पाठा की आवाज़ — जब पहाड़ बोलते हैं, तो भारत की आदि आत्मा सुनाई देती है

चित्रकूट के पाठा क्षेत्र में पहाड़ियों के बीच बसे आदिवासी समुदाय का पारंपरिक जीवन

बुंदेलखंड के चित्रकूट जिले के पहाड़ी पाठा क्षेत्र में बसे आदिवासी समुदाय की आदि संस्कृति, परंपरागत जीवन, संघर्ष और आधुनिक बदलावों पर आधारित दस्तावेज़ी फीचर।

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✍️संजय सिंह राणा की विशेष रिपोर्ट

बुंदेलखंड का पाठा — जहाँ पहाड़ों में बसती है भारत की आदि संस्कृति

बुंदेलखंड के हृदय में स्थित चित्रकूट का पहाड़ी अंचल केवल भौगोलिक संरचना नहीं है, बल्कि वह स्मृति है उस भारत की, जो आज भी समय की दौड़ से थोड़ा पीछे चलना पसंद करता है। यहाँ की पहाड़ियाँ, जंगल और पथरीली ज़मीन एक ऐसे संसार की रचना करती हैं जहाँ आधुनिकता देर से पहुँचती है और परंपरा अब भी जीवन का आधार बनी हुई है।

पाठा कोई प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक भूगोल है। यहाँ का आदिवासी समाज भारतीय संस्कृति से अलग नहीं, बल्कि उसी की आदि जड़ है।

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पाठा का भूगोल और जीवन की कठिन शर्तें

चित्रकूट का पाठा क्षेत्र ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरा है। खेती पूरी तरह वर्षा पर निर्भर है और सड़कें कई बार गाँव से पहले ही समाप्त हो जाती हैं।

आदि संस्कृति और भारतीय सभ्यता का मूल

यहाँ देवता मंदिरों में नहीं, बल्कि वृक्षों, शिलाओं और जलस्रोतों में बसते हैं। पूजा दिखावा नहीं, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता है।

दैनंदिन जीवन और सामूहिक श्रम

यहाँ श्रम व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक है। एक परिवार का काम पूरे गाँव का काम बन जाता है।

आधुनिकता की दस्तक और बदलता पाठा

पिछले वर्षों में सड़क, मोबाइल नेटवर्क और सरकारी योजनाओं की पहुँच पाठा तक हुई है। सुविधाएँ बढ़ीं, लेकिन इसके साथ नई दुविधाएँ भी आईं।

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संघर्ष, अस्तित्व और पहचान

आज पाठा का आदिवासी समाज दोहरी लड़ाई लड़ रहा है — एक गरीबी और अभाव से, दूसरी अपनी सांस्कृतिक पहचान बचाने की।

लोकगीत, कथाएँ और स्मृतियाँ आज भी इस समाज को बाँधे हुए हैं।

निष्कर्ष

पाठा हमें याद दिलाता है कि भारत केवल शहरों और इमारतों का देश नहीं। भारत उन पहाड़ियों में भी बसता है जहाँ आज भी श्रम, जंगल और स्मृति जीवन को चलाते हैं।

पाठा से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल

पाठा क्षेत्र को अलग पहचान क्यों दी जाती है?

पाठा केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक इकाई है जहाँ आदिवासी समाज सदियों से प्रकृति, जंगल और सामूहिक श्रम के साथ जीवन जीता आया है। इसकी सामाजिक संरचना और जीवन-दर्शन इसे विशिष्ट बनाते हैं।

क्या पाठा के आदिवासी समाज भारतीय संस्कृति से अलग हैं?

नहीं। पाठा का आदिवासी समाज भारतीय संस्कृति से अलग नहीं, बल्कि उसी की आदि जड़ है। प्रकृति पूजा, सामूहिकता और श्रम की गरिमा जैसे मूल्य भारतीय सभ्यता के मूल तत्व हैं।

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आधुनिक विकास ने पाठा के जीवन को कैसे प्रभावित किया है?

सड़क, मोबाइल नेटवर्क और योजनाओं से कुछ सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन इसके साथ पलायन, सांस्कृतिक क्षरण और पारंपरिक आजीविका पर दबाव भी बढ़ा है।

पाठा क्षेत्र में स्त्रियों की क्या भूमिका है?

पाठा की स्त्रियाँ केवल घरेलू भूमिका में सीमित नहीं हैं। वे आजीविका, संसाधन-संग्रह, बीज संरक्षण और सामाजिक निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

पाठा की संस्कृति को सुरक्षित रखने के लिए क्या आवश्यक है?

विकास की योजनाएँ बनाते समय स्थानीय समाज की भागीदारी, संस्कृति के प्रति सम्मान और प्रकृति-संतुलन को प्राथमिकता देना आवश्यक है।

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