राम आए, चले गए… पर क्या रावण सचमुच मर गया?

राम और रावण के प्रतीक के माध्यम से आधुनिक भारत में सामाजिक अन्याय, स्त्री उत्पीड़न, दलित अत्याचार और नैतिक संकट को दर्शाती प्रतीकात्मक फीचर इमेज
अनिल अनूप

(समकालीन भारत, समाज और सत्ता के बीच खड़ा एक गहन साहित्यिक संपादकीय)

राम आए—मर्यादा की लौ लेकर। कृष्ण आए—नीति, लीला और धर्म की जटिल व्याख्या के साथ। ऋषि आए—तप, त्याग और सत्य का आलोक फैलाते हुए।
समय आगे बढ़ता गया, युग बदलते गए, और ये सभी इतिहास की स्मृतियों में प्रतिष्ठित हो गए। कहा जाता है कि शिव आज भी तपस्थ हैं—पर अदृश्य। हनुमान महाबाहुबली थे—आज विलुप्त। रावण का सार्वजनिक संहार हुआ—उत्सवों, कथाओं और विजयोल्लास के बीच।
लेकिन आज, इस पूरे इतिहास के सामने खड़ा सबसे असहज और जरूरी प्रश्न यही है— क्या रावण सचमुच मर गया?
यह प्रश्न किसी पौराणिक कथा का विस्तार नहीं, बल्कि हमारे समय की नैतिक जाँच-पड़ताल है।

रावण: देह नहीं, एक जीवित प्रवृत्ति

इतिहास में रावण का अंत एक घटना था, पर समाज में रावण का अंत कभी पूर्ण नहीं हुआ। क्योंकि रावण एक व्यक्ति नहीं, एक मानसिक संरचना है। वह मानसिकता जो शक्ति पाकर संवेदना खो देती है।
वह सोच जो ज्ञान पाकर भी विनम्र नहीं होती। वह व्यवस्था जो खुद को बचाने के लिए मनुष्य को कुचल देती है।
आज रावण किसी लंका में नहीं रहता। वह फाइलों की चुप्पी, डिजिटल आँकड़ों की बेरुख़ी, कॉरपोरेट मुनाफ़े की अंधी दौड़ और सबसे ज़्यादा—हमारी आदत बन चुकी चुप्पी में बसता है।

स्त्री: तब युद्ध का कारण, आज भी सबसे आसान शिकार

तब एक स्त्री के अपहरण पर पूरा युग युद्ध में उतर आया था। आज रोज़ असंख्य स्त्रियाँ अपमान, हिंसा और चरित्र-हनन झेलती हैं— और समाज अगली खबर पर स्क्रॉल कर जाता है।
आज का रावण— हाथ उठाए बिना चीरहरण करता है। शब्दों से, अफ़वाहों से, ट्रोल और शक से। राजधानी की सड़कों पर घटने वाली घटनाएँ और वर्षों तक भटकता न्याय—
यह सब बताता है कि रावण ने हथियार बदले हैं, इरादे नहीं। यदि रावण सचमुच मर गया होता, तो स्त्री से पहले सिस्टम शर्मिंदा होता।

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दलित उत्पीड़न: आधुनिक रावण का सामूहिक चेहरा

संविधान ने बराबरी का वादा किया। लेकिन ज़मीनी सच्चाई आज भी जाति पहचानती है। जब स्कूल में बच्चे की जाति पूछी जाती है, जब घोड़ी चढ़ने पर बारात रोकी जाती है, जब हत्या “सामाजिक तनाव” में बदल दी जाती है— तब यह स्पष्ट हो जाता है कि रावण अकेला नहीं। वह अब सामाजिक मौन में फैल चुका है। वह उन लोगों में भी है जो कहते हैं— “ऐसा तो होता ही है।”

भूख और गरीबी: सभ्यता की सबसे बड़ी पराजय

भूख नारे नहीं लगाती। वह कैमरे नहीं बुलाती। वह बस चुपचाप इंसान को भीतर से खोखला कर देती है। अभी बहुत दूर की बात नहीं— जब सड़कों पर पैदल चलते लोग अपने ही देश में प्रवासी बन गए। हाथ में गठरी, आँख में डर और पेट में भूख। उस समय कोई रावण का पुतला नहीं जला, पर सभ्यता का बहुत कुछ जल गया। अगर उस दृश्य के बाद भी हम कहें कि रावण मर चुका है, तो यह सच नहीं—सुविधा की भाषा होगी।

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कर्ज़ और साहूकारी: नई उम्र की गुलामी

आज गुलामी ज़ंजीरों से नहीं, ब्याज की दरों से पहचानी जाती है। किसान बीज बोता है, पर काटता है कर्ज़। हर साल आँकड़े आते हैं और हर साल कुछ घरों में ताले लग जाते हैं। यह रावण तलवार नहीं उठाता। यह काग़ज़ पर हस्ताक्षर करवाता है और जब आदमी टूट जाता है, तो वह सिर्फ़ एक खबर बन जाता है।

देवता अदृश्य क्यों हैं?

लोग पूछते हैं—हनुमान क्यों नहीं आते? शिव क्यों प्रकट नहीं होते?
शायद इसलिए कि, देवता वहाँ आते हैं जहाँ समाज में संवेदना जीवित होती है। आज हम भीड़ हैं— उत्तेजित, विभाजित, थके हुए। भीड़ में देवता नहीं उतरते— भीड़ में सिर्फ़ रावण फलता है।

रामराज्य का वास्तविक अर्थ

रामराज्य का अर्थ सिंहासन पर राम के बैठने से नहीं बनता। रामराज्य बनता है— जब सबसे कमज़ोर सुरक्षित हो, जब सत्ता जवाबदेह हो, जब धर्म हथियार नहीं, नैतिकता हो।
आज हम राम का नाम लेते हैं, लेकिन राम की कठिन शर्तें स्वीकार नहीं करते।

लोकतंत्र और नागरिक चुप्पी

लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी तानाशाह नहीं, थका हुआ नागरिक होता है।
जब हम कहते हैं— “सब एक जैसे हैं”, “बोलने से क्या होगा”— तब रावण को किसी अस्त्र की ज़रूरत नहीं पड़ती। वह जान जाता है— अब विरोध नहीं आएगा।

तो क्या रावण मरा?

नहीं। रावण मरा नहीं। वह हर उस जगह ज़िंदा है जहाँ अन्याय को सामान्य मान लिया गया है। जहाँ पीड़ा को आंकड़े में बदल दिया गया है। जहाँ चुप्पी को समझदारी कहा जाता है।
रावण तलवार से नहीं मरता— वह विवेक, प्रतिरोध और नैतिक साहस से मरता है।

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निष्कर्ष: अंत नहीं, एक ज़रूरी शुरुआत

हर युग को अपने राम स्वयं गढ़ने पड़ते हैं। वे अयोध्या से नहीं आते— वे अंतरात्मा से जन्म लेते हैं।
जिस दिन— स्त्री को दया नहीं, न्याय मिलेगा, दलित को पहचान नहीं, बराबरी मिलेगी, भूख को भाषण नहीं, भोजन मिलेगा, किसान को मुआवज़ा नहीं, सम्मान मिलेगा— उसी दिन रावण सचमुच मरेगा।
तब तक— वह इतिहास में मरा हुआ है, और समाज में पूरी तरह जीवित।


सवाल–जवाब (FAQ)

क्या रावण केवल पौराणिक पात्र है?

नहीं, रावण एक मानसिक, सामाजिक और नैतिक प्रवृत्ति का प्रतीक है जो हर युग में नए रूप में सामने आती है।

क्या आज के समाज में भी रावण मौजूद है?

हाँ, जब अन्याय सामान्य लगे, पीड़ा पर चुप्पी छा जाए और संवेदना कमजोर पड़ जाए— वहीं आधुनिक रावण सक्रिय होता है।

रामराज्य का वास्तविक अर्थ क्या है?

रामराज्य का अर्थ सत्ता नहीं, बल्कि न्याय, जवाबदेही, नैतिकता और सबसे कमजोर व्यक्ति की सुरक्षा से है।

रावण का अंत कैसे संभव है?

रावण का अंत तलवार से नहीं, बल्कि विवेक, प्रतिरोध, संवेदना और नैतिक साहस से ही संभव है।

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  1. सवालों के जवाब:–
    1. रावण मानवीय प्रवृत्ति है
    2. राक्षसी प्रवृत्ति सर्वत्र व्यापक है
    3. संविधान को ईमानदारी से लागू करना
    4. ईमानदारी संस्कारी और अनुशासित मर्यादा में रहना।
    भारत देश में महिला संरक्षण, कमजोरी की रक्षा, रामराज्य और सनातनी परंपरा,धर्म, पूजा और पूजा स्थल की सुरक्षा का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को संविधान देता है। कोई देवालय या धर्म संविधान की रक्षा नहीं करता अपितु संविधान उनको संरक्षण देता हैं।
    लेकिन दुर्भाग्य वस संविधान के रखवाले में रावण जा बैठा है।

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