रेफरल की रफ़्तार में टूटती ज़िंदगियाँ: 2025 में चित्रकूट की स्वास्थ्य व्यवस्था का नंगा सच

चित्रकूट जिला अस्पताल से रेफर किया गया गंभीर घायल मरीज, एम्बुलेंस में इलाज के अभाव में जूझता परिवार, 2025 की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की प्रतीकात्मक तस्वीर



संजय सिंह राणा की रिपोर्ट
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लचर स्वास्थ्य व्यवस्था की एक झकझोरती मिसाल से शुरुआत

एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल युवक को जब देर रात चित्रकूट जिला चिकित्सालय लाया गया, तो परिजनों को उम्मीद थी कि यहाँ प्राथमिक उपचार से लेकर विशेषज्ञ देखभाल तक सब कुछ मिलेगा। लेकिन अस्पताल पहुँचते ही उन्हें वही वाक्य सुनने को मिला, जो अब इस ज़िले की स्वास्थ्य व्यवस्था का पर्याय बन चुका है—“यहाँ इलाज संभव नहीं, तुरंत रेफर कीजिए।” कुछ औपचारिक काग़ज़ी कार्रवाई के बाद मरीज को प्रयागराज भेज दिया गया। दूरी लगभग 120 किलोमीटर। रास्ते में समय, संसाधन और एम्बुलेंस की उपलब्धता—तीनों ने साथ नहीं दिया। मरीज रास्ते में ही दम तोड़ गया।

जब एम्बुलेंस ही अंतिम सहारा बन जाए

वर्ष 2025 की शुरुआत में चित्रकूट ज़िले के मानिकपुर क्षेत्र से एक गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा की स्थिति में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लाया गया। केंद्र खुला था, पर न तो स्त्री रोग विशेषज्ञ मौजूद थीं और न ही आवश्यक दवाइयाँ। कुछ औपचारिक जाँच के बाद महिला को जिला चिकित्सालय भेजा गया। जिला अस्पताल में भी विशेषज्ञ अनुपलब्धता के कारण उसे प्रयागराज रेफर कर दिया गया। करीब 120 किलोमीटर की दूरी, सीमित संसाधन और समय की कमी—महिला ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया।

यह घटना किसी एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि चित्रकूट की स्वास्थ्य व्यवस्था का संरचनात्मक सच है।

यह कोई अपवाद नहीं, बल्कि वर्ष 2025 में चित्रकूट की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की वह सच्चाई है, जो हर महीने कई परिवारों को भीतर तक तोड़ रही है।

रेफर केंद्र बनता जिला अस्पताल : सवालों के घेरे में व्यवस्था

चित्रकूट जिला चिकित्सालय को कभी इस क्षेत्र के लिए जीवनरेखा माना जाता था। परंतु 2025 तक आते-आते यह अस्पताल उपचार केंद्र से अधिक रेफर केंद्र बनकर रह गया है। सड़क दुर्घटनाएँ हों, गर्भवती महिलाओं की जटिलताएँ हों, हृदय या न्यूरो से जुड़े मामले—अधिकांश मामलों में मरीजों को प्राथमिक उपचार के बाद बाहर भेज दिया जाता है।

रेफरल की दूसरी मंज़िल अक्सर सतना (करीब 100 किमी से अधिक) या फिर बड़े शहर—लखनऊ और कानपुर—होते हैं। सवाल यह नहीं कि रेफरल क्यों होता है; सवाल यह है कि क्यों लगभग हर गंभीर मामला रेफरल ही बन जाता है।

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चित्रकूट ज़िला अस्पताल: संरचना बनाम वास्तविक क्षमता

सरकारी स्वास्थ्य ढांचे के अनुसार, चित्रकूट जिला चिकित्सालय में निम्नलिखित संरचना अपेक्षित है: 100–150 बिस्तरों की क्षमता, मेडिसिन, सर्जरी, ऑर्थोपेडिक्स, स्त्री रोग, बाल रोग जैसे विशेषज्ञ विभाग, 24×7 इमरजेंसी सेवा, ऑपरेशन थिएटर, पैथोलॉजी लैब, रेडियोलॉजी यूनिट लेकिन ज़मीनी स्थिति इससे भिन्न है।

डॉक्टरों की स्थिति (2025 में व्यवहारिक तस्वीर)

स्वीकृत विशेषज्ञ पद: लगभग 25–30, वास्तविक तैनाती: लगभग 50–60%, कई विभागों में एकल डॉक्टर या आंशिक सेवाएँ, नाइट शिफ्ट में विशेषज्ञ उपलब्धता अनिश्चित। नतीजा यह कि गंभीर मरीजों के लिए अस्पताल इलाज का केंद्र नहीं, ट्रांज़िट प्वाइंट बन गया है।

डॉक्टरों की कमी : आँकड़ों के पीछे छुपी सच्चाई

सरकारी मानकों के अनुसार, किसी भी ज़िले के जिला अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों—मेडिसिन, सर्जरी, ऑर्थोपेडिक्स, एनेस्थीसिया, स्त्री रोग, बाल रोग—की न्यूनतम संख्या निर्धारित होती है। इसके साथ ही नर्सिंग स्टाफ, फार्मासिस्ट, लैब टेक्नीशियन और पैरामेडिकल कर्मियों की भी स्पष्ट संरचना तय है। लेकिन चित्रकूट में पद स्वीकृत हैं, तैनाती अधूरी है। कई विशेषज्ञ पद वर्षों से रिक्त पड़े हैं। जो डॉक्टर तैनात हैं, उन पर अत्यधिक कार्यभार है। नाइट ड्यूटी और आपातकालीन सेवाओं में निरंतरता का अभाव है। नतीजा यह कि डॉक्टरों की कमी सीधे-सीधे मरीजों के जीवन पर भारी पड़ती है। ऑपरेशन थिएटर मौजूद है, पर एनेस्थीसिस्ट नहीं; एक्स-रे मशीन है, पर तकनीशियन नहीं; ट्रॉमा के मामले आते हैं, पर ट्रॉमा विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं।

ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र: काग़ज़ों में सक्रिय, ज़मीन पर निष्क्रिय

चित्रकूट जैसे पठारी और दूरदराज़ ज़िले में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) ग्रामीण जनता के लिए पहली उम्मीद होते हैं। सरकारी रिकॉर्ड में ज़िले में कई CHC और दर्जनों PHC कार्यरत बताए जाते हैं। स्थानीय स्वास्थ्यकर्मियों और अस्पताल रजिस्टर के आधार पर यह तथ्य सामने आता है कि— हर महीने औसतन 30–40% गंभीर मरीज रेफर किए जाते हैं, दुर्घटना और ट्रॉमा मामलों में यह अनुपात 50% से अधिक गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताओं में लगभग हर तीसरा केस बाहर भेजा जाता है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है— कई PHC दिन में भी बंद मिलते हैं। डॉक्टरों की उपस्थिति अनियमित है। आवश्यक दवाइयाँ अक्सर उपलब्ध नहीं होतीं।

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प्रसव, आपातकाल या गंभीर बुखार के मामलों में ग्रामीणों को सीधे जिला अस्पताल या बाहर के शहरों का रुख करना पड़ता है। पठारी इलाक़ों में बसे गाँवों से अस्पताल तक पहुँचने में ही घंटों लग जाते हैं। एम्बुलेंस सेवा काग़ज़ों में सक्रिय है, लेकिन समय पर पहुँच—अभी भी चुनौती है।

निजी अस्पतालों का बढ़ता जाल, घटती सामर्थ्य

सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरी का सीधा लाभ निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम्स को मिला है। पिछले कुछ वर्षों में चित्रकूट में निजी स्वास्थ्य संस्थानों की संख्या बढ़ी है। लेकिन सवाल यह है—क्या आम आदमी इनका खर्च उठा सकता है? जवाब साफ़ है: नहीं। निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च ग्रामीण और निम्न-मध्यम वर्ग के लिए असहनीय है। नतीजतन, लोग या तो कर्ज़ में डूबते हैं या फिर इलाज ही छोड़ देते हैं। गंभीर बीमारियों में अंततः मरीजों को प्रयागराज, सतना, लखनऊ या कानपुर जाना पड़ता है—जहाँ इलाज संभव तो है, पर पहुँच हर किसी के बस की बात नहीं।

युवा व्यापारी व समाजसेवी विनोद प्रिंस केसरवानी की आवाज़

इन्हीं हालातों के बीच युवा व्यापारी नेता व समाजसेवी विनोद प्रिंस केसरवानी ने स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर खुलकर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि— जिला अस्पताल को रेफर केंद्र बनने से रोका जाए। विशेषज्ञ डॉक्टरों की तत्काल तैनाती हो। जिला अस्पताल में समुचित इलाज की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। खोह अस्पताल में ट्रॉमा सेंटर की स्थापना की जाए, ताकि दुर्घटनाग्रस्त मरीजों की जान बचाई जा सके। उनकी यह आवाज़ अब केवल व्यक्तिगत बयान नहीं रही; यह आम जनमानस की सामूहिक पीड़ा का स्वर बनती जा रही है।

“जीत आपकी, चलो गाँव की ओर” अभियान और संजय सिंह राणा के सवाल

स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर जागरूकता अभियान “जीत आपकी, चलो गाँव की ओर” के संस्थापक/अध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार-सामाजिक कार्यकर्ता संजय सिंह राणा ने भी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। उनका कहना है कि— केवल जिला अस्पताल नहीं, बल्कि ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचा भी चरमराया हुआ है। CHC और PHC की स्थिति दयनीय है। डॉक्टरों और कर्मचारियों की अनुपस्थिति से आम जनता इलाज के लिए भटक रही है। उनका यह भी कहना है कि जब तक ग्रामीण स्तर पर स्वास्थ्य सेवाएँ मजबूत नहीं होंगी, तब तक जिला अस्पताल पर बोझ बढ़ता ही रहेगा।

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28 साल बाद भी अधूरी व्यवस्था: एक ऐतिहासिक विडंबना

मई 1997 में बांदा ज़िले से अलग होकर चित्रकूट ज़िले की नींव रखी गई थी। उद्देश्य था—प्रशासनिक सुविधा, क्षेत्रीय विकास और बेहतर सार्वजनिक सेवाएँ। लेकिन 28 वर्षों बाद भी स्वास्थ्य सेवाएँ सवालों के घेरे में हैं। अस्पताल हैं, पर डॉक्टर नहीं। भवन हैं, पर उपकरण अधूरे। योजनाएँ हैं, पर क्रियान्वयन कमजोर। यह स्थिति केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि नीतिगत उदासीनता का भी संकेत देती है।

जनआंदोलन की ओर बढ़ते कदम

स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली को लेकर 13 नवंबर 2025, गुरुवार को शहीद पार्क, एलआईसी तिराहे पर आम जनमानस से एकत्र होने की अपील की गई है। योजना है कि— शहीद पार्क में एकत्र होकर, विनोद प्रिंस केसरवानी की अगुवाई में पैदल मार्च निकाला जाए, जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपकर, स्वास्थ्य सेवाओं में तत्काल सुधार की मांग की जाए। वरिष्ठ पत्रकार संजय सिंह राणा का कहना है कि इस प्रयास में चित्रकूट की आम जनता उनके साथ खड़ी रहेगी।

एक खुला सवाल

चित्रकूट की स्वास्थ्य व्यवस्था केवल आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच की लड़ाई का सवाल है। जब हर रेफरल के साथ एक परिवार की उम्मीद टूटती है, जब हर बंद PHC के दरवाज़े पर कोई मरीज निराश लौटता है—तो यह व्यवस्था पर नहीं, हमारे सामूहिक विवेक पर भी प्रश्नचिह्न है। अब सवाल यह नहीं कि समस्या क्या है—सवाल यह है कि क्या 2025 के बाद भी चित्रकूट की जनता इलाज के लिए शहर-दर-शहर भटकती रहेगी, या यह आवाज़ें किसी ठोस बदलाव की शुरुआत बनेंगी?

चित्रकूट जिला अस्पताल को रेफर केंद्र क्यों कहा जा रहा है?

क्योंकि अधिकांश गंभीर मामलों में विशेषज्ञ डॉक्टरों और संसाधनों की कमी के कारण मरीजों को बाहर रेफर किया जा रहा है।

ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति क्यों खराब है?

डॉक्टरों की अनुपस्थिति, दवाओं की कमी और आपातकालीन सेवाओं की कमजोर व्यवस्था इसकी प्रमुख वजहें हैं।

इस जनआंदोलन की मुख्य मांग क्या है?

जिला अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती, ट्रॉमा सेंटर की स्थापना और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना।

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