राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष हिंदू सम्मेलन की श्रृंखला के अंतर्गत शाहाबाद खंड के ग्राम सकरौली, नसौली गोपाल एवं वैजुपुर में आयोजित हिंदू सम्मेलन केवल औपचारिक कार्यक्रम नहीं रहे, बल्कि वे समाज के भीतर आत्मचिंतन, जागरूकता और संगठनात्मक एकता के सशक्त मंच बनकर उभरे। इन सम्मेलनों का उद्देश्य हिंदू समाज को उसकी सांस्कृतिक जड़ों, सामाजिक दायित्वों और राष्ट्र निर्माण में उसकी भूमिका से अवगत कराना रहा। कार्यक्रमों में विचार, संस्कार और संगठन—तीनों का संतुलित समावेश स्पष्ट रूप से देखने को मिला।
शताब्दी वर्ष : संगठनात्मक यात्रा और वैचारिक पुनर्स्मरण
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष केवल एक ऐतिहासिक पड़ाव नहीं, बल्कि आत्ममूल्यांकन और भावी दिशा तय करने का अवसर है। शाहाबाद खंड में आयोजित हिंदू सम्मेलनों ने इसी भावना को केंद्र में रखते हुए समाज को यह स्मरण कराया कि संगठन की शक्ति उसकी निरंतरता, अनुशासन और सामाजिक समरसता में निहित है। वक्ताओं ने रेखांकित किया कि बीते सौ वर्षों में संघ ने राष्ट्रसेवा, सामाजिक समन्वय और सांस्कृतिक चेतना के क्षेत्र में जो भूमिका निभाई है, वह आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है।
मुख्य वक्ताओं के विचार : समाज, संस्कार और संगठन
सम्मेलनों में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित आदरणीय गोविंद जी (पूर्व जिला प्रचारक) ने अपने उद्बोधन में कहा कि हिंदू सम्मेलन समाज को जोड़ने का माध्यम हैं, न कि किसी वर्ग विशेष को अलग करने का। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ का कार्य पंथ, जाति या वर्ग से ऊपर उठकर राष्ट्र और समाज के व्यापक हित में केंद्रित है। उनका कहना था कि आज आवश्यकता है कि समाज अपने दायित्वों को पहचाने और आत्मनिर्भरता, अनुशासन तथा सेवा भाव को जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाए।
जिला कार्यवाह सचिन जी ने संगठनात्मक दृष्टि से हिंदू सम्मेलनों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन कार्यकर्ताओं में ऊर्जा और दिशा दोनों प्रदान करते हैं। उन्होंने बताया कि संघ का मूल मंत्र व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण तक की यात्रा है, और यह यात्रा तभी सफल हो सकती है जब समाज का प्रत्येक वर्ग इसमें सहभागी बने।
मातृशक्ति की भूमिका : सामाजिक परिवर्तन की आधारशिला
सम्मेलनों में ब्रह्मकुमारी प्रजापति से बहन लवली जी ने मातृशक्ति की भूमिका पर विशेष रूप से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि समाज का नैतिक और संस्कारवान निर्माण महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के बिना संभव नहीं है। मातृशक्ति केवल परिवार तक सीमित न रहकर समाज को दिशा देने वाली शक्ति है। उनके विचारों में आध्यात्मिकता, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व का स्पष्ट समन्वय देखने को मिला।
संचालन और संगठन : अनुशासन का जीवंत उदाहरण
कार्यक्रमों का संचालन गिरीश जी, शशि जी एवं अमितेश जी द्वारा किया गया। संचालन की शैली में अनुशासन, समयबद्धता और विषय की गंभीरता स्पष्ट झलकती रही। यह दर्शाता है कि संघ के कार्यक्रम केवल विचार मंच नहीं, बल्कि संगठनात्मक दक्षता के भी उदाहरण होते हैं।
पंच परिवर्तन : समाज परिवर्तन का व्यावहारिक मार्ग
कार्यक्रम में उपस्थित खंड संघ चालक संजय जी, नगर विस्तारक मनीष जी, शारीरिक प्रमुख अमित जी और पर्यावरण प्रमुख शरद जी ने पंच परिवर्तन की अवधारणा को विस्तार से रखा। वक्ताओं ने बताया कि पंच परिवर्तन—स्व, परिवार, समाज, पर्यावरण और राष्ट्र—इन पांच स्तरों पर सकारात्मक बदलाव लाने की प्रक्रिया है। यदि व्यक्ति अपने आचरण में परिवर्तन लाता है, तो उसका प्रभाव परिवार और समाज तक स्वतः पहुंचता है।
मुख्य अतिथि का संदेश : आवश्यकता और प्रासंगिकता
कार्यक्रम की गरिमा उस समय और बढ़ गई जब मुख्य अतिथि उच्च शिक्षा राज्य मंत्री रजनी तिवारी जी ने हिंदू सम्मेलनों की आवश्यकता और सामाजिक भूमिका पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि आज के बदलते सामाजिक परिदृश्य में ऐसे आयोजनों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। पंच परिवर्तन के माध्यम से समाज को जागरूक करना समय की मांग है, ताकि विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों की भी रक्षा हो सके।
ग्रामीण अंचल में प्रभाव : संवाद से सहभागिता तक
ग्राम सकरौली, नसौली गोपाल और वैजुपुर में आयोजित इन सम्मेलनों का प्रभाव केवल कार्यक्रम स्थल तक सीमित नहीं रहा। ग्रामीणों की सक्रिय सहभागिता ने यह स्पष्ट कर दिया कि समाज वैचारिक संवाद के लिए तैयार है। लोगों ने न केवल वक्ताओं की बातों को ध्यान से सुना, बल्कि अपने अनुभवों और प्रश्नों के माध्यम से संवाद को आगे बढ़ाया।
निष्कर्ष : शताब्दी वर्ष से शाश्वत चेतना तक
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष हिंदू सम्मेलन की यह श्रृंखला शाहाबाद खंड में केवल आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का अभियान बनकर सामने आई। इन सम्मेलनों ने यह संदेश दिया कि संगठन की शक्ति विचार में, समाज की मजबूती संस्कार में और राष्ट्र की उन्नति सामूहिक सहभागिता में निहित है। पंच परिवर्तन के विचार को आत्मसात करते हुए यदि समाज आगे बढ़ता है, तो शताब्दी वर्ष की यह यात्रा आने वाले वर्षों के लिए सशक्त आधार सिद्ध होगी।






