था में अंतर लगातार गहराता जाता है।

इस संदर्भ में शुक्लानपुरवा का उपकेंद्र केवल एक बंद इमारत नहीं रह जाता, बल्कि यह उस पूरी जिला-स्तरीय व्यवस्था का प्रतीक बन जाता है, जहां प्राथमिक स्वास्थ्य तंत्र कमजोर पड़ता जा रहा है और उसका बोझ ऊपर की इकाइयों पर स्थानांतरित होता जा रहा है।

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