उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की आहट के साथ ही गांव-गांव में राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। इसी बीच अनंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन ने कई स्थानों पर असंतोष और विवाद की स्थिति पैदा कर दी है।
गोंडा जिले के तरबगंज, इटियाथोक और करनैलगंज क्षेत्रों से सामने आई शिकायतें बताती हैं कि मतदाता सूची का यह मसला केवल तकनीकी चूक नहीं, बल्कि गंभीर प्रशासनिक लापरवाही और संभावित पक्षपात की ओर इशारा करता है।
तरबगंज तहसील क्षेत्र के जयप्रभा ग्राम में स्थिति तब और चौंकाने वाली हो गई, जब गांव के मौजूदा ग्राम प्रधान ओमप्रकाश का ही नाम मतदाता सूची से गायब पाया गया। ग्राम प्रधान ओमप्रकाश का आरोप है कि बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) और सुपरवाइजर ने जानबूझकर उनका नाम मतदाता सूची से काट दिया, जबकि वे लंबे समय से उसी गांव के निवासी हैं और वर्तमान में निर्वाचित प्रधान भी हैं।
ओमप्रकाश का कहना है कि केवल उनका ही नहीं, बल्कि गांव के लगभग 100 से 150 अन्य पात्र मतदाताओं के नाम भी सूची से हटा दिए गए हैं। इसके विपरीत, कई मृतक मतदाता और बाहरी लोग अब भी मतदाता सूची में दर्ज हैं। जब इस गड़बड़ी पर सवाल उठाए गए, तो संबंधित अधिकारियों की ओर से संतोषजनक जवाब देने के बजाय तहसील में दावा-आपत्ति दर्ज कराने की औपचारिक सलाह दे दी गई।
बीएलओ का पक्ष: डुप्लीकेट नामों की आड़ में कटौती
बीएलओ रामकुमार ने इस पूरे प्रकरण पर सफाई देते हुए कहा कि उन्हें लगभग 420 डुप्लीकेट मतदाताओं की सूची प्राप्त हुई थी। इसके बाद घर-घर जाकर मतदाताओं से आधार कार्ड की मांग की गई। जिन मतदाताओं के नाम दो अलग-अलग स्थानों पर दर्ज पाए गए, उनके नाम सूची से हटा दिए गए।
हालांकि, स्थानीय लोगों का सवाल यह है कि यदि यह प्रक्रिया इतनी ही पारदर्शी थी, तो फिर ग्राम प्रधान जैसे सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति का नाम कैसे कट गया? और अगर नाम दो जगह दर्ज था, तो इसकी पूर्व सूचना संबंधित व्यक्ति को क्यों नहीं दी गई?
प्रशासन की प्रतिक्रिया: जांच का आश्वासन
मामले को लेकर एसडीएम सदर अशोक गुप्ता ने स्वीकार किया कि जयप्रभा ग्राम प्रधान की ओर से शिकायत प्राप्त हुई है। उन्होंने कहा कि यह जांच कराई जाएगी कि लापरवाही कहां हुई है और किस स्तर पर चूक हुई। वहीं, सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी नारायण ने स्पष्ट किया कि 30 दिसंबर तक मतदाता अपने दावे और आपत्तियां दर्ज करा सकते हैं।
उनके अनुसार तहसील, ब्लॉक और बूथ स्तर पर बीएलओ के माध्यम से भी नाम जुड़वाने, संशोधन कराने या कटे हुए नाम पुनः जोड़ने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। सभी अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि कोई भी पात्र मतदाता सूची से वंचित न रहे।
तहसील स्तर की फीडिंग पर उठे गंभीर सवाल
मतदाता सूची में गड़बड़ी की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। तरबगंज के सिंगहाचंदा गांव निवासी विशाल पाठक ने आरोप लगाया कि उन्होंने 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके 65 नए मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए सभी आवश्यक दस्तावेजों के साथ आवेदन दिया था, लेकिन सूची में एक भी नाम नहीं जोड़ा गया।
विशाल पाठक का कहना है कि तहसील स्तर पर बड़े पैमाने पर फीडिंग में खेल किया गया है। कई बाहरी मतदाता अब भी सूची में शामिल हैं, जबकि वास्तविक और पात्र मतदाताओं को बाहर कर दिया गया है। इस आरोप ने पूरी मतदाता सूची प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
बीएलओ वेदप्रकाश ने इस संदर्भ में बताया कि उन्होंने 319 नाम जोड़ने के लिए तहसील में फॉर्म जमा किए थे, लेकिन फीडिंग के दौरान गड़बड़ी हो गई। यह स्वीकारोक्ति दर्शाती है कि समस्या केवल जमीनी स्तर पर नहीं, बल्कि प्रशासनिक तंत्र के ऊपरी पायदान तक फैली हुई है।
करनैलगंज में सामूहिक नाराजगी
करनैलगंज क्षेत्र के परसपुर बसंतपुर आंटा गांव में तो स्थिति और भी गंभीर है। यहां पंचायत चुनाव की मतदाता सूची से एक साथ 165 लोगों के नाम गायब हो गए। इससे ग्रामीणों में भारी नाराजगी देखने को मिली।
ग्रामीणों का आरोप है कि बीएलओ ने कथित तौर पर विरोधी गुटों से मिलकर उनके नाम सूची से हटवा दिए, जिससे उन्हें अपने संवैधानिक मताधिकार से वंचित होना पड़ा। ग्रामीणों ने अधिकारियों से मिलकर विरोध दर्ज कराया और निष्पक्ष जांच की मांग की।
लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी
मतदाता सूची किसी भी लोकतांत्रिक चुनाव की बुनियाद होती है। यदि इसी बुनियाद में गड़बड़ी हो, तो निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव की कल्पना करना कठिन हो जाता है। ग्राम प्रधान का नाम कट जाना यह दर्शाता है कि आम नागरिक की स्थिति कितनी असुरक्षित हो सकती है।
यह सवाल भी उठता है कि यदि समय रहते आपत्तियां दर्ज न कराई जाएं, तो कितने ही लोग मतदान के दिन अपने मताधिकार से वंचित रह जाएंगे। ऐसे मामलों में केवल दावा-आपत्ति की औपचारिक प्रक्रिया बताना पर्याप्त नहीं, बल्कि सक्रिय निगरानी और जवाबदेही तय करना भी जरूरी है।
प्रशासन की चेतावनी और जिम्मेदारी
एडीएम आलोक कुमार ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि मतदाता अपने दावे और आपत्तियां दें, सभी गलतियों को सुधारा जाएगा। यदि किसी भी स्तर पर लापरवाही सामने आती है, तो संबंधित अधिकारी या कर्मचारी की जिम्मेदारी तय की जाएगी। निर्वाचन कार्यों में किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
हालांकि, अब यह देखने वाली बात होगी कि यह चेतावनी केवल कागजों तक सीमित रहती है या वास्तव में दोषियों पर कार्रवाई होती है। क्योंकि लोकतंत्र में विश्वास बनाए रखने के लिए केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई जरूरी है।
निष्कर्ष: समय रहते सुधार जरूरी
मतदाता सूची में नाम कटने की यह घटनाएं केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी हैं। ग्राम प्रधान से लेकर आम ग्रामीण तक, सभी का मताधिकार सुरक्षित रहना चाहिए। पंचायत चुनाव जैसे जमीनी लोकतंत्र में यदि विश्वास डगमगाता है, तो उसका असर पूरे शासन तंत्र पर पड़ता है।
अब जरूरत है कि प्रशासन समय रहते सभी दावे और आपत्तियों का निष्पक्ष निस्तारण करे, तहसील स्तर की फीडिंग प्रक्रिया को पारदर्शी बनाए और बीएलओ की जवाबदेही तय करे। तभी यह सुनिश्चित हो सकेगा कि आने वाले पंचायत चुनाव वास्तव में जनभागीदारी और लोकतांत्रिक मूल्यों का उत्सव बन सकें।
पाठकों के सवाल (FAQ)
अगर किसी मतदाता का नाम सूची से कट गया है तो क्या करें?
ऐसे मतदाता तहसील, ब्लॉक या बीएलओ के माध्यम से निर्धारित तिथि तक दावा-आपत्ति दर्ज करा सकते हैं और नाम पुनः जुड़वा सकते हैं।
दावा-आपत्ति की अंतिम तिथि क्या है?
प्रशासन के अनुसार 30 दिसंबर तक मतदाता अपने दावे और आपत्तियां दर्ज करा सकते हैं।
क्या बीएलओ की लापरवाही पर कार्रवाई हो सकती है?
हां, प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि लापरवाही पाए जाने पर संबंधित अधिकारी या कर्मचारी की जिम्मेदारी तय की जाएगी।









