सम्मक्का सरक्का जतारा तेलंगाना के मेडाराम की पवित्र धरती पर 28 से 31 जनवरी के बीच एक बार फिर आस्था का महासागर उमड़ेगा। हर दो वर्ष में लगने वाला यह अद्भुत आदिवासी महोत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सदियों पुरानी स्मृतियों, संघर्ष की परंपरा और सामुदायिक एकता का जीवंत उत्सव है। दक्षिण भारत के ‘कुंभ’ और एशिया के सबसे बड़े आदिवासी धार्मिक मेले के रूप में पहचान बना चुका मेडाराम महाजत्रा प्रकृति, परंपरा और जनविश्वास के अनूठे संगम का प्रतीक है।
घने जंगलों में बसती आस्था की राजधानी
मुलुगू जिले के मेडाराम में लगने वाला यह मेला किसी भव्य मंदिर या शिखर से नहीं, बल्कि जंगल, पहाड़ और मिट्टी की सादगी से अपनी पहचान रचता है। यही सादगी इस मेले की आत्मा है। पत्थर और मिट्टी के प्रतीक स्वरूप में देवी के दर्शन—यह परंपरा बताती है कि यहां आस्था दिखावे से नहीं, भावना से जन्म लेती है। दूर-दराज़ से आने वाले श्रद्धालु इसी सरल दर्शन पद्धति में मातृशक्ति का साक्षात अनुभव करते हैं।
सम्मक्का–सरक्का: मातृशक्ति और प्रतिरोध का प्रतीक
आदिवासी समुदाय के लिए सम्मक्का और सरक्का केवल देवी नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा हैं। लोककथाओं और स्मृतियों में उनका स्वरूप मातृत्व, साहस और स्वाभिमान का प्रतीक बनकर उभरता है। यही कारण है कि यह जत्रा पूजा के साथ-साथ स्मरण और संकल्प का भी अवसर बन जाती है—जहां आस्था इतिहास से संवाद करती है।
धर्म से आगे—सामाजिक और भावनात्मक अर्थ
सम्मक्का सरक्का जतारा का महत्व धार्मिक सीमाओं से आगे जाता है। यह मेला आदिवासी पहचान की पुनर्पुष्टि करता है और सामुदायिक स्मृतियों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाता है। यहां जुटने वाला जनसमुदाय बताता है कि परंपरा केवल अतीत नहीं, बल्कि वर्तमान की सामूहिक चेतना है—जहां हर कदम के साथ विश्वास और आत्मसम्मान आगे बढ़ता है।
देशभर से उमड़ती श्रद्धा—सीमाओं से परे सहभागिता
तेलंगाना के साथ-साथ महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और मध्य भारत के कई हिस्सों से लाखों श्रद्धालु मेडाराम पहुंचते हैं। खास बात यह कि यहां केवल आदिवासी समाज ही नहीं, बल्कि विभिन्न जातियों, धर्मों और सामाजिक समूहों के लोग समान श्रद्धा से देवी के दर्शन करते हैं। यह समावेशिता मेडाराम मेले को सामाजिक एकता का सशक्त मंच बनाती है।
प्रकृति के सानिध्य में अनूठा आयोजन
घने साल वृक्षों, पहाड़ियों और खुले आकाश के बीच होने वाले अनुष्ठान प्रकृति के साथ मनुष्य के रिश्ते को रेखांकित करते हैं। यहां की हर परंपरा—पैदल यात्रा, प्रतीकात्मक पूजन और सामूहिक सहभागिता—प्रकृति-सम्मत जीवन दृष्टि का संदेश देती है। यही कारण है कि मेडाराम महाजत्रा आधुनिकता के बीच भी अपनी मौलिकता बचाए हुए है।
आर्थिक-सांस्कृतिक प्रभाव और स्थानीय जीवन
मेले के दिनों में स्थानीय अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा आती है। पारंपरिक शिल्प, लोक-संगीत, खान-पान और सेवाओं से जुड़े हजारों परिवारों को आजीविका के अवसर मिलते हैं। साथ ही, लोकसंस्कृति का यह महासंगम क्षेत्रीय पहचान को राष्ट्रीय फलक पर स्थापित करता है।
प्रशासनिक तैयारी और श्रद्धालुओं की सुविधा
लाखों श्रद्धालुओं के आगमन को देखते हुए प्रशासनिक स्तर पर व्यापक तैयारियां की जाती हैं—यातायात, स्वास्थ्य, स्वच्छता और सुरक्षा के प्रबंध इस मेले की सुचारु व्यवस्था का आधार होते हैं। स्वयंसेवी संगठनों और स्थानीय समुदाय की सहभागिता आयोजन को और मजबूत बनाती है।
क्यों कहलाता है एशिया का सबसे बड़ा आदिवासी मेला
विशाल जनसमुदाय, सदियों पुरानी परंपरा, बहु-राज्यीय सहभागिता और प्रकृति-आधारित पूजा पद्धति—इन सभी कारणों से सम्मक्का सरक्का जतारा को एशिया के सबसे बड़े आदिवासी धार्मिक मेलों में गिना जाता है। यह पहचान केवल संख्या की नहीं, बल्कि सांस्कृतिक गहराई की भी है।
आस्था का सागर—अनुभव जो जीवनभर साथ रहे
मेडाराम में बिताए गए ये चार दिन श्रद्धालुओं के लिए जीवन का अमिट अनुभव बन जाते हैं। थकान के बीच विश्वास, भीड़ के बीच अपनापन और सादगी के बीच दिव्यता—यही सम्मक्का सरक्का जतारा की आत्मा है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
सम्मक्का सरक्का जतारा कब और कहां आयोजित होती है?
यह मेला हर दो वर्ष में तेलंगाना के मुलुगू जिले स्थित मेडाराम में आयोजित होता है। इस बार 28 से 31 जनवरी तक आयोजन होगा।
इस मेले को इतना खास क्यों माना जाता है?
यह एशिया का सबसे बड़ा आदिवासी धार्मिक मेला है, जहां सादगीपूर्ण पूजा, विशाल जनसमुदाय और बहु-सांस्कृतिक सहभागिता देखने को मिलती है।
क्या केवल आदिवासी समुदाय ही इसमें शामिल होता है?
नहीं, यहां विभिन्न जातियों, धर्मों और सामाजिक समूहों के श्रद्धालु बड़ी संख्या में शामिल होते हैं।
मेले के दौरान क्या-क्या सावधानियां रखनी चाहिए?
भीड़ को देखते हुए प्रशासनिक निर्देशों का पालन, स्वास्थ्य-सुरक्षा और पर्यावरण-सम्मत आचरण आवश्यक है।










