वो हँसा नहीं, चौंका नहीं; बस इतना बोला—‘छारा गाँव कोई साधारण गाँव ना सै, इब्बे भी इहाँ की माटी मर्दानगी अर जमीर की बात करे सै।’
और यहीं से समझ आ गया कि मैं किसी गाँव नहीं, एक इतिहास की ओर जा रहा हूँ।
यह कोई तारीफ़ नहीं थी, न ही कोई किस्सागोई—यह एक चेतावनी-सी थी।
एक ऐसे गाँव की, जिसने सत्ता देखी, जंग लड़ी, संत साधे और समय के साथ समझौते से ज़्यादा टकराव चुना।
छारा को समझना दरअसल उस हरियाणवी माटी को समझना है, जहाँ ताक़त सिर्फ़ बाँहों में नहीं, सोच और साहस में भी गिनी जाती है।
यह फीचर उसी माटी, उसी स्मृति और उसी स्वाभिमान की परतें खोलने की एक कोशिश है।
उत्तर भारत के ग्रामीण भूगोल में छारा
उत्तर भारत के ग्रामीण भूगोल में कुछ गांव ऐसे होते हैं, जो केवल एक बसावट भर नहीं होते, बल्कि अपने भीतर इतिहास, संघर्ष, चेतना और सामूहिक स्मृति का पूरा अध्याय समेटे रहते हैं। झज्जर जिले का छारा गांव भी ऐसा ही एक गांव है, जिसकी पहचान केवल उसकी भौगोलिक उपस्थिति तक सीमित नहीं, बल्कि उसकी ऐतिहासिक भूमिका, सामाजिक चेतना और राजनीतिक सक्रियता से निर्मित हुई है। बहादुरगढ़–बेरी मार्ग पर स्थित यह गांव, आज भी अपने अतीत की परछाइयों और विरासत के साथ वर्तमान में सांस लेता दिखाई देता है।
नाम की कथा: ‘धार’ से ‘छार’ तक का सफर
छारा गांव के नाम के पीछे भी एक दिलचस्प ऐतिहासिक और भाषायी कथा छिपी है। स्थानीय मान्यताओं और ऐतिहासिक संकेतों के अनुसार, संस्कृत में ‘धार’ शब्द का अर्थ जलधारा या प्रवाह होता है। समय के साथ स्थानीय बोली और उच्चारण में ‘धार’ शब्द ‘छार’ में परिवर्तित हो गया और यही नाम आगे चलकर गांव की पहचान बन गया। यह केवल भाषायी परिवर्तन नहीं था, बल्कि उस भूभाग के प्राकृतिक स्वरूप और सांस्कृतिक प्रवाह का भी संकेतक था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक चेतना
छारा गांव का इतिहास केवल खेती और ग्रामीण जीवन तक सीमित नहीं रहा। यह गांव राजनीतिक और सामाजिक चेतना का केंद्र भी रहा है। कहा जाता है कि मुगल काल के दौरान जब लगान वसूली के लिए शासकीय सैनिक इस गांव में पहुंचे, तो ग्रामीणों ने अत्याचार के आगे झुकने के बजाय संगठित प्रतिरोध किया।
ग्रामीणों के इस स्वभाव ने आगे चलकर छारा को स्वाभिमान और संघर्ष का प्रतीक बना दिया। किसी भी प्रकार के आक्रमणकारी या अत्याचारी के विरुद्ध यहां के लोगों ने डटकर मुकाबला किया—यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही।
प्रथम विश्व युद्ध में गांव की भूमिका
छारा गांव की सबसे उल्लेखनीय ऐतिहासिक भूमिका प्रथम विश्व युद्ध के दौरान देखने को मिलती है। यह तथ्य अपने आप में चौंकाने वाला है कि एक ग्रामीण बसावट से 306 सैनिकों ने विश्व युद्ध में भाग लिया, जिनमें से 24 वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी।
आज भी गांव के अखाड़ों, चौपालों और बुजुर्गों की बातचीत में उन वीरों की स्मृति जीवित है। यह केवल आंकड़ों की बात नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रमाण है जिसमें राष्ट्र और कर्तव्य व्यक्तिगत जीवन से ऊपर माने जाते थे।
अखाड़े, पहलवान और शारीरिक संस्कृति
छारा गांव की पहचान उसके अखाड़ों से भी जुड़ी है। यहां से अनेक नामी पहलवान निकले, जिनमें सुधन और सुंडू पहलवान विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अखाड़ा केवल शारीरिक प्रशिक्षण का स्थान नहीं था, बल्कि वह अनुशासन, सामूहिकता और नैतिकता का विद्यालय भी था।
गांव के युवाओं में कुश्ती और शारीरिक अभ्यास केवल खेल नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण का माध्यम रहा है।
स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक योगदान
हिंदी स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी छारा गांव की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही। यहां से अनेक लोग आंदोलन में सक्रिय रूप से जुड़े—चाहे वह प्रत्यक्ष संघर्ष हो या वैचारिक समर्थन।
संत हरदारी लाल और राजनीतिक स्मृति
छारा गांव की राजनीतिक पहचान को मजबूती देने वाली एक प्रमुख हस्ती रहे संत हरदारी लाल, जिनका जन्म इसी गांव में हुआ था। गांव में स्थापित उनकी आदमकद प्रतिमा आज भी अतीत के राजनीतिक संघर्षों और वैचारिक आंदोलनों की ओर ध्यान खींचती है।
वास्तुकला और पुरानी हवेलियाँ
गांव में आज भी लगभग 100 वर्ष पुरानी हवेलियाँ मौजूद हैं, जो तत्कालीन वास्तु और निर्माण कला का सुंदर उदाहरण हैं।
पीलिया नाशक तालाब और धार्मिक आस्था
छारा गांव में एक ऐसा तालाब भी है, जिसे लेकर स्थानीय विश्वास है कि उसमें स्नान करने से पीलिया रोग से मुक्ति मिलती है।
बसावट और सामाजिक संरचना
छारा गांव को झज्जर जिले के बड़े गांवों में गिना जाता है। आसपास के क्षेत्र में यहां मतदाताओं की संख्या भी सर्वाधिक मानी जाती है।
बाबा जत्ती वाले: लोक-आस्था और ऐतिहासिक स्मृति
छारा गांव की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत में बाबा जत्ती वाले की उपस्थिति विशेष स्थान रखती है।
निष्कर्ष
छारा गांव केवल एक ग्रामीण इकाई नहीं, बल्कि इतिहास, संघर्ष, साहस और सांस्कृतिक निरंतरता का जीवंत उदाहरण है।










