इलाज की उम्मीद में लाइन, हक़ीक़त में रेफरल

स्वास्थ्य तंत्र की एक बेचैन तस्वीर

इलाज की उम्मीद में लाइन, हक़ीक़त में रेफरल

स्वास्थ्य तंत्र की एक बेचैन तस्वीर

उत्तर प्रदेश का गोंडा ज़िला—जहाँ सरकारी स्वास्थ्य सेवाएँ केवल इलाज का माध्यम नहीं, बल्कि प्रशासनिक क्षमता, संसाधन प्रबंधन और मानवीय संवेदनशीलता की परीक्षा बन चुकी हैं। वर्ष 2024–25 में यहाँ स्वास्थ्य व्यवस्था बार-बार सवालों के घेरे में रही। कभी मरीजों की बेतहाशा भीड़, कभी डॉक्टरों की कमी, तो कभी ऐसे विवाद जिन्होंने सरकारी अस्पतालों पर आम जनता के भरोसे को कमजोर किया। यह रिपोर्ट उसी बेचैनी की परतें खोलती है।

जेपी सिंह की रिपोर्ट

वर्ष 2024–25 में गोंडा की स्वास्थ्य सेवाओं का मूल्यांकन यदि केवल इमारतों और संस्थानों की संख्या से किया जाए, तो तस्वीर संतोषजनक प्रतीत हो सकती है। जिले में एक जिला चिकित्सालय, एक मेडिकल कॉलेज से संबद्ध अस्पताल, पांच सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, लगभग 28 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 190 से अधिक उपकेंद्र संचालित बताए जाते हैं। यह ढाँचा लगभग 35–36 लाख की आबादी के लिए निर्धारित है।

लेकिन जब यही ढाँचा रोज़ाना आने वाले मरीजों की भीड़, विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता और आपातकालीन सेवाओं की कसौटी पर परखा जाता है, तो यह स्पष्ट होता है कि व्यवस्था अपनी क्षमता से कहीं अधिक दबाव झेल रही है।

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स्वास्थ्य ढाँचा: मौजूद है, लेकिन बोझिल

मेडिकल कॉलेज की मौजूदगी गोंडा को आसपास के जिलों से अलग स्थान देती है, लेकिन व्यवहार में यही कॉलेज और जिला अस्पताल बलरामपुर, श्रावस्ती और बहराइच तक के मरीजों का भार उठा रहे हैं। परिणामस्वरूप, स्थानीय मरीजों को भी समय पर समुचित इलाज नहीं मिल पाता।

काग़ज़ों में व्यवस्था पर्याप्त है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि हर यूनिट लगातार “ओवरलोड” की स्थिति में काम कर रही है।

डॉक्टरों और विशेषज्ञों की स्थिति

स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार जिले में लगभग 320 डॉक्टरों के पद स्वीकृत हैं, लेकिन कार्यरत डॉक्टरों की संख्या 210–220 के बीच ही सिमटी है। यानी करीब 30 प्रतिशत पद रिक्त हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी और भी गंभीर है।

एनेस्थेटिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट और सुपर स्पेशलिस्ट की अनुपलब्धता के कारण जिला अस्पताल और CHC बार-बार मरीजों को लखनऊ रेफर करते हैं। इलाज की जिम्मेदारी काग़ज़ पर स्थानीय होती है, लेकिन व्यवहार में मरीज को बाहर जाना पड़ता है।

नर्सिंग स्टाफ और अदृश्य दबाव

नर्सिंग स्टाफ की स्थिति भी संतुलित नहीं है। स्वीकृत लगभग 650 पदों के मुकाबले 430–450 नर्सें ही कार्यरत हैं। इसका सीधा असर ICU, इमरजेंसी और प्रसव कक्षों पर पड़ता है।

कई बार एक नर्स को दो से तीन वार्डों की जिम्मेदारी निभानी पड़ती है, जिससे देखभाल की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

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OPD का दबाव और मरीजों की हताशा

जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज की OPD में प्रतिदिन औसतन 2200 से 2500 मरीज पंजीकृत होते हैं। यह संख्या बताती है कि सरकारी अस्पताल आज भी आम जनता की पहली उम्मीद हैं।

लेकिन इन्हीं मरीजों में से केवल 30–35 प्रतिशत को ही विशेषज्ञ परामर्श मिल पाता है। शेष मरीजों को सामान्य दवा या रेफरल के भरोसे छोड़ दिया जाता है।

डॉक्टरों का व्यवहार और उपस्थिति

वर्ष भर सामने आई शिकायतों में डॉक्टरों की अनुपस्थिति और संवाद की कमी प्रमुख रही। कई PHC और CHC में डॉक्टर समय पर नहीं पहुँचते, जबकि मेडिकल कॉलेज में जूनियर डॉक्टरों पर अत्यधिक निर्भरता देखी गई।

मरीजों के साथ संवाद में संवेदनशीलता का अभाव धीरे-धीरे भरोसे के क्षरण में बदलता दिखाई दिया।

विवादों से घिरी व्यवस्था

प्रसव और मातृ-शिशु मामलों में देरी, ICU बेड की कमी और एंबुलेंस की अनुपलब्धता को लेकर इस वर्ष कई बार स्वास्थ्य विभाग सवालों के घेरे में आया। जांचें हुईं, नोटिस जारी हुए, लेकिन ठोस सुधार की तस्वीर साफ़ नहीं दिखी।

जांच मशीनों की खराबी और दवाओं की कमी ने भी सरकारी इलाज की विश्वसनीयता को चोट पहुँचाई।

स्वास्थ्य संकेतक और चेतावनी

NFHS और जिला अनुमानों के अनुसार संस्थागत प्रसव दर लगभग 85 प्रतिशत है, लेकिन शिशु मृत्यु दर और कुपोषण के आंकड़े बताते हैं कि परिणाम आधारित सुधार अब भी अधूरा है।

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समग्र तस्वीर

गोंडा की स्वास्थ्य व्यवस्था की यह समीक्षा बताती है कि समस्या केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि प्रबंधन, अनुशासन और संवेदनशीलता की भी है। जब इलाज इंतज़ार में बदल जाए और रेफरल व्यवस्था बन जाए, तो अस्पताल चलते रहते हैं, लेकिन भरोसा नहीं।

❓ पाठकों के सवाल

सरकारी अस्पतालों में रेफरल क्यों बढ़ रहे हैं?

विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, सीमित संसाधन और मेडिकल कॉलेज पर अत्यधिक दबाव इसके प्रमुख कारण हैं।

क्या मेडिकल कॉलेज होने से स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर हुई हैं?

आंशिक रूप से हाँ, लेकिन मरीजों की संख्या और विशेषज्ञों की कमी के कारण इसका लाभ सीमित रह गया है।

क्या गोंडा में स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार संभव है?

यदि मानव संसाधन, जवाबदेही और प्रबंधन पर एक साथ काम किया जाए तो सुधार पूरी तरह संभव है।


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