मृत्यु के नाम पर दिखावा अब नहीं एक समाज ने सदियों पुरानी कुप्रथा पर लगा दी रोक

सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ निर्णय लेते साहू (तेली) समाज के पदाधिकारी और समाजजन

हिमांशु मोदी की रिपोर्ट
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डीग जिले के कस्बा जुरहरा में साहू (तेली) समाज ने सामाजिक सुधार की दिशा में एक ऐसा निर्णय लिया है, जिसने परंपरा और विवेक के बीच लंबे समय से चल रहे टकराव को स्पष्ट कर दिया है। समाज की पंचायत बैठक में मृत्यु भोज, तेरहवीं और ब्राह्मण भोज जैसी परंपराओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का फैसला किया गया। इसे सामाजिक शोषण और फिजूलखर्ची की जड़ बताते हुए समाज ने यह संकल्प लिया कि शोक को दिखावे का माध्यम नहीं बनने दिया जाएगा।

जब परंपरा बोझ बनने लगे तो सवाल उठते हैं

समाज में चली आ रही कई परंपराएं समय के साथ अपनी मूल भावना खो देती हैं। मृत्यु भोज भी ऐसी ही एक परंपरा बन चुकी थी, जिसमें शोक से अधिक दिखावे और सामाजिक दबाव की भूमिका बढ़ती चली गई। कई परिवारों के लिए यह परंपरा सम्मान नहीं, बल्कि कर्ज और अपमान का कारण बनती जा रही थी। साहू (तेली) समाज की पंचायत में इसी सच्चाई को स्वीकार करते हुए आत्ममंथन किया गया।

बैठक में वक्ताओं ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मृत्यु किसी परिवार के लिए सबसे संवेदनशील क्षण होता है। ऐसे समय में भोज, न्योते और औपचारिकताओं का दबाव उस पीड़ा को और गहरा कर देता है। यही कारण रहा कि समाज ने साहसिक निर्णय लेते हुए इस कुप्रथा को समाप्त करने का रास्ता चुना।

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रामलीला मैदान में हुई निर्णायक पंचायत

यह ऐतिहासिक फैसला कस्बा जुरहरा के रामलीला मैदान में आयोजित साहू (तेली) समाज की पंचायत बैठक में लिया गया। बैठक में समाज के वरिष्ठ पदाधिकारियों, युवाओं और बड़ी संख्या में समाजबंधुओं ने भाग लिया। लंबी चर्चा के बाद सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि मृत्यु भोज और उससे जुड़ी अन्य अनावश्यक परंपराओं को अब पूरी तरह समाप्त किया जाएगा।

पंचायत में यह भी तय किया गया कि यह निर्णय केवल औपचारिक घोषणा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे व्यवहार में लागू किया जाएगा। समाज ने सामूहिक रूप से यह जिम्मेदारी ली कि कोई भी सदस्य इन नियमों का उल्लंघन न करे।

मृत्यु भोज पर पूर्ण प्रतिबंध का फैसला

बैठक का सबसे अहम निर्णय मृत्यु भोज पर पूर्ण प्रतिबंध को लेकर रहा। इसके अंतर्गत ग्यारहवें दिन सामूहिक भोजन के न्योते और बारहवें दिन होने वाले मृत्यु भोज को पूरी तरह बंद कर दिया गया है। समाज ने यह भी तय किया कि न केवल मृत्यु भोज करना, बल्कि उसमें शामिल होना भी सामाजिक नियमों के खिलाफ माना जाएगा।

समाज के अनुसार, यह कठोर निर्णय इसलिए आवश्यक था ताकि कोई भी परिवार सामाजिक दबाव में आकर नियम तोड़ने को मजबूर न हो। पंचायत का मानना है कि सामूहिक अनुशासन ही इस सुधार की असली ताकत है।

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सीमित धार्मिक प्रक्रिया, बिना दिखावे

नए निर्णयों के तहत यह भी तय किया गया कि मृत्यु उपरांत धार्मिक कर्मकांड में केवल परिवार के सदस्य, नजदीकी रिश्तेदार और पांच ब्राह्मण ही शामिल हो सकेंगे। किसी भी प्रकार का आमंत्रण पत्र या सार्वजनिक न्योता नहीं दिया जाएगा। इसके साथ ही मृत्यु के बाद की ‘पहरानी’ जैसी परंपरा को भी समाप्त कर दिया गया है।

समाज का कहना है कि इससे शोक की प्रक्रिया अधिक शांत, सादगीपूर्ण और मानवीय बनेगी, जिसमें दिखावे की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी।

दान और सेवा को बनाया गया सम्मानजनक विकल्प

पंचायत में यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि कोई परिवार मृत व्यक्ति की स्मृति में कुछ करना चाहता है, तो वह दान-दक्षिणा, शिक्षा सहायता, स्वास्थ्य सेवा या जरूरतमंद लोगों की मदद जैसे कार्यों में योगदान दे सकता है। समाज ने इसे दिखावे के बजाय सार्थक स्मरण का मार्ग बताया।

इस पहल को समाजजनों ने भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्रेरणादायक बताया और कहा कि इससे समाज की सामूहिक चेतना मजबूत होगी।

कानून और समाज, दोनों की भावना के अनुरूप

बैठक में यह भी उल्लेख किया गया कि मृत्यु भोज पर प्रतिबंध केवल सामाजिक ही नहीं, बल्कि कानूनी दृष्टि से भी उचित है। प्रशासन द्वारा पहले से ही इस कुप्रथा को हतोत्साहित किया जाता रहा है। ऐसे में समाज द्वारा स्वेच्छा से लिया गया यह फैसला कानून की भावना के भी अनुरूप माना जा रहा है।

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शिक्षा और सामाजिक सशक्तिकरण पर जोर

पंचायत बैठक में समाज की आगे की दिशा को लेकर भी गंभीर चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि समाज की वास्तविक उन्नति शिक्षा से ही संभव है। बच्चों की पढ़ाई, युवाओं के मार्गदर्शन और जरूरतमंद परिवारों की सहायता को समाज की प्राथमिक जिम्मेदारी बताया गया।

समाजजनों ने सभी सदस्यों से अपील की कि वे इन निर्णयों का ईमानदारी से पालन करें और अन्य समाजों के लिए भी उदाहरण बनें।

बैठक में मौजूद प्रमुख समाजजन

इस बैठक में अध्यक्ष चंद्रशेखर साहू, उपाध्यक्ष पूरन साहू, संरक्षक डाल चंद साहू, संरक्षक प्रीतम साहू, मंत्री दिनेश साहू, महामंत्री कमल साहू सहित लव साहू, प्रमोद साहू, रामोतार साहू, अशोक साहू, गोविन्द साहू, दौलत साहू, रविंद्र साहू, ब्रह्म स्वरूप साहू, विद्या सागर साहू, जयप्रकाश साहू, भूपेश साहू, नीशू साहू, अनिल साहू, सूरज साहू, विनोद साहू और बड़ी संख्या में समाजबंधु उपस्थित रहे।

एक फैसला, जो मिसाल बन सकता है

साहू (तेली) समाज का यह निर्णय केवल एक परंपरा को समाप्त करने का मामला नहीं है, बल्कि यह सामाजिक चेतना और साहस का उदाहरण है। यह दिखाता है कि जब समाज खुद आत्मचिंतन करता है, तो बदलाव संभव होता है। उम्मीद की जा रही है कि यह पहल अन्य समाजों को भी दिखावे से ऊपर उठकर मानवीय और विवेकपूर्ण रास्ता चुनने की प्रेरणा देगी।

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