कभी-कभी कोई इमारत सिर्फ ईंट, सीमेंट और लोहे का ढांचा नहीं होती। वह सत्ता की सोच, प्रशासन की प्राथमिकताओं और राजनीति की दिशा का प्रतीक बन जाती है। अमरोहा जिले के सैद नगली में खड़ा “अटल टॉवर” भी आज ऐसा ही एक प्रतीक बन चुका है—लेकिन गौरव का नहीं, बल्कि उस विडंबना का, जिसमें एक महान नाम को साधारण राजनीतिक प्रदर्शन की वस्तु बना दिया गया है।
यह सवाल किसी इमारत का नहीं है। सवाल उस सोच का है, जो स्मृति को स्मारक में बदल देती है, और स्मारक को सत्ता का पोस्टर बना देती है।
जिस नाम पर यह टॉवर खड़ा है, वह नाम है अटल बिहारी वाजपेयी—एक ऐसा राजनेता, जिसकी राजनीति में भाषा थी, संवेदना थी और असहमति के प्रति सम्मान था। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस टॉवर की संरचना, उसका स्थान और उसका उपयोग उस विचारधारा को दर्शाता है, जिसे अटल जी ने जीवन भर जिया?
सड़क के ऊपर खड़ा विकास या जनता के ऊपर सत्ता?
बताया जाता है कि यह टॉवर 110 फीट ऊँचा है और सड़क के ठीक ऊपर बनाया गया है। विकास के नाम पर बनी यह संरचना आम नागरिक के रोज़मर्रा के जीवन—आवागमन—के ऊपर खड़ी है। क्या यह महज़ तकनीकी निर्णय है, या फिर उस मानसिकता का प्रतीक, जिसमें सत्ता ऊपर और जनता नीचे रखी जाती है?
नगर पंचायत का कार्यालय पहले तल पर है, यानी लोकतंत्र का सबसे निचला और सबसे नज़दीकी स्तर भी अब ऊपर बैठकर जनता को देखेगा। दूसरे तल पर CCTV कंट्रोल रूम है—नज़र रखने के लिए। प्रशासन और निगरानी, दोनों ऊँचाई पर। यह संयोग नहीं, संकेत है।
नामकरण की राजनीति: श्रद्धांजलि या स्वामित्व?
टॉवर के दो गेट हैं। एक का नाम केशव बलिराम हेडगेवार के नाम पर है, दूसरे का नाम भगवत शरण शर्मा पर। प्रश्न यह नहीं कि ये नाम क्यों हैं, बल्कि प्रश्न यह है कि अटल टॉवर के भीतर ये नाम क्या संकेत देते हैं?
क्या यह अटल बिहारी वाजपेयी की समावेशी राजनीति का विस्तार है, या उनके नाम का उपयोग कर एक विशेष वैचारिक ढांचे को स्थायी रूप देने की कोशिश? अटल जी संघ से आए, लेकिन वे राष्ट्र के नेता बने। उन्होंने संसद को संवाद का मंच माना, विरोध को राष्ट्रविरोध नहीं कहा। फिर उनके नाम पर बनी इस इमारत में वह संतुलन कहाँ है?
“अटल ऊपर से हँस रहे होंगे”—यह हँसी क्या कहती है?
सोशल मीडिया पर तंज कसता एक वाक्य वायरल हुआ—“अटल जी के नाम पर ये टॉवर बना दिया… वो बेचारे भी ऊपर से हँस रहे होंगे।” यह हँसी हल्की नहीं है। यह कटाक्ष है, पीड़ा है और चेतावनी भी।
अटल बिहारी वाजपेयी को अगर कहीं देखा जाना चाहिए, तो वह किसी सड़क के ऊपर बने टॉवर में नहीं, बल्कि किसी पुस्तकालय में, किसी बहस में, किसी कविता में। उनके नाम पर अस्पताल होते, विद्यालय होते, शोध संस्थान होते—तो यह श्रद्धांजलि कहलाती। लेकिन CCTV और गेटों से सुसज्जित यह ढांचा श्रद्धा से ज़्यादा प्रदर्शन लगता है।
स्मारक और स्मृति का फर्क
स्मारक खड़े किए जाते हैं, स्मृति जीवित रखी जाती है। अटल जी की स्मृति उनके भाषणों, उनके राजनीतिक साहस और उनकी भाषा में है। लेकिन जब स्मारक सत्ता की ब्रांडिंग का औज़ार बन जाए, तब स्मृति सिकुड़ने लगती है।
भारत में आज स्मारकों की बाढ़ है—नाम बड़े, लेकिन अर्थ छोटे। इमारतें ऊँची हैं, पर सोच जमीन से कटी हुई।
नगर पंचायत या विचार पंचायत?
नगर पंचायत का दायित्व सड़क, पानी, सफाई और नागरिक सुविधाएँ हैं। लेकिन जब वही पंचायत एक ऐसे टॉवर के निर्माण में ऊर्जा और संसाधन लगाती है, जो प्रतीकात्मक अधिक और उपयोगी कम है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या यह धन स्थानीय समस्याओं पर खर्च नहीं हो सकता था? क्या यह टॉवर किसी नागरिक की रोज़मर्रा की परेशानी हल करता है? या यह सिर्फ सत्ता के पोस्टर और उद्घाटन पट्टिकाओं के लिए बनाया गया ढांचा है?
अटल बनाम अटल टॉवर
अटल बिहारी वाजपेयी ने कभी ऊँचाई को सत्ता से नहीं जोड़ा। उनकी राजनीति में विनम्रता थी, संवाद था। वे विरोधी की बात सुनते थे, असहमत होते थे, लेकिन सम्मान बनाए रखते थे।
आज उनके नाम पर बनी इस इमारत में वह विनम्रता नहीं दिखती। यहाँ ऊँचाई है, लेकिन विस्तार नहीं। यहाँ निगरानी है, लेकिन संवाद नहीं।
निष्कर्ष नहीं, चेतावनी
यह लेख किसी इमारत के खिलाफ नहीं है। यह उस मानसिकता के खिलाफ है, जिसमें इतिहास को सजावट बना दिया गया है। अटल बिहारी वाजपेयी किसी टॉवर के मोहताज नहीं हैं। वे भारतीय राजनीति के आकाश में पहले से ऊँचे हैं।
लेकिन जब उनके नाम पर खड़े ढांचे उनकी सोच से मेल नहीं खाते, तो वे श्रद्धांजलि नहीं—विडंबना बन जाते हैं। शायद यही वजह है कि लोग कह रहे हैं—“अटल जी ऊपर से हँस रहे होंगे।”
हँसी इसलिए नहीं कि टॉवर ऊँचा है, बल्कि इसलिए कि सोच बौनी रह गई है।
