यह रिपोर्ट तहसीलवार आँकड़ों, एक विशिष्ट पंचायत में दर्ज शिकायत, आरोपित राशि, और प्रशासनिक कार्रवाई—इन चार स्तंभों पर आधारित है।
योजना का ढाँचा और जिले की सामाजिक पृष्ठभूमि
पीएम आवास योजना (ग्रामीण) के अंतर्गत पात्र परिवारों को चरणबद्ध किस्तों में वित्तीय सहायता, शौचालय, बिजली, गैस और मनरेगा मज़दूरी से जोड़कर समेकित आवास का लक्ष्य रखा गया है। बलरामपुर में यह लक्ष्य इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि यहाँ अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति/जनजाति और सीमांत कृषक परिवारों का अनुपात अधिक है।
बलरामपुर: तहसीलवार स्थिति (रिकॉर्ड-आधारित संक्षेप)
तुलसीपुर तहसील
स्वीकृत आवास: ~8,400, पूर्ण: ~6,100, अपूर्ण/निर्माणाधीन: ~2,300
मुख्य समस्या: किस्तों के समय पर भुगतान में विलंब, सामग्री लागत बढ़ने से निर्माण धीमा।
उतरौला तहसील
स्वीकृत आवास: ~7,900, पूर्ण: ~5,700, अपूर्ण: ~2,200
मुख्य समस्या: लाभार्थी चयन में आपत्तियाँ, स्थल-निरीक्षण में ढिलाई।
बलरामपुर सदर तहसील
स्वीकृत आवास: ~6,300, पूर्ण: ~4,800, अपूर्ण: ~1,500
मुख्य समस्या: बैंक/डीबीटी तकनीकी अड़चनें, आधार-सीडिंग में विलंब।
तीनों तहसीलों में अपूर्ण आवासों का अनुपात 25–30% के बीच बना हुआ है, जो समयबद्धता और निगरानी पर सवाल खड़े करता है।
वह पंचायत जहाँ अनियमितता की शिकायत दर्ज हुई
ग्राम पंचायत—रेहरा बाज़ार (उतरौला तहसील)
चयनित लाभार्थियों में से कुछ नाम ऐसे परिवारों के, जिनके पास पहले से पक्का/अर्ध-पक्का आवास होने की शिकायत। किस्तों की आंशिक/पूर्ण निकासी लाभार्थी के निर्माण स्तर से मेल नहीं खाती—यानी काग़ज़ पर प्रगति, ज़मीन पर अधूरा घर। निर्माण सामग्री की आपूर्ति में स्थानीय स्तर पर मिलीभगत के आरोप।
कितनी राशि का आरोप?
प्राथमिक शिकायत/स्थानीय सत्यापन के आधार पर लगभग ₹32–35 लाख की अनियमित भुगतान/दुरुपयोग की आशंका। (यह राशि कई आवासों की संयुक्त किस्तों से जुड़ी बताई गई, न कि एकल लाभार्थी से।)
प्रशासन ने क्या कार्रवाई की?
ब्लॉक स्तरीय सत्यापन, आवासों की फोटो-जियो टैगिंग, निर्माण चरण का मिलान। जिन घरों में प्रगति असंगत मिली, उनकी अगली किस्त अस्थायी रूप से रोकी गई।
अतिरिक्त जिला अधिकारी (विकास) की निगरानी में नमूना-आधारित निरीक्षण। पंचायत सचिव/रोज़गार सेवक से स्पष्टीकरण तलब।
दो कार्मिकों पर विभागीय कार्यवाही की संस्तुति। संदिग्ध भुगतान की रिकवरी प्रक्रिया प्रारम्भ। लाभार्थी सूची का पुनः सत्यापन और गलत चयन की संशोधन प्रविष्टियाँ।
उदाहरण: एक लाभार्थी के नाम ₹1.20 लाख की कुल सहायता दर्शाई गई, जबकि स्थल पर केवल प्लिंथ तक का कार्य मिला। जांच के बाद अगली किस्त रोकी गई और निर्माण पूरा होने पर ही भुगतान का निर्देश दिया गया।
ज़मीनी चुनौतियाँ: क्यों फिसलती है योजना?
तकनीकी बाधाएँ—डीबीटी/आधार/बैंक लिंकिंग में देरी। स्थानीय दबाव के कारण चयन सूची पर सामाजिक-राजनीतिक हस्तक्षेप। निगरानी की कमी से समय पर भौतिक सत्यापन न होना। सामग्री महँगी होने के बावजूद किस्तों का स्थिर रहना।
क्या बदला जा सकता है? (सुधार के ठोस सुझाव)
100% जियो-टैग्ड, चरणवार भुगतान—बिना अपवाद। स्वतंत्र सामाजिक ऑडिट: ग्राम सभा में सार्वजनिक पठन। टाइम-बाउंड जांच: 30 दिनों में निष्कर्ष/रिकवरी। लाभार्थी सहायता डेस्क: बैंक/तकनीकी अड़चनों का त्वरित समाधान।
बलरामपुर में पीएम आवास योजना ने हज़ारों परिवारों को पक्की छत दी है—यह सच है। लेकिन रेहरा बाज़ार जैसे मामलों ने यह भी दिखाया कि निगरानी ढीली पड़े तो काग़ज़ी घर बनते देर नहीं लगती। प्रशासनिक कार्रवाई शुरू होना सकारात्मक संकेत है, पर निरंतर पारदर्शिता और जवाबदेही ही इस योजना को उसके वास्तविक उद्देश्य तक पहुँचा सकती है—गरीब के सिर पर सुरक्षित छत।
(टिप्पणी: इस रिपोर्ट में उल्लिखित आँकड़े/कार्रवाइयाँ लेख लिखे जाने तक उपलब्ध रिकॉर्ड, शिकायतों और सत्यापन-आधारित सूचनाओं पर आधारित हैं; अंतिम निष्कर्ष संबंधित जांच रिपोर्ट/आदेश के अनुसार परिवर्तनीय हो सकते हैं।)
महत्वपूर्ण सवाल–जवाब
पीएम आवास योजना (ग्रामीण) का उद्देश्य क्या है?
ग्रामीण गरीब परिवारों को सुरक्षित, सम्मानजनक और पक्का आवास उपलब्ध कराना।
बलरामपुर में सबसे अधिक समस्या किस तहसील में दिखी?
उतरौला और तुलसीपुर तहसीलों में अपूर्ण आवासों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक पाई गई।
रेहरा बाज़ार पंचायत में क्या अनियमितता सामने आई?
किस्तों की निकासी और निर्माण प्रगति में असंगति, तथा गलत लाभार्थी चयन की शिकायतें।
क्या प्रशासन ने कार्रवाई की?
हाँ, किस्त रोकी गई, जांच हुई और रिकवरी प्रक्रिया प्रारम्भ की गई।
योजना को बेहतर कैसे बनाया जा सकता है?
सख़्त जियो-टैगिंग, सामाजिक ऑडिट और समयबद्ध निगरानी से।
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