रोशनी की व्यवस्था में थकते हाथ : जब आधे मीटर रीडर्स पर टिका दिया जाता है पूरे सिस्टम का बोझ

मीटर रीडर्स पर बढ़ते काम के बोझ को दर्शाती फीचर इमेज, बिजली व्यवस्था में श्रमिकों की थकान और संघर्ष

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यह रिपोर्ट गोंडा जिले में मीटर रीडर्स की आवश्यकता बनाम उपलब्धता, क्षेत्रवार कार्यभार, विभागीय संरचना, और काम के दबाव से उपजी मानवीय चुनौतियों का तर्कपूर्ण, दस्तावेज़ी और शालीन विश्लेषण प्रस्तुत करती है—जहाँ आलोचना है, पर संयमित है; जहाँ सवाल हैं, पर उद्देश्य सुधार है।

अब्दुल मोबीन सिद्दीकी की खास रिपोर्ट

गोंडा (उत्तर प्रदेश)। बिजली व्यवस्था किसी भी जिले की जीवनरेखा होती है। घरों की रौशनी, अस्पतालों की मशीनें, स्कूलों के पंखे, दुकानों की रफ्तार—सब कुछ इसी पर निर्भर करता है। लेकिन इस व्यवस्था के भीतर काम करने वाले हाथ अगर थक जाएँ, बोझ से झुक जाएँ और फिर भी उनकी सुनवाई न हो, तो सवाल केवल कार्य-प्रबंधन का नहीं रह जाता—वह श्रम-न्याय, प्रशासनिक संवेदनशीलता और लोकतांत्रिक जवाबदेही का सवाल बन जाता है। गोंडा जिले में मीटर रीडर्स की मौजूदा स्थिति कुछ ऐसी ही गंभीर तस्वीर पेश करती है।

उपभोक्ताओं का फैलाव और मीटर रीडिंग का वास्तविक गणित

गोंडा जिला प्रशासनिक रूप से बड़ा और सामाजिक-भौगोलिक दृष्टि से विविध है। शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ सुदूर ग्रामीण पंचायतें, नदी-तराई इलाक़े, बिखरी बस्तियाँ और सीमांत गांव—सब एक ही बिजली तंत्र से जुड़े हैं। विभागीय व सार्वजनिक आंकड़ों के आधार पर जिले में लगभग 3.8 लाख से अधिक बिजली उपभोक्ता हैं। इनमें घरेलू, वाणिज्यिक, कृषि और सरकारी कनेक्शन शामिल हैं।

सामान्य प्रशासनिक मानक के अनुसार, एक मीटर रीडर पर 1,200–1,500 उपभोक्ताओं का दायित्व अपेक्षाकृत व्यावहारिक माना जाता है—वह भी तब, जब क्षेत्र सघन शहरी हो, दूरी कम हो और डिजिटल सहायता उपलब्ध हो।

गोंडा जैसे जिले में, जहाँ—
एक गाँव से दूसरे गाँव के बीच दूरी अधिक है, सड़कें हर मौसम में समान रूप से सुगम नहीं, कई क्षेत्रों में नेटवर्क/डिवाइस बाधाएँ हैं, वहाँ 1,000–1,200 उपभोक्ता प्रति रीडर का मानक भी कड़ा पड़ता है।

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आवश्यकता बनाम उपलब्धता: काग़ज़ पर व्यवस्था, ज़मीन पर कमी

यदि 3.8 लाख उपभोक्ताओं को 1,200 के औसत से बाँटा जाए, तो कम-से-कम 315–320 मीटर रीडर्स की आवश्यकता बनती है।

लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि गोंडा जिले में कार्यरत मीटर रीडर्स की संख्या इस आवश्यकता से लगभग आधी—करीब 150–170 के बीच सिमटी हुई है (स्थायी व संविदा दोनों को मिलाकर भी)।

इसका सीधा अर्थ है— एक मीटर रीडर पर 2,200 से 2,600 उपभोक्ताओं का बोझ, हर महीने सीमित समय में असंभव लक्ष्य और लक्ष्य न पूरा होने पर मानसिक दबाव व दंडात्मक चेतावनियाँ।

यह असंतुलन कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही विभागीय अनदेखी का परिणाम है।

क्षेत्रवार कार्यभार: ग्रामीण अंचलों की अनदेखी

गोंडा का शहरी क्षेत्र—सदर, नगर पालिका क्षेत्र—फिर भी किसी तरह सम्हल जाता है। असली संकट ग्रामीण फीडरों में दिखता है।

एक-एक मीटर रीडर को 20–25 गाँव तक सौंप दिए गए हैं। कई जगहों पर उसे 10–15 किलोमीटर प्रतिदिन पैदल/दोपहिया चलना पड़ता है। बरसात, गर्मी या ठंड—किसी भी मौसम में लक्ष्य वही रहता है।

ग्रामीण इलाकों में मीटर की स्थिति, बंद मकान, पलायन, फसल-चक्र जैसी व्यावहारिक दिक्कतें होती हैं, जिन्हें काग़ज़ी लक्ष्य में जगह नहीं मिलती। परिणामस्वरूप, बिलिंग में त्रुटियाँ होती हैं—और दोष सीधे मीटर रीडर के खाते में चला जाता है।

स्मार्ट मीटर का तर्क और ज़मीनी विरोधाभास

विभाग अक्सर तर्क देता है कि स्मार्ट/प्री-पेड मीटर आने से मीटर रीडर्स की आवश्यकता घट रही है। यह तर्क काग़ज़ पर सही लग सकता है, पर गोंडा की ज़मीनी सच्चाई अलग है। स्मार्ट मीटर अभी आंशिक क्षेत्रों तक सीमित हैं।

नेटवर्क फेल होने, उपभोक्ता-अपरिचय और तकनीकी खराबी की जिम्मेदारी भी मीटर रीडर/फील्ड स्टाफ पर ही आती है। संक्रमण काल (transition phase) में दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है—पुराने मीटर भी, नए सिस्टम भी।

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यानी, जहाँ एक ओर विभाग भविष्य का हवाला देता है, वहीं वर्तमान में कार्यबल घटाकर मौजूदा कर्मचारियों पर अतिरिक्त बोझ डाल देता है।

संविदा व्यवस्था: स्थायित्व के बिना स्थायी काम

गोंडा में मीटर रीडिंग का बड़ा हिस्सा संविदा/एजेंसी आधारित व्यवस्था पर टिका है। यह व्यवस्था अपने साथ कई अंतर्विरोध लेकर आती है— काम स्थायी, पर नौकरी अस्थायी। लक्ष्य कठोर, पर अधिकार सीमित। जवाबदेही पूर्ण, पर सुरक्षा शून्य।

संविदा मीटर रीडर न तो पूर्ण विभागीय कर्मचारी हैं, न ही स्वतंत्र। वे बीच में लटके हैं—जहाँ शिकायत करने का मंच नहीं, और चुप रहने की मजबूरी अधिक।

दबाव, त्रुटियाँ और फिर वही दंड

अत्यधिक कार्यभार का स्वाभाविक परिणाम है—मानवीय त्रुटि। लेकिन विभागीय संस्कृति में त्रुटि को कारण समझने के बजाय दोष मान लिया जाता है। बिल गलत हुआ—मीटर रीडर दोषी। उपभोक्ता अनुपस्थित मिला—रीडर की लापरवाही। समय सीमा पूरी नहीं हुई—स्पष्टीकरण दो।

यह पूरा तंत्र कारण से अधिक परिणाम पर केंद्रित है। न तो क्षेत्रीय कठिनाइयों का मूल्यांकन होता है, न ही कार्यभार का पुनर्वितरण।

प्रशासनिक चुप्पी और नीति-स्तर की उदासीनता

सबसे चिंताजनक पहलू है—प्रशासनिक चुप्पी। न तो नए पदों की स्वीकृति, न ही मौजूदा कार्यबल के पुनर्गठन की कोई ठोस योजना सार्वजनिक होती है। शिकायतें नीचे से ऊपर जाती हैं, पर जवाब ऊपर से नीचे नहीं आता।

यह स्थिति उस व्यवस्था को जन्म देती है, जहाँ— समस्या सबको दिखती है, समाधान कोई घोषित नहीं करता और बोझ वही उठाता है, जो सबसे नीचे खड़ा है।

सुधार की दृष्टि से सवाल

यह रिपोर्ट किसी व्यक्ति या पदाधिकारी को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास नहीं है। सवाल संरचना से है, नीति से है, और संवेदनशीलता की कमी से है।

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यदि— उपभोक्ता बढ़ते हैं, तो कार्यबल क्यों नहीं? कार्यक्षेत्र जटिल है, तो लक्ष्य यथार्थवादी क्यों नहीं? डिजिटल परिवर्तन चल रहा है, तो संक्रमण काल की योजना क्यों नहीं?

ये सवाल विरोध नहीं, प्रशासनिक विवेक की माँग हैं।

व्यवस्था बचाने के लिए श्रम को समझना होगा

गोंडा की बिजली व्यवस्था आज आवश्यकता से आधे मीटर रीडर्स पर खड़ी है। यह स्थिति न तो टिकाऊ है, न ही न्यायसंगत।

मीटर रीडर केवल “डाटा इकट्ठा करने वाला” नहीं, बल्कि विभाग और उपभोक्ता के बीच का सेतु है। उस सेतु पर अगर लगातार बोझ बढ़ाया गया, तो दरारें पड़ना स्वाभाविक है।

समय की माँग है कि— यथार्थ आंकड़ों पर आधारित कार्यबल नियोजन हो, क्षेत्रवार बोझ का पुनर्मूल्यांकन किया जाए और मीटर रीडर्स को केवल लक्ष्य-इकाई नहीं, मानव श्रमिक समझा जाए।

क्योंकि अंततः, बिजली की रोशनी तारों से नहीं—इंसानी श्रम से घरों तक पहुँचती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मीटर रीडर्स पर काम का बोझ क्यों बढ़ता जा रहा है?

क्योंकि उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ी है लेकिन उसके अनुपात में मीटर रीडर्स की भर्ती या तैनाती नहीं की गई।

स्मार्ट मीटर आने के बाद भी मीटर रीडर्स की जरूरत क्यों है?

क्योंकि संक्रमण काल में पुराने और नए दोनों सिस्टम साथ-साथ चलते हैं और तकनीकी समस्याओं का समाधान भी फील्ड स्टाफ को करना पड़ता है।

संविदा मीटर रीडर्स की सबसे बड़ी समस्या क्या है?

नौकरी की असुरक्षा, अत्यधिक लक्ष्य और शिकायत का प्रभावी मंच न होना।

संपादकीय सूचना : यह समाचार संवाददाता से प्राप्त तथ्यों और सूचनाओं के आधार पर हमारे संपादकीय टीम द्वारा सत्यापन एवं संपादन के उपरांत तैयार किया गया है।

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