(पहली गुस्ताखी – देवरिया से शुरू)
सलेमपुर स्टेशन पर रात उतर चुकी थी। प्लेटफॉर्म पर भीड़ कम थी, लेकिन हवा में एक खास किस्म की स्थिरता थी—जैसे कोई जल्दबाज़ी यहाँ टिकती नहीं। ट्रेन धीरे से रुकी। दरवाज़ा खुला। और गुस्ताख दिल ने पूर्वांचल की धरती पर पहला कदम रखा। सामने खड़े थे—मोहन द्विवेदी। चेहरे पर मुस्कान, चाल में आत्मीयता। “आ गए? अब असली पूर्वांचल देखिए,” उन्होंने बिना औपचारिकता के कहा। साथ में संजय कुमार वर्मा और इरफान अली लारी भी थे। संजय की आँखों में वह गंवई आत्मविश्वास था जो ज़मीन से जुड़कर आता है। इरफान रोज़े में थे—चेहरा शांत, भीतर संयम की चमक।
स्टेशन से बाहर निकलते ही हल्की हवा लगी। सर्वेश द्विवेदी पहले से इंतज़ार में थे। “गुस्ताख दिल का स्वागत है चाँद पलिया में,” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। चाँद पलिया आवास पर प्रवेश औपचारिक नहीं था—घर जैसा था। बैठक में चटाई बिछी थी। रसोई से रोटी की खुशबू आ रही थी। द्विवेदी परिवार के मुखिया—जिन्हें सब पंडित जी कहते हैं—धीरे से बोले: “लिखे से पहिले सुने के पड़ी। इहाँ दुख चिल्लावत नाहीं, भीतर दबा रहेला।” गुस्ताख दिल ने सिर झुकाया। पंडित जी आगे बोले— “सड़क आधी बनेला, आधी छूट जाला। नाली खुदेला, पानी रुकेला। किसान धान बोएला, दाम खोजेला। जवान लइका पढ़ेला, नौकरी ढूंढेला। सब बा… बाकिर संतुलन कम बा।” संजय ने वहीं से बात उठाई— “का काका, आवाज उठावल गइल?” “उठावल गइल… पंचायत में, ब्लॉक में… बाकिर सुनवाई धीरे होला। ई इलाका धीरे-धीरे चलत बा।” इरफान ने गुस्ताख दिल की ओर देखा— “कह रहे हैं कि समस्या का अभाव नहीं है, रफ्तार का अभाव है।”
रात का खाना हुआ। बातचीत लंबी नहीं थी। गुस्ताख दिल ने जानबूझकर कोई तीखी बात नहीं कही। एक बार हिंदी में बोला— “समझ रहे हैं।” दूसरी बार— “देखेंगे।” और फिर सो गया।
सुबह – देवरिया की धूप
सुबह की पहली किरण में हल्की धूल तैर रही थी। संजय वर्मा और इरफान अली लारी तैयार थे। रोज़े में भी इरफान की चाल में थकान नहीं थी। गुस्ताख दिल के साथ मिलने की खुशी जो थी।
पहला ठहराव—देवरिया का एक ग्रामीण इलाका। कच्ची सड़क पर चलते हुए संजय बोले— “बरखा में ई रास्ता गुम हो जाला। मोटरसाइकिल धँस जाला। एम्बुलेंस घूम के जाए।” पास खड़े किसान से पूछा— “का हाल बा?” “धान ठीक बा।” “दाम?” “मंडी में भाव कागज पर तेज बा, जमीन पर ढीला।” “सरकारी खरीद?” “लाइन लागेला… फेर नंबर आवेला।” इरफान ने धीरे से कहा— “कह रहे हैं कि प्रक्रिया है, पर समय अधिक लगता है।” गंभीर बात यही थी— प्रक्रिया है, परिणाम देर से।
गोरखपुर – उम्मीद और पलायन
दोपहर तक टोली गोरखपुर पहुँची। एक कोचिंग सेंटर के बाहर भीड़ थी। संजय ने पूछा— “काहे पढ़त बाड़ऽ?” लड़का बोला— “सरकारी नौकरी।” “अगर ना मिली?” “बाहर जइब। मुंबई, दिल्ली… जइसे सब जात बा।” दूसरा लड़का बोला— “इहाँ रह के का करीं?” इरफान ने शांत स्वर में कहा— “यहाँ शिक्षा संघर्ष भी है और पलायन की तैयारी भी।” गुस्ताख दिल ने नोट किया— पूर्वांचल की सबसे बड़ी निर्यात वस्तु युवा हैं।
कुशीनगर – पर्यटन की परछाईं
कुशीनगर में बुद्ध की शांति है। सड़कें अपेक्षाकृत साफ़। पर पीछे की बस्ती में एक बुज़ुर्ग बोले— “पर्यटन आवेला… रोजगार थोड़ा-बहुत।” “का चाहीं?” “बस ई कि मेहमान के पैसा इहाँ भी रुके।” संजय ने पूछा— “सरकार से कहले?” “कहले… अब देखत बानी।” इरफान ने संक्षेप में कहा— “स्थानीय लोग पर्यटन से सीधा लाभ चाहते हैं।” गंभीर बात— विकास दिखता है, पर वितरण असमान है।
देवरिया वापसी – अस्पताल का सच
वापसी में देवरिया जिला अस्पताल के बाहर रुके। भीड़ थी। एक महिला बच्चे को गोद में लिए बैठी थी। “कब से?” “सुबह से।” “डॉक्टर?” “आइहैं।” कोई शिकायत नहीं। सिर्फ़ इंतज़ार। संजय धीरे से बोले— “इहाँ लोग चिल्लावत कम बा।” इरफान ने जोड़ा— “शिकायत दर्ज होती है, पर आवाज़ संयमित रहती है।” गंभीर बात— संयम कभी-कभी व्यवस्था को साहस दे देता है।
शाम – सलेमपुर स्टेशन
शाम को टोली फिर सलेमपुर स्टेशन पहुँची। रोज़े का वक्त था। इरफान ने पानी की पहली घूँट ली। संजय ने कहा— “आज तीन जिला देख लिहनी… सबमें अलग चेहरा, पर समस्या एक।” “का?” गुस्ताख दिल ने पूछा। “धीरे-धीरे।” गुस्ताख दिल मुस्कुराया। धीरे-धीरे— यह शब्द पूरे दिन साथ रहा। मोहन द्विवेदी का संदेश आया— “जल्दी मत लिखिए। पूर्वांचल एक दिन में नहीं खुलता।” स्टेशन की सीटी बजी। संजय ने गंवई अंदाज़ में कहा— “आज के गुस्ताखी यहीं तक।” इरफान ने शांत स्वर में जोड़ा— “अगला पड़ाव कल तय होगा।” गुस्ताख दिल चुप था।
पर भीतर दर्ज कर रहा था— पूर्वांचल शोर नहीं करता। यह सहता है। प्रतीक्षा करता है। और फिर भी उम्मीद नहीं छोड़ता। आज देवरिया से शुरुआत हुई। गोरखपुर, कुशीनगर से गुज़रते हुए शाम सलेमपुर में रुकी। कल यह दिल कहाँ जाएगा— किस गाँव की पगडंडी पकड़ेगा, किस चौपाल पर बैठेगा, किस रोज़े की थकान के बीच सच सुनेगा— यह कल खुलेगा। आज की गुस्ताखी समाप्त। विराम। पर सफ़र जारी। 💜
(आलेख एवं शब्द संयोजन प्रधान संपादक अनिल अनूप)








