डर से निकला सवाल, जवाब से बड़ा सन्नाटा
यह सवाल एक ऐसे कमरे में पूछा गया था जहाँ हर चेहरा सतर्क था। उन्नाव की यह रेप सर्वाइवर इंटरव्यू के दौरान बार-बार हमारी ओर देखती हैं, कुछ कहना चाहती हैं, फिर रुक जाती हैं। उनकी आँखों में शब्दों से ज़्यादा डर है—एक ऐसा डर जो धमकियों से नहीं, बल्कि न्यायिक आदेशों से जन्म लेता है। सामने के कमरे में उनकी माँ, कुछ मीडियाकर्मी और सुरक्षा में लगे लोग बैठे हैं। माहौल में कोई हल्कापन नहीं, सिर्फ़ असुरक्षा और आशंका है।
“हर बेटी की हिम्मत टूट रही है”
जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें पता है कि सीबीआई दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट जाने वाली है, तो उनका जवाब सीधा था। उन्होंने कहा कि बहस के समय एजेंसियाँ क्या कर रही थीं। उनके अनुसार, आज हालात ऐसे हो गए हैं कि या तो बलात्कार के बाद लड़की मार दी जाती है, या दोषी सज़ा पाकर कुछ वर्षों में बाहर आ जाता है। इस तरह के आदेश समाज की हर बेटी का मनोबल तोड़ते हैं।
आठ साल — ज़िंदगी नहीं, लगातार संघर्ष
बीते आठ साल इस सर्वाइवर के लिए सामान्य जीवन नहीं रहे। रेप, गैंगरेप, पुलिस कस्टडी में पिता की मौत, सड़क हादसे में दो रिश्तेदारों और वकील की मृत्यु और फिर स्वयं छह महीने तक अस्पताल में ज़िंदगी के लिए संघर्ष—यह सब एक साथ किसी एक इंसान के हिस्से में आया। इन वर्षों में गिरफ़्तारियाँ भी हुईं, मुक़दमे चले, सज़ाएँ भी सुनाई गईं, लेकिन हर फ़ैसले के साथ डर भी बढ़ता गया।
“अगर बहस हिन्दी में होती…”
वह कहती हैं कि यदि अदालत की बहस हिन्दी में होती, तो वह ख़ुद अपना केस लड़ लेतीं। उन्हें अंग्रेज़ी पूरी तरह नहीं आती, लेकिन कुछ शब्द समझ आ जाते हैं। जब अदालत में “अलाउ” शब्द बोला गया, तभी उन्हें आभास हो गया कि निर्णय उनके पक्ष में नहीं है। पाँच किलोमीटर की दूरी तय करना किसी प्रभावशाली व्यक्ति के लिए कोई मायने नहीं रखता—यही उनका डर है।
मौत से आमना-सामना
सर्वाइवर बताती हैं कि यदि उन्हें मारना होगा, तो कोई सीधे सामने से नहीं आएगा। यह काम दूसरों से कराया जाएगा—ऐसा वह समाज में बार-बार देख चुकी हैं। वह छह महीने वेंटिलेटर पर रहीं, मौत से लड़कर लौटीं। ज़िला अदालत के जज अस्पताल में उनका बयान लेने आते थे। कई बार आवाज़ नहीं निकलती थी, बेहोशी होती थी, फिर भी वह बयान देती रहीं।
नाबालिग पीड़िता से दो बच्चों की माँ तक
जब उन्होंने पहली बार आरोप लगाए, तब वह नाबालिग थीं। बाद में अदालत ने उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई, लेकिन कानूनी तकनीकी तर्कों के चलते फैसले बदले। अदालतों में लोक सेवक की परिभाषा पर हुई बहस ने उनके मन में यह डर बैठा दिया कि न्याय कहीं काग़ज़ों में न उलझ जाए।
परिवार का उजड़ना और पलायन
वह बताती हैं कि पिता की मौत के बाद पूरे परिवार को खत्म करने की योजना बनाई गई थी। डर इतना था कि साल 2017 में ही उन्नाव छोड़ना पड़ा। आज भी उनके परिवार के सदस्य सहमे हुए हैं। हालिया आदेश के बाद उन्हें लगता है कि खतरा फिर से सिर उठा सकता है।
सड़क हादसा और अधूरा न्याय
2019 के सड़क हादसे में उनकी चाची, मौसी और वकील की मौत हो गई। वह स्वयं गंभीर रूप से घायल हुईं। अदालत ने बाद में साज़िश के आरोपों से आरोपी को बरी कर दिया, लेकिन उनके लिए यह हादसा कभी सिर्फ़ हादसा नहीं रहा। वह कहती हैं कि सुरक्षा के बावजूद धमकियाँ मिलती रहीं।
“मुझे फूलन देवी बनने को मजबूर किया जा रहा है”
उनका यह कथन व्यवस्था पर गहरा सवाल है। वह हथियार उठाने की बात नहीं कर रहीं, बल्कि यह कह रही हैं कि जब सिस्टम बार-बार धक्का देता है, तो इंसान को कोने में धकेल देता है। उनका आग्रह साफ़ है—ज़मानत रद्द हो और सभी दोषी जेल में रहें।
माँ, पत्नी और एक अटूट संघर्ष
आज वह दो बच्चों की माँ हैं। उनके पति की नौकरी चली गई है और वह घर पर बच्चों को संभाल रहे हैं। बच्चे कभी माँ का दूध नहीं पी सके, क्योंकि वह लगातार संघर्ष में उलझी रहीं। सुरक्षा के बावजूद डर बना रहता है, लेकिन उनका कहना है कि वे हार नहीं मानेंगी।
❓ पाठकों के सवाल
क्या उन्नाव रेप केस में दोषी बाहर आ सकता है?
कानूनी प्रक्रियाओं और अपीलों के कारण पीड़िता को यह आशंका है, हालांकि कुछ मामलों में सज़ा अभी भी प्रभावी है।
सर्वाइवर को सबसे बड़ा डर किस बात का है?
उन्हें अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर गंभीर आशंका है, खासकर हालिया अदालती आदेशों के बाद।
क्या सर्वाइवर अभी भी न्याय की लड़ाई लड़ रही हैं?
हाँ, उनका कहना है कि जब तक ज़मानत ख़ारिज नहीं होती, वह पीछे नहीं हटेंगी।