एक नज़र — संख्या और दायरा
केंद्रीय सहकारिता से मिली आधिकारिक जानकारी के अनुसार, उत्तर प्रदेश के लिए लक्ष्य (allocated target) 36,85,704 आवास निर्धारित किए गए थे। इन लक्ष्यों में से 36,18,753 आवास निर्माण पूर्ण कर दिए गए—डेटा आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति (17 मार्च 2025 तक) में जारी किया गया है। अर्थात् राज्य ने अपने आवंटित लक्ष्य के करीब 98% के आस-पास पूर्णता दर्ज कर ली है। यह आंकड़ा योजना के दायरे और कार्य-गतिशीलता का सबसे महत्वपूर्ण संकेतक है। संख्यात्मक रूप में देखें तो — यूपी ने 36.18 लाख परिवारों को पक्का आशियाना मुहैया कराया है; यह संख्या न केवल केंद्रीय लक्ष्य के पैमाने की पुष्टि करती है बल्कि राज्य स्तर पर क्रियान्वयन की तीव्रता को भी रेखांकित करती है।
योजना की रूपरेखा — क्या, कैसे और कितने मदद
PMAY-G का मूल उद्देश्य है ग्रामीण गरीब परिवारों को बेसिक-सुविधाओं (छत, दरवाजा-खिड़की, बरसाती संरक्षण) वाला पक्का घर उपलब्ध कराना। केंद्र और राज्य के वित्तीय हिस्सेदारी के आधार पर, लाभार्थियों को चरणबद्ध निधि (instalments) दी जाती है और प्रत्येक घर के निर्माण की प्रगति का जियो-टैग्ड फोटो-रिकॉर्ड आयीटी सिस्टम में अपलोड किया जाता है। योजना का प्रबंधन AwaasSoft और PFMS के जरिए भुगतान पारदर्शी तरीके से होता है और निगरानी के लिए परफॉर्मेंस-इंडेक्स डैशबोर्ड बनाया गया है। नियमनुसार लाभार्थी परिवारों की प्राथमिकता स्थायी सूची (SECC-2011 या Awaas+ आदि) के आधार पर तय होती है और ग्राम सभा की पुष्टि आवश्यक है। योजना में महिलाओं के नाम पर घर देने, विकलांगों के लिए आरक्षण और अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए लक्ष्य-आरक्षण जैसी व्यवस्थाएँ भी शामिल हैं।
उत्तर प्रदेश में सफलता — क्यों और कैसे?
उत्तर प्रदेश का बड़ा-पैमाना और प्रशासनिक मशीनरी की तैनाती—दोनों ही कारण रहे कि राज्य ने कम-से-कम लक्ष्य के निकट-पूर्ति दर्ज की। जिलों में क्रस-वेरिफिकेशन, Awaas Mitra जैसी स्थानीय उत्तरदायी इकाइयों का उपयोग, और ग्राम स्तर पर निर्माण-निगरानी ने निर्माण की गति बढ़ाने में योगदान दिया। साथ ही मोबाइल-आधारित फोटो-अप्रूवल और जेओ-टैगिंग ने फर्जीवाड़े के जोखिम को घटाने में मदद की। यह समेकित निगरानी मॉडल उसी रिपोर्ट में केंद्रीय मंत्रालय द्वारा भी उद्धृत किया गया है।
जमीन पर सच — कहानियाँ, शिकायतें और विसंगतियाँ
जहाँ औपचारिक आंकड़े उत्साहजनक हैं, वहीं फील्ड रिपोर्टिंग में कुछ दोहरावती धारणाएँ सामने आती हैं: कई ब्लॉकों में केंद्र/राज्य फंडों के प्रवाह और राज्य-कोषागार से रिलीज के विलंब का जिक्र मिलता है — जिसका प्रभाव निर्माण की गति और ठेकेदारों-मजदूरों पर पड़ता है। केंद्रीय दस्तावेज़ भी कुछ देरी कारणों में फंड रिलीज, निर्माण सामग्री की उपलब्धता और लाभार्थी-माइग्रेशन को दर्शाता है।
गुणवत्ता और मापदंड
कुछ ग्रामीण इलाके ऐसे मिले जहाँ दीवारों के क्रैकिंग, नाले-निकासी की कमी या आवास के मापदंडों में अनियमितता जैसे मामले खुले। हालांकि गहन निरीक्षण और सामाजिक ऑडिट का प्रावधान मौजूद है, पर उसकी राज्यव्यापी एकरूपता पर सवाल उठते हैं।
वास्तविक लाभार्थी-पहचान
SECC-2011 या Awaas+ सूचियों का आधार गतिशील जनसंख्या परिवर्तनों के अनुरूप पूरा नहीं माना जाता; नतीजा—कुछ पात्र लोग छूट जाते हैं और कुछ नामांकन विवाद का विषय बन जाते हैं। ग्राम-स्तर की सत्यापन-प्रक्रिया ने बोटल-नेक्स कम किए हैं पर समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
वित्त और लक्ष्य — केंद्र की समयसीमा व नयी मंज़िलें
केंद्रीय मंत्रालय ने PMAY-G के प्रारम्भिक उद्देश्य (2.95 करोड़ घर — 2016-24) के अलावा FY 2024-25 से 2028-29 के लिए अतिरिक्त 2 करोड़ घरों का लक्ष्य स्वीकृत किया। अर्थात् PMAY-G का विस्तार और लक्ष्य दोनों ही आगे बढ़े हुए हैं। इस संदर्भ में उत्तर प्रदेश को पहले चरण में आवंटित लक्ष्य और उसके अनुपात में पूरा-किया गया प्रगति औपचारिक रूप से सराहनीय है।
जिलेवार मतभेद — जहाँ आगे करने की ज़रूरत है
केंद्र-स्तरीय तालिकाएँ जहाँ औसतन सफलता दिखाती हैं, वहाँ जिलेवार स्तर पर असमानताएँ स्पष्ट दिखती हैं — कुछ जिलों ने लक्षित संख्या से अधिक पूरा किया तो कुछ अब भी पीछे हैं। राज्य स्तर की रिपोर्टिंग में ऐसे जिलों की सूची और कारणों का विश्लेषण देखने योग्य है; अधिक लक्षित निगरानी और स्थानीय प्रशासन का सक्रिय हस्तक्षेप उन पिछड़े जिलों के लिए आवश्यक है। (विस्तृत जिला-स्तरीय आँकड़े AwaasSoft-रिपोर्ट में उपलब्ध हैं)।
सामाजिक प्रभाव — जीवन में क्या बदला?
घर मिलने का मतलब केवल छत नहीं — ग्रामीण परिवारों के लिए यह पोषण, पढ़ाई, स्वास्थ्य और सामाजिक-सम्मान से जुड़ा मुद्दा रहा है। जिन परिवारों को पक्का घर मिला है, वहाँ बच्चों की पढ़ाई में सुधार, घरेलू सुरक्षा-भावना में वृद्धि और मौसम-संबंधी जोखिमों से रक्षा जैसे प्रभाव रिपोर्ट किए गए हैं। यह योजना ग्रामीण जीवन की आधारभूत जरूरतों के साथ-साथ सामाजिक समावेशन का साधन भी बनी है।
पड़ताल में कुछ सिफारिशें और आलोचनाएँ सामने आई हैं
गुणवत्ता पर कठोर ऑडिट — सिर्फ जियो-टैग नहीं, फील्ड टीमों का अनियोजित निरीक्षण और तीसरा-पक्ष क्वालिटी ऑडिट अनिवार्य होना चाहिए। लाभार्थी के नाम पर अधिकार — घर का अधिकार महिला-नाम पर देने की नीति अधिक प्रभावी ढंग से लागू कर लाभार्थी-सुधार सुनिश्चित कर सकती है। स्थानीय निर्माण सामग्री और रोजगार — स्थानीय सामग्रियों के प्रयोग और ग्रामीण श्रमिकों की नियुक्ति पर जोर देकर लागत-नियंत्रण व रोज़गार दोनों बढ़ाए जा सकते हैं। AwaasSoft-डैशबोर्ड को और गतिशील ज़िला-वार रिपोर्टिंग के साथ नागरिकों के लिए सुलभ बनाना होगा ताकि सामाजिक-निरीक्षण सशक्त हो सके।
उत्तर प्रदेश की PMAY-G उपलब्धि
प्रदेश में 36,18,753 पूरा किए गए आवास (17 मार्च 2025 तक) — सराहनीय है और यह ग्रामीण घरों के मानचित्र को बदलने वाला आँकड़ा है। पर जहाँ तक “हाउसिंग-फॉर-ऑल” का दीर्घकालिक मकसद है, वहाँ केवल पक्के घरों का निर्माण पर्याप्त नहीं; गुणवत्ता, जीविकोपार्जन से जुड़ी बुनियादी सहूलियतें (पेयजल-शौचालय-बिजली), और सामाजिक सुरक्षा नेटवर्क के साथ घरों को जोड़ना आवश्यक होगा।
केंद्र-राज्य की सबसे बड़ी सामाजिक-आवासन पहलों में से एक
केंद्र-राज्य की सबसे बड़ी सामाजिक-आवासन पहलों में से एक, प्रधानमंत्री आवास योजना — ग्रामीण (PMAY-G) ने उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर पक्के घर दिए हैं। पर जहाँ संख्या में उपलब्धि दर्ज हुई है, वहीं जिले-वार धरातलीय सत्यापन, गुणवत्ता और लाभार्थी-चयन को लेकर उठी शिकायतें और कुछ इलाक़ों में मिली अनियमितताओं ने सवाल भी खड़े किए हैं।
जिले-वार आँकड़ों का स्रोत और उपलब्धता — क्या देखना होगा
राज्य-स्तरीय और जिले-वार विबरण PMAY-G के आधिकारिक वेब-इंटरफेस AwaasSoft / pmayg.nic.in (RHReporting) पर सूचीबद्ध रहते हैं। यहाँ से आप किसी भी जिले के “Sanctioned / Grounded / Completed / FTO (payment)” जैसे कॉलम-आधारित आँकड़े प्राप्त कर सकते हैं। रिपोर्ट-पोर्टल से जिला-वार तालिका निकाली जा सकती है और इस डेटा का प्रयोग करके जिले-वार विश्लेषण तैयार करना संभव है। (AwaasSoft पोर्टल निर्देश और रिपोर्ट सेक्शन में ये रिपोर्ट उपलब्ध हैं)।
संक्षेप में
जिले-वार कच्चे आँकड़े उपलब्ध हैं, पर उन्हें निकालकर सत्यापित तालिका बनाना तकनीकी-श्रोतों के जरिए करना होगा — AwaasSoft-रिपोर्ट वह आधिकारिक स्रोत है।
CAG ऑडिट-संदर्भ में क्या मिला?
भारतीय CAG की समीक्षा (राज्य आयानुसार) में नमूना-जांच किये गए जिलों में कई अपात्र लाभार्थियों का भुगतान पाया गया; रिपोर्ट ने 1,838 अपात्र लाभार्थियों के भुगतान (9.52 करोड़ रुपये) और बड़े पैमाने पर गुणवत्ता/सुविधा-खामियाँ (जैसे प्लास्टर नहीं, रसोई/बाथरूम/पेयजल की कमी) जैसे निष्कर्ष निकाले। CAG-रिपोर्ट / उसके मीडिया सारांश ने यह भी दिखाया कि बहुत सी आपत्तियाँ लंबित रहीं और कुछ रिकवरी/कलेक्शन अभी अधूरे हैं।
CAG रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद की कार्रवाई
CAG रिपोर्ट सार्वजनिक होते ही राज्य प्रशासन ने कई मामलों में आंतरिक जांच और सुधारात्मक निर्देश जारी करने की प्रक्रिया शुरू की। कुछ जिलों में रिकवरी-नोटिस जारी किए गए, वहीं स्थायी प्रतीक्षा-सूचियों के पुनर्लेखन और अपात्र लाभार्थियों को हटाने के निर्देश भी दिए गए। परन्तु CAG ने यह भी स्पष्ट किया कि सितंबर–अक्टूबर 2024 तक कई मामलों में वसूल योग्य राशि की पूरी रिकवरी नहीं हो सकी थी, जो यह दर्शाता है कि प्रक्रियात्मक सुधार अब भी अधूरे हैं।
अन्य जिलों में मिली शिकायतें — पैटर्न और रुझान
राज्य के कई जिलों में डुप्लीकेट प्रविष्टियाँ, एक ही परिवार के नाम पर अनेक दावे और पहले से पक्का मकान होने के बावजूद लाभ लेने की शिकायतें सामने आईं। सोशल-ऑडिट और आधिकारिक डेटा-हार्डलिंक्स के माध्यम से ऐसे मामलों की पहचान हुई। इसके अलावा, भुगतान-विलंब और ठेकेदार–मज़दूर विवाद भी प्रमुख शिकायतों में रहे, जिनके पीछे फंड-रिलीज में देरी, प्रशासकीय चूक और बैंकिंग समस्याएँ दर्ज की गईं।
क्या सवाल अभी बाकी हैं?
आधिकारिक AwaasSoft डेटा उपलब्ध होने के बावजूद उसकी नागरिक-सुलभता, ग्राम-स्तर पर सहज एक्सेस और साधारण नागरिक के लिए समझने योग्य प्रस्तुति अब भी चुनौती बनी हुई है। बड़े पैमाने पर घरों का निर्माण अपने आप में उपलब्धि है, लेकिन जिन घरों में बुनियादी प्लास्टर, रसोई या जलनिकासी जैसी सुविधाओं की कमी पाई गई, वे दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ नहीं माने जा सकते। इसी कारण तीसरे-पक्ष गुणवत्ता ऑडिट की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है।
उत्तर प्रदेश के 6 “हाई-रिस्क जिलों” पर दस्तावेजी रिपोर्ट
राज्य-स्तरीय उपलब्धियों के बीच कुछ जिले ऐसे रहे जहाँ संख्या और गुणवत्ता के बीच की खाई, भुगतान–निर्माण असंतुलन और लाभार्थी-चयन की गड़बड़ियाँ बार-बार सामने आईं। इन्हीं मानकों के आधार पर छह हाई-रिस्क जिले चिन्हित किए गए।
प्रयागराज (शंकरगढ़ ब्लॉक)
शंकरगढ़ ब्लॉक में 3,000 से अधिक संदिग्ध लाभार्थियों का पैटर्न सामने आया, जहाँ पहली किस्त जारी होने के बावजूद भौतिक निर्माण का कोई प्रमाण नहीं मिला। जियो-टैग्ड तस्वीरों में तारीख और लोकेशन का असंगत मिलान पाया गया, और कुछ मामलों में दूसरे घरों की तस्वीरें अपलोड होने की बात सामने आई। PFMS के माध्यम से भुगतान लाभार्थी खातों में पहुँचा, लेकिन तुरंत निकासी या तीसरे पक्ष को ट्रांसफर के कारण निर्माण-तारीख से मेल नहीं बैठा।
सोनभद्र
सोनभद्र जिले में डुप्लीकेट और घोस्ट एंट्री के आरोप लगे। एक ही परिवार या पते से कई दावों के संकेत मिले, जिसके बाद पुनः सत्यापन और सूची संशोधन के आदेश दिए गए।
मिर्जापुर
मिर्जापुर में अधूरे मकान, प्लास्टर, निकासी और रसोई जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी उजागर हुई। भुगतान तो हुआ, लेकिन तकनीकी सत्यापन कमजोर रहने से निर्माण-गुणवत्ता पर निगरानी ढीली पड़ी। निरीक्षण रिपोर्ट देर से आने के कारण तकनीकी सहायकों की जवाबदेही पर भी सवाल उठे।
चित्रकूट
चित्रकूट जिले में लाभार्थी पात्रता को लेकर विवाद सामने आए। सीमावर्ती और दुर्गम गाँवों में सत्यापन कठिन होने के कारण कई मामलों में पुनः जांच की जरूरत पड़ी।
बहराइच
बहराइच में आंशिक निर्माण और गुणवत्ता से जुड़ी शिकायतें सामने आईं। मानसून और लॉजिस्टिक समस्याओं के कारण कई परियोजनाएँ समय पर पूरी नहीं हो सकीं।
साझा निष्कर्ष
इन सभी जिलों में एक साझा पैटर्न उभरकर सामने आया—पहली किस्त जारी होने के बाद निर्माण में देरी या ठहराव, बैंक ट्रांज़ैक्शन और निर्माण-प्रगति के बीच असंतुलन, तथा पंचायत रिकॉर्ड और जमीनी हकीकत में अंतर।
दस्तावेजी निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश में PMAY-G के तहत 36,18,753 आवासों का पूर्ण होना एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन हाई-रिस्क जिलों में सामने आई अनियमितताएँ यह संकेत देती हैं कि “हाउसिंग-फॉर-ऑल” के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही पर और अधिक ध्यान देना होगा।
❓ महत्वपूर्ण सवाल–जवाब
क्या पीएम आवास योजना में पैसा गया लेकिन घर नहीं बना?
हाई-रिस्क जिलों में कई मामलों में पहली किस्त जारी होने के बाद भी भौतिक निर्माण नहीं पाया गया।
पैसा किस खाते में गया?
PFMS के माध्यम से पैसा लाभार्थी खातों में गया, लेकिन कुछ मामलों में तुरंत निकासी या तीसरे पक्ष को ट्रांसफर हुआ।
क्या पंचायत रिकॉर्ड में गड़बड़ी मिली?
कुछ ग्राम सभाओं में नाम पढ़े जाने, उपस्थिति और सत्यापन को लेकर विरोधाभास सामने आए।
क्या दोषियों पर आपराधिक कार्रवाई हुई?
रिकवरी और विभागीय जांच हुई, लेकिन आपराधिक मामलों की संख्या सीमित रही।









