मथुरा से कामा-भरतपुर तक मंदिरों में विशेष शृंगार, गलियों में फाग और प्रशासन सतर्क—आस्था, उत्सव और लोकसंस्कृति का अद्भुत संगम।
ब्रज की हवा में इन दिनों केवल बसंत नहीं बह रहा, रंग भी घुल रहे हैं। गलियों में उड़ती गुलाल, मंदिरों से उठती केसर-चंदन की सुगंध और चौपालों से गूंजते फाग संकेत दे रहे हैं कि रंगोत्सव की आहट अब दूर नहीं। यह दृश्य केवल उत्तर प्रदेश के मथुरा-वृंदावन तक सीमित नहीं, बल्कि राजस्थान के ब्रज अंचल—कामा, भरतपुर, डीग और आसपास के गांवों तक फैली सांस्कृतिक लय है। पूरा ब्रज लोक जैसे धीरे-धीरे श्रृंगारमय होकर फाल्गुन का स्वागत कर रहा है।
🔶 मंदिरों में शृंगार, गलियों में फाग
मथुरा से लेकर वृंदावन, बरसाना से नंदगांव तक मंदिरों की सीढ़ियाँ धोई जा रही हैं। ठाकुरजी के वस्त्र बदले जा रहे हैं, फाल्गुनी आभूषणों से विग्रह सुसज्जित हो रहे हैं और रास-मंडलों की तैयारियाँ आरंभ हो चुकी हैं। बाजारों में अबीर-गुलाल की ढेरियाँ सजी हैं। पर यह केवल व्यापार नहीं, परंपरा की पुनरावृत्ति है। श्रद्धालु दूर-दराज़ से ब्रजभूमि की ओर रुख कर रहे हैं ताकि वे केवल होली न खेलें, बल्कि उस लीला के साक्षी बनें जिसे लोक “कृष्ण का रंग” कहता है।
🔶 बरसाना से नंदगांव तक लठमार की आहट
बरसाना की लठमार होली की तैयारियाँ चरम पर हैं। गांव की गलियों में स्त्रियों के समूह फाग गाते हुए अभ्यास कर रहे हैं और पुरुष मंडल जवाबी ठिठोली की तैयारी में जुटे हैं। वृंदावन में फूलों की होली की बुकिंग तेज हो चुकी है। आश्रमों और धर्मशालाओं में आवास की व्यवस्थाएँ सुदृढ़ की जा रही हैं।
🔶 राजस्थान का ब्रज भी रंगमय
कामा, भरतपुर और डीग क्षेत्र में भी रंगोत्सव की तैयारी जोरों पर है। कामा के प्राचीन मंदिरों में विशेष शृंगार प्रारंभ हो चुका है। डीग के ऐतिहासिक परिसर में पारंपरिक आयोजन की चर्चा है। भरतपुर के बाजारों में केसर, गुलाल और पूजन सामग्री की मांग बढ़ गई है। यहाँ ब्रज फाग और राजस्थानी लोकधुनों का अद्भुत संगम दिखाई देता है।
🔶 प्रशासनिक तैयारियाँ और सुरक्षा प्रबंध
रंगोत्सव को सुचारु बनाने के लिए प्रशासन सक्रिय है। सुरक्षा, यातायात नियंत्रण और स्वच्छता की व्यवस्थाएँ सुदृढ़ की जा रही हैं। परिक्रमा मार्गों की सफाई, अस्थायी शिविरों की स्थापना और चिकित्सा सुविधाएँ सुनिश्चित की जा रही हैं। पुलिस और स्वयंसेवी संगठन भीड़ प्रबंधन में जुटे हैं।
🔶 केवल उत्सव नहीं, भक्ति का विस्तार
ब्रज में होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, कृष्ण भक्ति का विस्तार है। फाग के गीतों में छिपा दर्शन सिखाता है कि जीवन की रूखी धरती पर भी प्रेम का रंग चढ़ सकता है। मंदिरों में कीर्तन, राधा-कृष्ण की झांकियाँ और फूलों की होली श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक आनंद का अनुभव कराती हैं।
🔶 समरसता का संदेश
ब्रज का रंगोत्सव सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है। जाति, वर्ग और भेद की रेखाएँ धुंधली पड़ जाती हैं। सब एक-दूसरे को रंगते हैं—समान भाव से। यही ब्रज की परंपरा का सबसे सुंदर पक्ष है।
जैसे-जैसे पूर्णिमा निकट आएगी, ब्रज का रंग और गाढ़ा होगा। मथुरा से कामा-भरतपुर तक श्याम रंग की लहर फैल जाएगी। तब लगेगा—ब्रज केवल भूगोल नहीं, भाव है; रंग केवल देह पर नहीं, आत्मा पर चढ़ता है।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ब्रज में रंगोत्सव कब से शुरू होता है?
फाल्गुन शुक्ल पक्ष से विभिन्न स्थलों पर आयोजन प्रारंभ हो जाते हैं और पूर्णिमा तक चलते हैं।
क्या राजस्थान के कामा-भरतपुर क्षेत्र में भी ब्रज होली मनाई जाती है?
हाँ, यह क्षेत्र ब्रज संस्कृति का विस्तार है और यहाँ पारंपरिक फाग, रास-लीला और होली उत्सव आयोजित होते हैं।
प्रशासन ने क्या व्यवस्थाएँ की हैं?
सुरक्षा, यातायात नियंत्रण, चिकित्सा शिविर, अस्थायी आवास और भीड़ प्रबंधन की विशेष व्यवस्था की गई है।









शानदार प्रकृति की भावानुभूति , लेखक ने मानव व प्रकृति का चोली दामन सा संगम अभिव्यक्त किया वह मन मोहक है।