उत्तर प्रदेश के आगरा से सामने आई यह घटना केवल एक आपराधिक समाचार नहीं,
बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न है जिसे जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी
सौंपी गई है। पूछताछ के नाम पर दी गई अमानवीय यातनाओं ने खाकी वर्दी को
कठघरे में खड़ा कर दिया है।
उत्तर प्रदेश के आगरा जिले से सामने आई यह रोंगटे खड़े कर देने वाली खबर न केवल
पुलिसिया बर्बरता का प्रतीक है, बल्कि यह उस सिस्टम की क्रूर सच्चाई को उजागर
करती है, जिसमें कानून के रखवाले ही कानून को पैरों तले रौंदते दिखाई देते हैं।
एक आम नागरिक, जो अपने पैरों पर चलकर थाने पहुंचा था, वही व्यक्ति कुछ ही
दिनों में अस्पताल के बिस्तर पर जिंदगी और मौत के बीच जूझता नजर आया।
यह मामला थाना किरावली का बताया जा रहा है, जहां पूछताछ के नाम पर
थर्ड डिग्री टॉर्चर का ऐसा नंगा नाच हुआ, जिसने सभ्य समाज की आत्मा को
झकझोर कर रख दिया। पीड़ित युवक राजू की कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी
लगती है, लेकिन दुर्भाग्यवश यह सच्चाई है।
पूछताछ के नाम पर दो दिनों तक दी गई अमानवीय यातनाएं
करीब 35 वर्षीय राजू को पुलिस ने एक पुराने मामले में पूछताछ के लिए थाने बुलाया था।
परिवार को उम्मीद थी कि कुछ सवाल-जवाब के बाद वह घर लौट आएगा, लेकिन
थाने की दहलीज पार करते ही उसके साथ जो हुआ, वह कानून और मानवता—
दोनों के खिलाफ था।
पीड़ित के अनुसार, पुलिस उस पर एक हत्या का जुर्म कबूल करने का दबाव बना रही थी।
जब उसने खुद को निर्दोष बताया और आरोप स्वीकार करने से इनकार किया, तो
पुलिसकर्मियों ने क्रूरता की सारी सीमाएं तोड़ दीं। उसे अवैध रूप से दो दिनों तक
थाने में रखा गया, छत से उल्टा लटकाया गया और पैरों पर डंडे बरसाए गए,
जिससे दोनों पैर टूट गए।
बेहोशी की हालत में भी मारपीट जारी रही। यह कोई क्षणिक गुस्से की प्रतिक्रिया
नहीं थी, बल्कि सुनियोजित और निर्मम यातना थी, जिसका उद्देश्य केवल
किसी भी कीमत पर कबूलनामा हासिल करना था।
हालत बिगड़ी तो अस्पताल में कराया गया भर्ती
जब युवक की हालत गंभीर हो गई और पुलिस को यह डर सताने लगा कि यदि
थाने में उसकी मौत हो गई तो मामला हाथ से निकल जाएगा, तब उसे
आनन-फानन में एक निजी गाड़ी से अस्पताल में भर्ती कराया गया।
यह सब बिना किसी औपचारिक कानूनी प्रक्रिया के किया गया।
अस्पताल पहुंचने तक उसकी हालत बेहद नाजुक हो चुकी थी। शरीर पर
गंभीर चोटों के निशान और टूटी हड्डियां पुलिसिया बर्बरता की
मौन गवाही दे रही थीं। इलाज के दौरान ही उसने परिजनों को
पूरी आपबीती बताई, जिसके बाद मामला सामने आया।
किसान की संदिग्ध मौत और पुलिस की शॉर्टकट जांच
इस पूरे मामले की जड़ 6 जून को हुई किसान वनवीर सिंह की संदिग्ध मौत है।
गले पर मिले निशानों के बाद पुलिस ने हत्या का केस दर्ज किया,
लेकिन ठोस साक्ष्य न मिलने पर जांच भटकती रही। इसी दौरान
गांव के ही राजू को पूछताछ के लिए बुलाया गया।
आरोप है कि पुलिस के पास उसके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं था,
लेकिन जल्द परिणाम दिखाने के दबाव में शॉर्टकट अपनाया गया।
यही शॉर्टकट एक व्यक्ति की जान पर भारी पड़ गया।
मौत के बाद मचा हड़कंप, निलंबन और तबादले
मामला सामने आने के बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया।
थाना प्रभारी, एक उपनिरीक्षक और एक आरक्षी को निलंबित किया गया,
जबकि एसीपी अछनेरा का तबादला कर दिया गया।
पूरे प्रकरण की जांच उच्च अधिकारी को सौंपी गई है।
मानवाधिकार और पुलिस व्यवस्था पर बड़ा सवाल
यह मामला केवल एक मौत नहीं है, बल्कि पुलिस व्यवस्था की
जवाबदेही पर लगा एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। यदि इस प्रकरण में
निष्पक्ष जांच और सख्त सजा नहीं हुई, तो यह संदेश जाएगा
कि थानों के भीतर आज भी कानून नहीं, बल्कि डर का राज चलता है।









