गाय को राष्ट्र माता का दर्जा क्यों नहीं? उठा सामाजिक-संवैधानिक विमर्श

हरियाणा के झज्जर जिले के छारा गांव में बाबा जत्तीवाले मंदिर परिसर में गौ माता को राज्य माता घोषित करने की मांग को लेकर आयोजित बैठक में उपस्थित लोग

जोगिंदर सिंह की रिपोर्ट
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गाय को राष्ट्र माता का दर्जा क्यों नहीं?—यह प्रश्न अब केवल आस्था या भावनात्मक आग्रह तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक चेतना, संवैधानिक दृष्टि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े एक व्यापक विमर्श का रूप ले चुका है। हरियाणा के झज्जर जिले के छारा गांव में स्थित ऐतिहासिक बाबा जत्तीवाले मंदिर परिसर में हरियाणा धर्म सभा फंडेशन की एक विशेष बैठक आयोजित की गई, जिसमें गौ माता को “राज्य माता हरियाणा” घोषित किए जाने की मांग को औपचारिक रूप से सामने रखा गया।

छारा गांव से उठी बहस : भावनात्मक नहीं, वैचारिक

बैठक में वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह मांग किसी एक वर्ग या संगठन की भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, पशुपालन आधारित जीवन पद्धति और पर्यावरण संतुलन से जुड़ा विषय है। अमित प्रजापत ने अपने कथन में कहा कि गाय को केवल धार्मिक प्रतीक के रूप में देखने से इस विमर्श की गंभीरता कम हो जाती है। उनके अनुसार, “गाय भारतीय कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मूल आधार रही है। यदि राज्य स्तर पर उसे माता का दर्जा मिलता है, तो यह केवल सम्मान नहीं बल्कि नीति-निर्माण के स्तर पर एक स्पष्ट संदेश होगा।”


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गौ माता : संस्कृति, आजीविका और पर्यावरण का साझा सूत्र

गोष्ठी में यह भी रेखांकित किया गया कि गाय भारतीय समाज में केवल आस्था का विषय नहीं है, बल्कि सदियों से आजीविका, पोषण और जैविक खेती का आधार रही है। इस संदर्भ में हरविंद्र छारा ने कहा कि गौ संरक्षण को प्रतीकात्मक निर्णयों तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “राज्य माता का दर्जा तभी सार्थक होगा जब इसके साथ गौशालाओं की व्यवस्था, आवारा पशुओं की समस्या और किसानों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को लेकर ठोस नीति भी लागू हो।”

संवैधानिक दृष्टि और राज्य की भूमिका

बैठक में संविधान के अनुच्छेद 48 का भी उल्लेख किया गया, जिसमें राज्य को पशुधन संरक्षण और संवर्धन के लिए निर्देशित किया गया है। बैठक का संचालन कर रहे जोगिंदर सिंह ने कहा कि यह विषय किसी एक संगठन की भावना नहीं, बल्कि समाज के बड़े हिस्से की सोच को दर्शाता है। उनके अनुसार, “जब देश अपने राष्ट्रीय प्रतीकों के माध्यम से अपनी पहचान गढ़ता है, तब गाय जैसे सांस्कृतिक और आर्थिक आधार वाले पशु पर गंभीर संवैधानिक चर्चा होना स्वाभाविक है।”

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अध्यक्षीय वक्तव्य : प्रतीक से आगे व्यवस्था जरूरी

बैठक की अध्यक्षता कर रहे मनदीप ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि गौ माता को राज्य माता घोषित करने की मांग तभी प्रभावी होगी, जब इसके साथ व्यावहारिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी भी तय की जाए। उन्होंने कहा, “केवल दर्जा देने से समस्याएं हल नहीं होंगी। राज्य को यह भी तय करना होगा कि गौ संरक्षण के लिए बजट, निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था क्या होगी, ताकि यह निर्णय जमीन पर भी असर दिखा सके।”

गोष्ठी में सामाजिक सहभागिता

इस बैठक में सतबीर (जैन), प्रदीप भगत, लखभा दलाल, सुमित, जोगेन्द्र दलाल, जितेन्द्र हिन्दू, संदीप हिन्दू, राहुल हिन्दू, मंगल मिश्रा, राहुल (फरीदाबाद), दिलजीत, योगेंद्र, निशु (दूबलधन), मनदीप (हिसार), जितेंद्र (रोहतक), रणधीर लोटा छारा, जगदीश छारा, कालू छारा, जयवीर मांडोठी, जॉनी समाजसेवी सहित बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता और ग्रामीण बुद्धिजीवी उपस्थित रहे।

स्थानीय मांग से राष्ट्रीय विमर्श की ओर

छारा गांव में आयोजित यह बैठक इस बात का संकेत मानी जा रही है कि गौ माता के दर्जे को लेकर बहस अब स्थानीय स्तर से निकलकर राज्य और राष्ट्रीय विमर्श की ओर बढ़ रही है। आयोजकों का कहना है कि आने वाले समय में इस विषय को संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीकों से सरकार तक पहुंचाया जाएगा, ताकि यह मांग नीति-निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा बन सके।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

गाय को राज्य माता घोषित करने की मांग क्यों उठ रही है?

क्योंकि गाय भारतीय संस्कृति, कृषि व्यवस्था और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ी हुई है।

क्या यह मांग संविधान के विरुद्ध है?

नहीं, संविधान का अनुच्छेद 48 पशुधन संरक्षण को राज्य का दायित्व मानता है।

छारा गांव की बैठक का मुख्य उद्देश्य क्या था?

भावनात्मक नारे नहीं, बल्कि नीति और व्यवस्था आधारित विमर्श को आगे बढ़ाना।

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